राजस्थान की सांभर झील में घटी देश की सबसे बड़ी पक्षी त्रासदी की वजह साफ हो गई है. यहां अब तक हुई पच्चीस हजार से ज्यादा पक्षियों की मौत के लिए भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) बरेली ने एवियन बोट्यूलिज्म नामक बीमारी को जिम्मेदार माना है.यह बीमारी क्लोस्ट्रिडियम बॉट्यूलिज्म नाम के बैक्टीरिया की वजह से फैलती है.

आईवीआरआई की रिपोर्ट के मुताबिक संभवत: इस बार अच्छी बारिश होने से सांभर के पानी का खारापन घट गया. इससे पानी का पीएच स्तर सामान्य से काफी ज्यादा हो गया और पानी में घुली हुई ऑक्सीजन की मात्रा सिर्फ चार मिलीग्राम/लीटर से भी कम रह गई. इस दौरान झील का तापमान भी करीब 25 डिग्री सेल्सियस रहा होगा. ये सभी परिस्थितियां कुछ खास सूक्ष्म जलीय जीवों के पनपने के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं जो क्लोस्ट्रिडियम बॉट्यूलिज्मम के वाहक होते हैं.

यह रिपोर्ट बताती है कि बाद में जब झील का जलस्तर घटने लगा होगा तो पानी के खारेपन में अचानक बढ़ोतरी हुई जिसके चलते सूक्ष्म जलीय जीवों की मौत हो गई. इन मृत जीवों में क्लोस्ट्रिडियम बॉट्यूलिज्म और भी तेजी से पनपा और इनके शरीर विषाक्त हो गए. जब कीटभक्षी और सर्वाहारी पक्षियों ने इनका सेवन किया तो वे इस बीमारी का शिकार होकर मारे गए.

बॉट्यूलिज्म से पीड़ित पक्षी करीब दो दिन तक लकवाग्रस्त रहे और उनकी उड़ने की शक्ति ख़त्म हो गई. उनकी पलकें बंद होने लगी. फ़िर धीरे-धीरे इन पक्षियों की श्वास लेने की क्षमता भी ख़त्म हो गई. प्रभावित पक्षियों में सबसे ज्यादा संख्या नॉरहन शॉवलर और नॉरहन पिटेंल जैसे प्रवासी पक्षियों की थी जो हर साल हजारों की संख्या में सांभर झील का रुख करते हैं. बाद में इन मरे हुए पक्षियों को दूसरे मांसाहारी पक्षियों ने खाया और उनका भी यही हश्र हुआ. इस तरह ये चक्र आगे बढ़ता रहा. गनीमत यह रही कि शाकाहारी पक्षी इस बीमारी की चपेट में नहीं आए.

इस पक्षी त्रासदी ने ऐसी महामारियों से निपटने की सरकार और प्रशासन की तैयारी और व्यवस्थाओं की पोल खोल कर रख दी है. स्थानीय जानकारों के मुताबिक सांभर में प्रवासी पक्षियों की मौत का सिलसिला दीपावली के बाद से ही शुरु हो गया था, लेकिन प्रशासन की नींद उसके दो सप्ताह बाद टूटी. इस पूरे मामले में सरकार और प्रशासन की नाकामी इससे भी समझी जा सकती है कि पक्षियों की मौत की वजह पता करने में ही बारह दिन से ज्यादा का समय लग गया और इस दौरान हजारों और पक्षी मौत के आगोश में समा गए. राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा नियुक्त किये गये न्याय मित्रों ने झील का दौरा करने के बाद अपनी रिपोर्ट में साफ़ लिखा है कि इस पूरे मामले में अधिकारियों की तरफ़ से जबरदस्त लापरवाही बरती गई है.

