कई बार लोग किसी भयावह दुर्घटना या बीमारी का कुछ इस तरह शिकार बनते हैं कि उन्हें अपने शरीर के किसी अंग को भी खोना पड़ जाता है. इलाज के बाद अक्सर ऐसे लोग एक तरह के सिंड्रोम का शिकार हो जाते हैं जिसके चलते वे शरीर के उस अनुपस्थित अंग में बहुत शिद्दत से झुनझुनाहट या दर्द महसूस करते हैं. इसे फैंटम लिंब सिंड्रोम कहा जाता है. लेकिन कला से जुड़े इस आलेख में यह जानकारी देने की क्या ज़रूरत है? इसका जवाब यह है कि जिसकी हम बात करने जा रहे हैं उस कला प्रदर्शनी का शीर्षक ‘फैंटम लिंब’ ही है और इसमें शामिल कलाकृतियों को भली तरह समझने के लिए इस शब्द का मतलब जानना ज़रूरी है.

दिल्ली के त्रिवेणी कला संगम में इस प्रदर्शनी का आयोजन रज़ा फाउंडेशन ने किया है. यहां इस बात का जिक्र करते चलते हैं कि मशहूर चित्रकार सैयद हैदर रज़ा ने युवा साहित्यकारों और कलाकारों को आगे लाने के लिए इस फाउंडेशन की शुरूआत की थी. कला के क्षेत्र में नई प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने के लिए रजा फाउंडेशन जो कई तरह के काम करती है उनमें से एक इनकी कला प्रदर्शनियां आयोजित करवाना भी है. फैंटम लिंब इस तरह का छठा आयोजन है जिसमें सात नवेले कलाकारों - भारत चौधरी, चंदन गोम्ज, मेहर अफरोज़ वाहिद, दिव्या सिंह, मूनीस अहमद शाह, प्रियंक घोटवाल और सोहराब हुरा को शामिल किया गया हैं. इनकी कलाकृतियों में डिजिटल पेंटिंग, वीडियो इंस्टालेशन और कुछ अलग तरह के आर्टवर्क भी शामिल हैं. ये कृतियां एकदम अलग विचारों और उनकी अनूठी अभिव्यक्तियों से यह बताती हैं कि सुंदरता से बरती गई कोई भी चीज कला हो सकती है.

त्रिवेणी कला संगम में आयोजित फैंटम लिंब

गैलरी में घुसते ही सबसे पहले जो चीज आपका ध्यान खींचती हैं, वह भारत चौधरी की खींची हुई तस्वीरें हैं. आठ तस्वीरों के इस संकलन से चौधरी पश्चिमी देशों में रह रहे मुसलमानों की मन:स्थिति दिखाते हैं. इनमें से एक, जिस पर सबसे पहले नज़र टिकती है, लंदन में खींची गई वह तस्वीर है जिसमें यहूदी प्रदर्शनकारियों के बीच में एक मुस्लिम युवक दिखाई देता है. ऐसी ही दूसरी तस्वीर में हिज़ाब वाली एक महिला के पास चे गवेरा की तस्वीर दिखाई देती है. कुछ अटपटी सी लग रही परिस्थतियों में अटके तस्वीरों के ये किरदार, इनकी कहानी जान लेने की उत्सुकता जगाते हैं. प्रदर्शनी में मौजूद तस्वीरों का अगला संकलन सोहराब हुरा का है जिन्होंने बनारस में गंगा किनारे की कुछ खूबसूरत ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें खींची है. हालांकि बनारस से जुड़ी तमाम फोटो इंटरनेट पर इस शहर का नाम लिखते ही मिल जाती हैं लेकिन इन तस्वीरों में व्यस्त बनारस के सूनेपन को टटोला जाना, इन्हें खास बना देता है. हुरा की तस्वीरों में फ्रेम का एक बड़ा हिस्सा खाली रखा गया है. इसमें सिर्फ नदी या आसमान दिखाई देता है और यह चीज इन तस्वीरों को और भी प्रभावशाली बना देती है.

