कहने को तो हमारे आस-पास और दूर-दराज़ बहुत कुछ तेज़ी से बदल रहा है, इतनी तेज़ी से कि उसका आशय समझने तक के लिए कुछ ठिठकने की मुहलत नहीं मिलती. जो बदल कर आता है वह भी जल्दी ही फिर बदल जाता है. ज़्यादातर बदलाव आम ज़िन्दगी में इस्तेमाल की रही तकनालजी में हो रहे हैं. हर यन्त्र तेज़ी से एक बेहतर यन्त्र से अपदस्थ किया जा रहा है: जिसके पास सबसे ताज़ातरीन फ़ोन न हो जिसमें उपयोगी-अनुपयोगी सौ तरह की सुविधाएं न हों, वह न सिर्फ़ पिछड़ा या पिछड़ता माना जायेगा बल्कि खुद भी ऐसा ही महसूस करेगा. हम इससे पहले शायद तकनालजी के बस में इतना कभी नहीं हुए थे जितना आज हो गये हैं: तकनालजी अब जीने की गुणवत्ता का प्रतिमान ही बन गयी है.

इस बहुतायत ने ज़िन्दगी को पाट सा दिया है. हमें अब हर चीज़ ज़्यादा चाहिये. बरसों पहले हमने इसे नयी गोदामियत कहा था- वह अब अधिक व्यापक हो गयी है. हम सभी अपने अपने गोदाम भरने में लगे हैं. कम से कम की बात करना या किसी से सुन पाना मुहाल हो गया है. हमारे कई बुनियादी मनोभावों को व्यक्त करने के तरीके से सिरे से बदल गये हैं: जहां पहले विस्तार की ज़रूरत होती थी वहां अब संक्षेप काफ़ी है. जहां संक्षेप से काम चलता है वहां अब विस्तार ज़रूर हो गया है. पहले हमारा काम थोड़ी-बहुत बातचीत से चल जाता था: अब हम लगातार बात करते रहते हैं. दुनिया में करोड़ों लोगों का लगातार बतियाने की मात्रा इन दिनों अभूतपूर्व है. विडम्बना यह है कि हम बात तो बहुत कर रहे हैं, संवाद नहीं. शब्द हैं कोष में, साहित्य में पर हम उनमें से अधिकांश का उपयोग करने में असमर्थ हैं- हमें उनकी कोई ज़रूरत नहीं लगती. हमारी धैर्य और प्रतीक्षा की शक्ति भी घट रही है. हम बेहद अधीरता की चपेट में हैं: हमें हर जगह जल्दी पहुंचने की हड़बड़ी है और उसमें हम दुर्घटनाएं करने से बाज़ नहीं आते. वे सारी चीज़ें, जो धैर्य से पढ़े-सुने-गुने-देखे जाने की मांग करती रही हैं, जैसे साहित्य, कलाएं, संगीत, नृत्य आदि, सब हमारी अधीरता के शिकार हो रही हैं. खुद उनमें, दुर्भाग्य से, हड़बड़ी का काव्यशास्त्र विकसित हो गया है. झटपटिया रसिकता से लेकर झटपटिया उपन्यास, कहानी, कविता, संगीत, नृत्य आदि सब इन दिनों फल फूल रहे हैं.

इस झटपटियापन का प्रभाव राजनीति, मीडिया, सामाजिक व्यवहार, शिक्षा आदि सभी क्षेत्रों में पड़ और बढ़ रहा है. इन सभी में मूलगामी दृष्टि और दूर तक का सपना देखने वाली दृष्टियां धीरे-धीरे ग़ायब हो रही हैं. एक विचित्र अर्थ में तेज़ प्रक्रिया ही अपने आप में मूल्य बन गयी है: उस प्रक्रिया की क्या परिणति होगी इसकी चिन्ता करना लगभग समाप्त हो रहा है.

बड़ा युग, छोटा जीवन

हिन्दी अपने इतिहास के उस मुक़ाम पर पहुंच गयी है कि उसके एक निर्णायक संचयन ‘तार सप्तक’ में शामिल सभी सात कवि अब दिवंगत हैं और हाल के वर्षों में उनमें से सभी की जन्मशतियां हुई हैं. इस सप्तक में से पहले कवि मुक्तिबोध का निधन 47 वर्ष की आयु पूरी होने पहले हुआ और दूसरे कवि भारत भूषण अग्रवाल का निधन 56 बरस की आयु पूरी करने के पहले हुआ. मुझे यह सौभाग्य मिला है कि मैंने सप्तक-श्रृंखला के चार कवियों की प्रतिनिधि कविताएं चुनी और पुस्तकाकार संपादित कीं. भारत जी की ‘प्रतिनिधि कविताएं’ राजकमल से 2004 में प्रकाशित हुई थी जिसकी आवृत्ति 2015 में हुई.