फोटो: पुलकित भारद्वाज

राजस्थान विश्वविद्यालय में प्राणिविज्ञान की आचार्य डॉ आशा शर्मा इस बारे में सत्याग्रह को बताती हैं कि ‘कई दिनों तक प्रशासन इसी असमंजस में रहा कि मरे हुए पक्षियों को दफन किया जाए या उनका दहन करना ठीक रहेगा! इसके चलते मृत पक्षियों के शव यूं ही लावारिस पड़े रहे और कई अन्य स्वस्थ पक्षी उन्हें खाकर इस बीमारी से ग्रस्त हो गए और मारे गए.’

डॉ शर्मा आगे जोड़ती हैं, ‘लंबी कशमकश के बाद मृत पक्षियों को दफनाने का फैसला लिया गया जो कि ग़लत था. संक्रमित पक्षियों को गाड़ने की वजह से उनमें बैक्टिरिया के पनपने की आशंका बनी रहती है. इन पक्षियों के अवशेषों को कुत्ते या बिज्जू जैसे जानवरों द्वारा खोदकर निकालने की स्थिति में इस महामारी के फ़िर से फैलने का ख़तरा बना रहेगा. इस स्थिति से बचने के लिए इन पक्षियों का दाह करवाना चाहिए था.’ बकौल शर्मा ‘पक्षियों के प्रति हमारा सिस्टम इतना संवेदनहीन है कि दूसरे वन्य प्राणियों की तरह आज तक इनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किसी तरह के नियम नहीं बनाए गए हैं.’

पक्षियों के प्रति राजस्थान सरकार की उदासीनता इससे भी पता चलती है कि प्रदेश में गठित किया गया वेटलैंड (आर्द्रभूमि) प्राधिकरण अभी तक फाइलों से बाहर नहीं निकल पाया है. जबकि केंद्र सरकार ने 2017 में ही वेटलैंड के संरक्षण और प्रंबधन के लिए इस प्राधिकरण को बनाने के निर्देश जारी कर दिए थे. कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक अभी तक काग़जों में सिमटे हुए इस प्राधिकरण में वेटलैंड और उससे जुड़े विभिन्न क्षेत्रों के किसी भी विशेषज्ञ को शामिल नहीं किया गया है.

इस महामारी के वक़्त राजस्थान का सरकारी अमला न सिर्फ़ इच्छाशक्ति बल्कि संसाधनों के मोर्चे पर भी बुरी तरह विफल साबित हुआ. यह बात आपको चौंका सकती है कि झील से मृत पक्षियों के शव निकालने तक के लिए जरूरी उपकरण और इंतजाम प्रशासन के पास नहीं थे और इसके लिए हवा चलने का इंतजार करना पड़ रहा था ताकि मर चुके पक्षी खुद ही लहरों के सहारे किनारे तक पहुंच जाएं. मृत पक्षियों को समय रहते झील से न निकाले जाने की वजह से भी हजारों स्वस्थ पक्षी संक्रमण का शिकार हो गए. न्यायमित्रों की रिपोर्ट में इस बात का भी ज़िक्र है कि जिस तरह से सरकारी एजेंसियां काम कर रही है उस हिसाब से सभी शवों को हटाने में दो महीने का समय और लगेगा जिससे और अधिक विनाशकारी स्थिति पैदा हो सकती है.

यही नहीं सांभर में पक्षियों के बचाव के लिए जो अस्थायी सेंटर बनाए गए उनकी क्षमता भी बहुत कम थी. स्थानीय ख़बरों के मुताबिक कुछ रेस्कयू सेंटरों पर पैंतीस से ज्यादा होते ही बचाए हुए पक्षियों को घायल अवस्था में ही उड़ा दिया गया ताकि नए पक्षियों को वहां रखा जा सके.

