बताया जाता है कि एनसीपी नेता शरद पवार के परिवार में लंबे समय से चल रही कलह भी एक वजह है कि महाराष्ट्र में कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना की मिली-जुली सरकार बनते-बनते रह गई. पीटीआई के मुताबिक इसके साथ-साथ राज्य में एक बार फिर से बनी भाजपा की सरकार उसके वरिष्ठ नेताओं और अजित पवार के बीच कई दिनों तक चली बातचीत का भी नतीजा है. देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में बनी इस सरकार में अजित पवार को उपमुख्यमंत्री बनाया गया है. यहां पर ध्यान देने वाली बात यह है कि पिछले कुछ समय से केंद्रीय एजेंसियां अजित पवार के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच कर रही हैं. यानी इस मामले में अजित पवार के खिलाफ चल रही जांच की भी कुछ भूमिका हो सकती है.

पीटीआई का कहना है कि शिवसेना, राकंपा और कांग्रेस पिछले सप्ताह से एक असंभव से लगने वाले गठबंधन को बनाने के लिए प्रयासरत थे, जबकि इस दौरान भाजपा शांत थी. हालांकि, अब लगता है कि उसने शरद पवार के भतीजे अजित पवार को शामिल करने का ‘‘प्लान बी’’ तैयार रखा था.

इस मामले में भाजपा महासचिव और प्रदेश चुनावों में पार्टी प्रभारी रहे भूपेंद्र यादव की एक प्रमुख भूमिका रही. पीटीआई का कहना है कि उन्हें भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने अपनी योजना को अमली जामा पहनाने और देवेंद्र फड़णवीस का सहयोग करने के लिए मुंबई भेजा था. इसके बाद जब कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना के बीच सरकार बनाने को लेकर शुक्रवार को सहमति बन गई तो राकांपा के विधायक दल के नेेता के तौर पर अजित पवार ने पार्टी विधायकों से सरकार बनाने के लिए उनके समर्थन पत्र लिये. इन पत्रों का इस्तेमाल उन्होंने भाजपा की सरकार बनवाने के लिये किया.

एनसीपी नेता नवाब मलिक का कहना है कि ये पत्र शिवसेना-राकांपा और कांग्रेस गठबंधन के सरकार गठन के दावे का समर्थन करने के लिये थे. इस संबंध में शरद पवार का कहना है कि वे अभी भी शिवसेना के नेतृत्व वाले गठबंधन का समर्थन करते हैं और उनके भतीजे ने अपने मन से यह कदम उठाया है.

शिवसेना, कांग्रेस और राकांपा ने सरकार बनाने के लिए शुक्रवार रात गठबंधन को अंतिम रूप दिया और तीनों दल शनिवार को राज्यपाल से मिलने वाले थे. कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के मुताबिक शुक्रवार शाम को मुंबई के नेहरू केंद्र में हुई तीनों दलों की बैठक में अजित पवार भी मौजूद थे. लेकिन उनके भाजपा के खेमे में चले जाने के बाद प्रदेश में 12 नवंबर से लगे राष्ट्रपति शासन को शनिवार सुबह पांच बजकर 47 मिनट पर हटा दिया गया. इसके बाद सुबह साढ़े सात बजे देवेंद्र फड़णवीस ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और अजित पवार ने उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.

कांग्रेस के एक नेता ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर पीटीआई-भाषा को बताया कि उनकी पार्टी को इस बात का संदेह था कि अगर कांग्रेस-एनसीपी-शिवसेना के बीच गठबंधन नहीं हुआ, तो एनसीपी का एक वर्ग भाजपा के साथ हाथ मिला सकता है. ये कांग्रेस नेता आरोप लगाते हैं कि, “भाजपा का शीर्ष नेतृत्व (एनसीपी नेता) प्रफुल्ल पटेल के माध्यम से कोशिश कर रहा था कि शरद पवार भाजपा के साथ आ जाएं. उनका कहना था कि इससे पटेल और अजित पवार को प्रवर्तन निदेशालय की जांच में मदद मिलेगी.”

लेकिन इनके अलावा एक और वजह थी जिसकी वजह से भाजपा को फिलहाल तो एक बार फिर से महाराष्ट्र की सत्ता मिल गई है. यह वजह है शरद पवार के परिवार में कुछ महीनों से चल रही तकरार. सूत्रों के मुताबिक इसमें एक तरफ अजित पवार थे और दूसरी तरफ शरद पवार और उनकी बेटी सुप्रिया सुले. यह विवाद लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव के दौरान टिकट बंटवारे को लेकर काफी बढ़ गया था.

अजित पवार के भाजपा से मिल जाने पर एक एनसीपी नेता कहते भी हैं कि “हम इस पूरे घटनाक्रम को पारिवारिक विवाद के रूप में देख रहे हैं, जो खुलकर सामने आ गया है.”

पीटीआई सूत्रों हवाले से बताती है कि अजित पवार उस समय नाराज हुए जब उनके बेटे को पहले लोकसभा चुनाव में एनसीपी का टिकट देने से इनकार किया गया और बाद में वह टिकट मिलने के बाद भी हार गए. इसके अलावा शरद पवार के एक अन्य भाई के पोते रोहित पवार के उदय और विधानसभा चुनाव में उनकी जीत से भी अजित पवार में असुरक्षा की भावना बढ़ गई थी.

परिवार में सबकुछ ठीक नहीं है, इसका आभास पिछले सप्ताह उस समय भी हुआ, जब शरद पवार के निवास ‘‘सिलवर ओक’’ में राकांपा की एक बैठक से अजित पवार यह कहते हुए निकल आए कि कांग्रेस के साथ प्रस्तावित बैठक रद्द हो गई है और वे अपने विधानसभा क्षेत्र बारामती जा रहे हैं. हालांकि, बाद में यह बैठक हुई और इस पर एनसीपी नेता ने कहा कि यह मीडिया को दूर रखने की एक कोशिश थी.

इससे पहले लोकसभा चुनाव के दौरान शरद पवार ने अपने खिलाफ चल रही जांच के मामले में ईडी के कार्यालय जाने का निर्णय लिया था. उस समय पूरे राज्य के कार्यकर्ता मुंबई आने लगे थे लेकिन अजित पवार सीन से नदारद थे. फिर उसी शाम उन्होंने विधायक के पद से इस्तीफा दे दिया. इसे ध्यान भटकाने की कोशिश माना गया. अगले दिन अजित पवार का कहना था कि उन्होंने इसलिए इस्तीफा दिया क्योंकि ईडी ने महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक घोटाले में न सिर्फ उनका बल्कि शरद पवार का नाम भी लिया.

अभी यह स्पष्ट नहीं है कि राकांपा के 54 विधायकों में कितने अजित पवार के समर्थन में हैं. शरद पवार का दावा है कि अजित पवार के शपथ लेने के दौरान सिर्फ एक दर्जन विधायक ही उनके साथ थे, जिसमें से तीन पार्टी के पास वापस आ चुके हैं और दो अन्य वापस आ सकते हैं. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा विधानसभा में अपना बहुमत किस तरह से सिद्ध करती है.