प्रियंक घोटवाल का वीडियो इंस्टालेशन

तस्वीरों के बाद प्रियंक घोटवाल का वीडियो इंस्टालेशन आपको इसे ठहरकर देखने को मजबूर करता है. इसमें तीन स्क्रीनों को जोड़कर त्रिभुज बनाया गया है जिसे आप चारों ओर से घूमकर देख सकते हैं, हर तरफ से लगभग एक जैसी ही तस्वीर नज़र आती है. पहली नज़र में एक ही ऑब्जेक्ट की तीन अलग-अलग तस्वीरें लगने वाला यह आर्टपीस, स्क्रीन के पीछे से आने वाली आवाजों के चलते कुछ इस तरह का आभास देता है, मानो आप सीधे सड़क किनारे खड़े होकर एक मूरत को देख रहे हैं. असल में यह वडोदरा, गुजरात के एक कब्रिस्तान में लगी एंजेल की तस्वीर है. जिस तरह से इसे ट्रीट किया है कि यह स्टेच्यू अकेलेपन और कभी न खत्म होने वाले शोक का प्रतीक बनता दिखाई देता है.

मूनीस अहमद शाह की कलाकृति

इस एक्ज़ीबिशन की सबसे अधिक सम्मोहित करने वाली चीज कश्मीर से गायब होकर, इस आर्टगैलरी में पहुंची एक दीवार है. इसे कश्मीर के ही एक कलाकार मूनीस अहमद शाह ने बनाया है. फाइबर कास्टिंग से बनाई गई यह दीवार एकदम जीवंत लगती है. डिटेलिंग के लिए उस पर लगाई गई मिट्टी, चिपकाए गए पोस्टर और फिर उस पर लिखा कटाक्षपूर्ण संदेश, इसे कश्मीर की ऐसी दीवार बना देते हैं जो वहां की पहचान बन चुकी है. इसके साथ-साथ यह वह आर्टपीस भी है जो एक्ज़ीबिशन के नाम - फैंटम लिंब - को पूरी तरह सार्थक करता है. कश्मीर में ऐसी दीवारें और उन पर लिखे संदेश लगभग गायब ही चुके हैं लेकिन उनका जिक्र और ज़रूरत अब भी बाकी है. इसके अलावा मूनीस अहमद की ही बनाई डिजिटल पेंटिंग्स की सीरीज रोज़ मरती-गायब होती चिड़ियों पर आधारित है. यह लुभाती तो है लेकिन यह विचार उतना भी अलहदा नहीं है.

दिव्या सिंह की ऑइल पेंटिंग ‘द ब्लू बॉथरूम’

इन कृतियों के अलावा दिव्या सिंह की ऑइल पेंटिंग ‘द ब्लू बॉथरूम’ को प्रदर्शनी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है. लेकिन उनकी मिनी बुक्स और एक छोटी मगर बिना शीर्षक की पेंटिंग बेहतरीन विचार, प्रयोग और कलाकारी का नमूना लगती हैं. वहीं, चंदन गोम्स की तस्वीरों का संकलन हिंसा, बीमारी और डर जैसे भावों को तरजीह देने के चलते सिहरन सी पैदा कर देता है. कुल मिलाकर, ये सभी कलाकृतियां थोड़ी या ज्यादा मात्रा में आपके भीतर के उस हिस्से को छूती लगती हैं जिसके झंकृत होने पर आप भी फैंटम लिंब सरीखी झनझनाहट का एहसास कर सकते हैं.

प्रदर्शनी में चंदन गोम्स की तस्वीरें

चलते-चलते: रज़ा फाउंडेशन द्वारा आयोजित इस कला प्रदर्शनी की क्यूरेटर टीवी प्रोड्यूसर, लेखिका और कला समीक्षक मीरा मेंज़ेज़ हैं. 17 नवंबर, 2019 को शुरू हुआ यह आयोजन एक दिसंबर, 2019 तक दिल्ली के त्रिवेणी कला केंद्र की श्रीधरणी आर्ट गैलरी में चलने वाला है. अगर आपकी रुचि है तो सुबह 11 बजे से शाम 8 बजे के बीच यहां पहुंचकर इसका हिस्सा बन सकते हैं.

(मनीषा यादव के सहयोग के साथ)