लेकिन सिर्फ ज्यादा बारिश, कम संसाधन और सरकारी अमले की लापरवाही को ही सभी जानकार इतनी बड़ी त्रासदी के घटने की प्रमुख वजहें नहीं मानते हैं. वरिष्ठ पक्षीविद हर्षवर्धन भारद्वाज का मानना है कि इस आपदा की पटकथा महीने-दो महीने या एक-दो सालों में नहीं बल्कि पचास के दशक में ही लिख दी गई थी जब सांभर में नमक बनाने की जिम्मेदारी ‘हिंदुस्तान सॉल्ट लिमिटेड’ (एचएसएल) को सौंपी गई. सत्याग्रह से हुई बातचीत में भारद्वाज बताते हैं कि सांभर से मुनाफा कमाने में नाकाम रहने पर एचएसएल ने लीज पर मिली इस जमीन को निजी कंपनियों को सबलेट कर दिया.

हर्षवर्धन आगे जोड़ते हैं, ‘जब इससे भी पार नहीं पड़ी तो एचएसएल ने सांभर में सौर ऊर्जा और पर्यटन की तरफ़ ध्यान देना शुरु कर दिया. और नमक बनाने का काम एक तरह से निजी हाथों में आ गया जिन्होंने जबरदस्त तरीके से सांभर का दोहन किया. इसी बात का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष खामियाजा आज भुगतना पड़ा है.’ गौरतलब है कि 2018-19 में राजस्थान में सरकारी और को-ऑपरेटिव संस्थाओं ने सिर्फ 2.81 लाख टन नमक पैदा किया था, जबकि निजी उत्पादकों के मामले में यह आंकड़ा 22.93 लाख टन था.

निजीकरण बढ़ने के अलावा सांभर में नमक का अवैध उत्पादन भी एक बड़ी समस्या है. जयपुर, नागौर और अजमेर आदि जिलों को छूती हुई यह झील करीब 233 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है. बीती जुलाई में राजस्थान सरकार द्वारा विधानसभा में पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक झील की 431 बीघा जमीन पर नमक माफियाओं ने अतिक्रमण किया हुआ है. इन आंकड़ों की मानें तो सांभर में प्रतिवर्ष अवैध रूप से 3.24 लाख टन नमक का उत्पादन होता है.

स्थानीय जानकारों के अनुसार इन नमक माफियाओं ने सांभर झील में हजारों की संख्या में सैकड़ों फीट गहरे ट्यूबवैल खुदवाए हुए हैं. इनके जरिए बड़े स्तर पर ब्राइन (जिस खारे पानी से नमक बनता है) की चोरी होती है. इसके चलते झील का जो पानी कम से कम फरवरी तक चलना चाहिए वह दिसंबर आते-आते आधे सेे ज्यादा खत्म हो जाता है. नतीजतन पानी का खारापन बुरी तरह प्रभावित होता है और क्लोस्ट्रिडियम बॉट्यूलिज्म जैसे बैक्टीरिया के इसमें पनपने की संभावना बढ़ जाती है. गौरतलब है कि इस अवैध कब्जे वाली जमीन पर सर्वाधिक मृत पक्षी पाए गए थे. न्यायमित्रों की रिपोर्ट में इस बात का भी ज़िक्र है कि निजी नमक निर्माता जहरीले अपशिष्टों को झील में मिला रहे हैं.

सांभर की आबो-हवा के साथ होने वाला खिलवाड़ यहीं नहीं रुकता. 2017 में एचएसएल की ही सहयोगी कंपनी सांभर सॉल्ट लिमिटेड (एसएसएल) ने ख़ुद को लीज पर मिली जमीन में से 19 एकड़ राजस्थान की ही इलेक्ट्रॉनिक कंपनी चंद्रा ग्रुप को किराये पर दे दी. इस पर ‘सांभर हेरीटेज’ नाम से एक रिज़ॉर्ट बनाया गया. इस रिज़ॉर्ट की कुल वार्षिक आय में से 15 फीसदी एसएसएल को दिया जाना तय हुआ. लेकिन स्थानीय लोग और पर्यावरणविद इस रिज़ॉर्ट की वजह से खासे नाख़ुश हैं. इस पर झील के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लेने, देर रात तक तेज आवाज़ में डीजे बजाने और तेज रोशनी फैलाने का आरोप लगातार लगता रहा है. इसके अलावा यह रिजॉर्ट अपशिष्ट पदार्थों को भी झील में बहा देता है.