कुल 38 वर्ष की आयु में भारत जी ने एक कविता लिखी थी: ‘समाधि-लेख’:

रस तो अनन्त था, अंजुरी भर ही पिया

जी में वसन्त था, एक फूल ही दिया

मिटने के दिन आज मुझको यह सोच है:

कैसे बड़े युग में कैसा छोटा जीवन जिया!

भारत जी उस पीढ़ी के उन कवियों में से थे जो कविता को अतिशयोक्ति या अधिमूल्यन के बजाय निर्मम आत्मावमूल्यन की जगह मानते थे. 1935 में याने अपने कविमित्र मुक्तिबोध की मृत्यु के बाद भारत जी उन पर एक कविता ‘एक उठा हुआ हाथ’ लिखी. उसका समापन इस तरह होता है:

तूफ़ान अब थम गया है.

हम अब भी उथले जल में किलोलें कर रहे हैं

क्योंकि न नाव है न फ़ोटोग्राफ़र

पर मुझ अब भी दीख रहा है

वहां दूर, मझधार में लहरों के ऊपर उठा हुआ

पताका-सा तुम्हारा हाथ

तुम्हारी जल-समाधि का निशान.

भारत जी को जीवन भर अपनी साधारणता का एहतराम करने और उसी से बिना किसी नाटकीयता के उसी से अपनी कविता बनाने की कोशिश की. इसी साधारण की विडम्बना ने उन्हें उनका अचूक विनोद-भाव दिया और उसका भरपूर इस्तेमाल करते हुए उन्होंने तुक्तक दिखे. एक तुक्तक यों हैं:

रास्ते में मिला जब अरोड़ा को रोड़ा

थाम के लगाम झट रोक दिया घोड़ा

उठाया जो कोड़ा

घोड़ा ने झिंझोड़ा

थोड़ा हंस छोड़ा, घोड़ा अरोड़ा ने मोड़ा.

तुक पर हिन्दी में असली महारत मैथिली शरण गुप्त को हासिल थी और भारत जी ने उनसे सीखकर उसका अद्भुत व्यंग-विनोद के लिए पुनराविष्कार किया.

बन्दी जीवन

यह बात सभी साहित्य-प्रेमी जानते हैं कि अज्ञेय ब्रिटिश सरकार के समय 1933-38 के बीच जेल में रहे थे जहां रहते उन्होंने हिन्दी के क्लैसिक उपन्यास ‘शेखर एक जीवनी’ लिखा. उस समय उनकी अंग्रेज़ी में लिखी कविताओं का एक संकलन ‘प्रिज़न डेज़ एण्ड अदर पोएम्स’ नाम से जवाहरलाल नेहरू की भूमिका के साथ प्रकाशित हुआ था. इन अंग्रेज़ी कविताओं का हिन्दी में अनुवाद कवि-विद्वान नन्दकिशोर आचार्य ने ‘बन्दी जीवन और अन्य कविताएं’ नाम से किया है और राजकमल ने रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत उसे प्रकाशित किया है.

नेहरू जी ने अपनी भूमिका में कहा है: ... उन सपनों का बहुत सा इन कविताओं में है, उस ललक का जब बांहें उसके लिए फैलती हैं जो नहीं है और एक ख़ालीपन हाथ आता है. कुछ वह शान्ति और तसल्ली जिन्हें हम उस दुःखभरी दुनिया में भी किसी तरह पा लेते थे. कल की उम्मीद हमेशा थी, कल जो शायद हमें आज़ादी दे. इसलिए मैं इन कविताओं को पढ़ने की सलाह देता हूं और शायद वे मेरी ही तरह दूसरों को भी प्रभावित करेंगी.’ नन्दकिशोर जी ने मनोयोग से कविताओं का अनुवाद उस काव्यभाषा में किया है जो उस समय अज्ञेय हिन्दी में प्रयोग करते थे.

कुछ अंश देखें:

आमने-सामने की सलाखें हैं

आमने-सामने की सलाखें हैं

जीवन यह सारा

हर सवेरे लेकिन

जान लें यदि हम

एक ही लय में धड़कता है

अन्य का भी हृदय

तो क्या चमकता नहीं रहेगा सदा

प्रसन्न लाल सूरज

अनन्त के हर सवेरे.

........

पिसाई, पिसाई, पिसाई

इसी तरह गुज़रेगा मेरा दिन

पिसते हुए दोनों के बीच

गाढ़ी बूंदें मेरी अँधियारी पराजय की–

होती नहीं जब तक शाम

और उठूंगा तब एक शपथ के साथ.