निर्देशक: अनीस बज़्मी
लेखक: अनीस बज़्मी, राजीव कौल, प्रफुल पारेख
कलाकार: अनिल कपूर, जॉन अब्राहम, अरशद वारसी, इलियाना डिक्रूज, कृति खरबंदा, सौरभ शुक्ला, पुल्कित सम्राट
रेटिंग: 1/5

अनीस बज़्मी निर्देशित ‘पागलपंती’ देखना बिल्कुल पकड़म-पकड़ाई खेलने जैसा है. इसमें आप कभी कहानी तो कभी किरदारों को पकड़ने यानी समझने के लिए दिमाग भगाते रहते हैं. बीच-बीच में कभी किसी किरदार से टकराते हैं तो कभी जबरन ठूंसा गया कोई ट्विस्ट आकर आपसे भिड़ जाता है. इसी दौरान रोमांस, कॉमेडी यहां तक कि देशभक्ति भी इधर-उधर से आ-आकर आपसे कहते रहते हैं, मुझे पकड़ो-मुझे पकड़ो. लेकिन इनमें से कोई भी आपके हाथ नहीं लगता है. इस तरह ‘पागलपंती’ देखते हुए पूरे 152 मिनट तक आप बकवास के भूसे में मनोरंजन की सुई खोजते रहते हैं और फिर पककर, थककर, निराश होकर अपने घर चले जाते हैं.

कहानी की बात करें तो... छोड़िए, कहानी की बात ना ही करें तो बेहतर है. इसकी बजाय ‘पागलपंती’ के बारे में सिर्फ इतना बताना काफी होगा कि यह वेलकम, नो एंट्री, धमाल वाली कैटेगरी की फिल्म है. इस तरह की फिल्मों में एक लंबी-चौड़ी स्टार कास्ट होती है, जिसमें अनिल कपूर और अरशद वारसी सरीखे कुछ कलाकारों का होना ज़रूरी होता है. इसके साथ ही यहां पर पांच-सात सौ करोड़ रुपए की रकम का जिक्र भी होता है जिसके पीछे फिल्म के सारे किरदार पागलपंती करते घूमते हैं. इन सबके बीच बिना किसी जरूरत के दो-चार गाने और एकाध एक्शन सीक्वेंस आ जाते हैं. फिर अंत में, ढेर सारे कन्फ्यूजन के चलते सारे किरदारों के एक लोकेशन पर इकट्ठा होने के साथ फिल्म खत्म हो जाती है. दशकों पुराने इसी फॉर्मूले को पागलपंती भी दोहराती है और हमें दम भर पकाती है.

अभिनय की बात करें तो ‘पागलपंती’ सरीखी फिल्मों में इसके लिए ज्यादा मेहनत की दरकार नहीं रहती है और शायद इसीलिए जॉन अब्राहम भी यहां पर उतने बुरे नहीं लगते हैं. यही वजह है कि अनिल कपूर यहां वेलकम-धमाल वाले अपने किरदारों को ही दोबारा जीकर काम चला लेते हैं, वहीं अरशद वारसी भी गोलमाल के माधव को दोहराने से ज्यादा कुछ नहीं करते हैं. इनसे अलग, जब सौरभ शुक्ला और बृजेंद्र काला फिल्म में गंभीरता से अभिनय करते हैं तो खुद को बुरी तरह से खर्च करते हुए से लगते हैं. इन्ही की तरह इनामुलहक भी एक टुच्चे किरदार को जान देने का कारनामा कर अपने अच्छे अभिनेता होने का सबूत दे जाते हैं (इनामुलहक की पिछली चर्चित फिल्म नक्काश थी जिसे सिनेमा और ‘राष्ट्र’ प्रेमियों को ज़रूर देखना चाहिए). इनके अलावा पुल्कित सम्राट, इलियाना डिक्रूज और कृति खरबंदा भी पागलपंती में ठीक-ठाक काम करते नजर आते हैं. लेकिन इन कुछ लोगों का अच्छा या थोड़ा कम अच्छा अभिनय भी छिछले संवादों-दृश्यों वाली इस ब्रेनडैड कॉमेडी में इतना वजन नहीं ला पाता कि इसे ठीक-ठाक सिनेमा कहा जा सके.

फिल्म के बाकी पक्षों की बात करें तो बढ़िया प्रोडक्शन क्वालिटी, शानदार लोकेशन्स और जब-तब टपक पड़ने वाले गाने बताते हैं कि इसे बनाने में खूब पैसा खर्च किया गया है. शायद इतने बेहतरीन कलाकार भी वजनदार पे-चेक देखकर ही यहां इकट्ठे हुए हैं. लेकिन बढ़िया सिनेमा के लिए एक ठोस स्क्रिप्ट की ज़रूरत भी होती ही है. जबकि निर्देशक अनीस बज्मी की इस फिल्म में स्क्रिप्ट के अलावा सबकुछ है. यानी वे यह मानकर चले हैं कि कन्फ्यूजन वाली कॉमेडी, बेसिर-पैर की देशभक्ति और चुटकुलानुमा संवाद डाल देने भर से उनकी यह मनोरंजनहीन ‘पागलपंती’ एक सुपरहिट फिल्म बन सकती है. बुरा यह है कि जिस तरह की फिल्में देखने का चलन हमारे यहां है, वे गलत साबित हों यह कोई ज़रूरी नहीं है!