इस बारे में हर्षवर्धन भारद्वाज कहते हैं कि कई हजार किलोमीटर की यात्रा कर सांभर पहुंचने वाले पक्षी अपनी जगह किसी और को काबिज देखकर परेशान हो जाते हैं. यहां आने वाले पक्षी काफ़ी संवेदनशील होते हैं जो शोर को झेल नहीं पाते. इससे उनकी दिशाओं का पता लगाने की क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है. न्यायमित्रों ने भी अपनी रिपोर्ट में पक्षियों की मौत के लिए सरकार और सांभर सॉल्ट लिमिटेड को जिम्मेदार बताया है.

इनके अलावा राज्य में तेजी से पैर पसारता मछली उद्योग भी इन पक्षियों की जान का दुश्मन साबित हुआ. जानकारों के मुताबिक जिन जलाशयों में प्रवासी पक्षी आकर ठहरते थे, उनमें से अधिकतर को मत्स्य विभाग ने ठेके पर उठा दिया. यहां पर मौजूद ठेकेदार और उनके कर्मचारी बारूदी पटाखों और बंदूकों से डराकर पक्षियों को जलाशय के आस-पास भी नहीं आने देते ताकि वे मछलियों को न खाने पाएं. संभावना जताई जा रही है कि इस भूख-प्यास के चलते भी कई पक्षियों ने दूसरे मृत पक्षियों का भक्षण किया और एविअन बॉट्यूलिज्म का शिकार हो गए.

1990 में सांभर झील का रामसर साइट घोषित होना भी इसके लिए नुकसानदायक ही साबित हुआ. इसके तहत दुनिया भर की अन्य झीलों की तरह सांभर का भी संरक्षण और पुनरुद्धार किया जाना था. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. पर्यावरणविदों के मुताबिक रामसर साइट में आने की वजह से सांभर के मामले में विदेश मंत्रालय का दखल शुरु हो गया जबकि वन, कृषि और पशुपालन जैसे विभागों ने इससे पल्ला झाड़ लिया. नतीजतन इन विभागों के अधिकारी सांभर की जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालते रहे और झील की स्थिति बद से बदतर होती गई.

हालांकि हर्षवर्धन अब भी मानते हैं कि यदि कुछ जरूरी कदम उठाए जाएं तो आज भी सांभर झील को सहेजा जा सकता है. वे हमें बताते हैं कि ‘सांभर झील से संबंधित जो प्राधिकरण सरकारी दराजों में बंद है उसे जमीन पर उतारने का वक़्त आ गया है. राजस्थान सरकार इस बारे में ओड़िशा से सीख ले सकती है जहां चिलिका लेक अथोरिटी बनाकर उस झील का कायाकल्प कर दिया गया. इस प्राधिकरण के बनने से सांभर के आसपास के लोगों को रोजगार के अवसर मिलेंगे, साथ ही सांभर झील और पक्षियों के भी हितों के साथ समझौता नहीं होगा.’

न्यायमित्रों ने भी अपनी रिपोर्ट में कुछ ऐसी ही बातों के अलावा और भी सुझाव दिए हैं, जिनमें- झील को वन विभाग या वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को सौंपा जाना, बेहतर प्रबंधन के जरिए सांभर को नैसर्गिक रूप में लौटाना, नमक उत्पादन के निजी ठेके बंद करना, रिज़ॉर्ट व अन्य निर्माण ध्वस्त करना और हाई डेन्सिटी के ड्रोन व इन्फ्लेक्टेड ट्यूब की मदद से मृत पक्षियों को झील से बाहर निकालना शामिल है.