भारत और तिब्बत के बीच सीमा निर्धारण का पहला समझौता शिमला में हुआ था. 1914 के इस समझौते में ब्रटिश भारत, तिब्बत और चीन के प्रतिनिधि शामिल थे और इसी में मैकमोहन रेखा को सीमारेखा बनाया गया था. यह और बात है कि चीन ने तब से लेकर अब तक इसे कभी स्वीकार नहीं किया. इसके बाद मार्च, 1947 में भारत की अंतरिम सरकार के मुखिया के रूप में जब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने एशियाई देशों का एक सम्मेलन दिल्ली में आयोजित किया तो वहां चीन के साथ-साथ तिब्बत के प्रतिनिधि भी बुलाए गए थे. लेकिन तिब्बत को अलग दर्जा देने की यह नीति 1949 में चीनी गणतंत्र (पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना) के गठन के साथ ही खत्म हो गई और भारत ने ‘एक चीन’ की नीति अपना ली.

इसके एक साल बाद चीन ने तिब्बत पर पूर्ण अधिकार के लिए घुसपैठ कर दी. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन का दावा था कि यह क्षेत्र उसके अधीन भी एक स्वायत्तशासी क्षेत्र बना रहेगा. भारत ने भी इस दावे को 1954 में चीन से संधि के दौरान मान लिया. लेकिन तिब्बतवासियों को यह मंजूर नहीं था और उसके खांपा क्षेत्र में चीन के खिलाफ विद्रोह हो गया. यह विद्रोह कई महीनों तक चला. इसी दौरान 1959 में दलाई लामा अपने सैकड़ों अनुयायियों के साथ भारत आ गए. उनके बाद कई तिब्बतवासी शरणार्थी के रूप में धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) और उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में पहुंचे.

दलाई लामा के भारत आने के तकरीबन तीन साल बाद ही भारत-चीन युद्ध और एसएफएफ (स्पेशल फ्रंटियर फोर्स) का गठन हुआ था. नवंबर, 1962 में जब यह लगभग तय हो चुका था कि भारत चीन के सामने पराजित हो चुका है, भारतीय गुप्तचर संस्था रॉ ने सरकार के सामने एक गुप्त सैन्य बल के गठन का प्रस्ताव रखा. सरकार ने इसे मान लिया. यह चीन के साथ अगले संघर्ष की पूर्व तैयारी थी इसलिए इस बल में सभी जवान तिब्बती मूल के रखे गए. इसका मुख्यालय चकराता (उत्तराखंड) में बनाया गया जहां काफी तादाद में तिब्बतवासी रहते हैं. इस बल को छापामार युद्ध और खुफिया सूचनाएं जुटाने के लिए प्रशिक्षित किया गया था. एसएफएफ से जुड़ी एक और खास बात यह थी कि इसे अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए से भी प्रशिक्षण मिला था.

एसएफएफ का गठन बेशक चीन को ध्यान में रखकर किया गया लेकिन 1962 के युद्ध के बाद ऐसी नौबत कभी नहीं आई कि इस मकसद के लिए बल का इस्तेमाल किया जाए. इसके बाद भी इस बल ने कई मोर्चों पर अपनी उपयोगिता सिद्ध की. 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के समय एसएफएफ ने वहां कई पुलों को उड़ाकर पाकिस्तानी सेना को पस्त कर दिया था. नंदा देवी पर्वत पर परमाणु ईंधन से चलने वाली जासूसी डिवाइस को लगाने की जिम्मेदारी भी एसएफएफ के जवानों को दी गई थी, हालांकि विपरीत मौसम की वजह से वे इसमें सफल नहीं हो सके.

1970-80 का दशक आते-आते चीन के साथ संबंधों में सुधार होने के साथ ही एसएफएफ की वह जरूरत नहीं रह गई जिसके लिए इसका गठन किया गया था. बाद के सालों में इसके जवानों को आतंकवाद निरोधी बल के रूप में प्रशिक्षित किया जाने लगा और ये ऑपरेशन ब्लू स्टार से लेकर कारगिल की लड़ाई तक भारतीय सैन्य रणनीति में महत्वपूर्ण साबित हुए. आज एसएफएफ भारत के सबसे प्रमुख आतंकवाद विरोधी बलों में माना जाता है. हालांकि अभी-भी इस बल के जवानों को विशेषरूप से छापामार युद्ध की ट्रेनिंग दी जाती है और यह रॉ की एक शाखा के रूप में ही काम करता है.