1-महाराष्ट्र में शनिवार का दिन तूफानी राजनीतिक हलचलों से भरा रहा. एक दिन पहले तक तक शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे का मुख्यमंत्री बनना तय होने की खबर आ रही थी तो शनिवार सुबह होते-होते पता चला कि एक बार फिर भाजपा के देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है और उन्हें एनसीपी का समर्थन मिला है. थोड़ी ही देर बाद एनसीपी मुखिया शरद पवार ने कहा कि सिर्फ उनके भतीजे और डिप्टी सीएम बने अजित पवार भाजपा के साथ गए हैं और ज्यादातर विधायक उनके साथ हैं. अब सारी नजरें बहुमत परीक्षण पर लग गई हैं. बीबीसी पर दिलनवाज़ पाशा की यह रिपोर्ट इससे आगे के समीकरणों की थाह लेने की कोशिश करती है.

महाराष्ट्रः क्या बीजेपी का दांव उल्टा भी पड़ सकता है?

2-सोना हर कोई खरीदना चाहता है. चीन के बाद इसका सबसे बड़ा खरीदार भारत है. लेकिन आतंकी संगठन भी इस धातु का खूब इस्तेमाल कर रहे हैं. डॉयचे वेले हिंदी पर छपी यह रिपोर्ट बताती है कि मध्य-पूर्व में जमीन खिसकने के बाद अल कायदा और इस्लामिक स्टेट से जुड़े गुट अफ्रीका में फैल रहे हैं जहां इनकी नजर सोने की खानों पर है. और यह सोना दुनिया भर के स्थानीय बाजारों में भी आ रहा है.

कहीं आप इस्लामिक स्टेट और अलकायदा का सोना तो नहीं खरीद रहे

3-हाल में गांधी परिवार की एसपीजी सुरक्षा हटाए जाने को लेकर कांग्रेस ने भाजपा पर तीखा हमला बोला. इस मुद्दे पर संसद में भी काफी बहस हुई. कांग्रेस ने आरोप लगाया कि भाजपा की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने यह कदम राजनीति से प्रेरित होकर उठाया है. लेकिन क्या यह सच है? द प्रिंट हिंदी पर इस सवाल का जवाब तलाशता अनूप भटनागर का लेख.

साये की तरह रहने वाली एसपीजी सुरक्षा व्यवस्था की अनदेखी क्यों कर रहा था गांधी परिवार

4-राजस्थान की सांभर झील में प्रवासी पक्षियों की मौत का सिलसिला बीते दो हफ्तों से जारी है. अब तक 20 हजार से ज्यादा पक्षी मारे जा चुके हैं. मौत की अलग-अलग वजह बताई जा रही हैं. 10 दिनों में सरकार और तमाम एजेंसियां किसी एक नतीजे पर नहीं पहुंच सकी हैं कि आखिर पक्षियों की मौत का कारण क्या है. लेकिन डाउन टू अर्थ पर माधव शर्मा का यह लेख बताता है कि पक्षी ही नहीं, सांभर झील भी धीरे-धीरे मर रही है.

पक्षी ही नहीं सांभर झील भी मर रही है अपनी मौत, 25 साल पहले लिखी थी पटकथा

5-बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में फ़िरोज़ ख़ान के संस्कृत पढ़ाने पर विवाद हो रहा है. समर्थन और विरोध करने वालों के अपने-अपने तर्क हैं. एनडीटीवी पर प्रियदर्शन की यह टिप्पणी बताती है कि श्रेष्ठता का अहंकार पालने वाले लोगों को अंततः इतिहास धूल में मिला देता है और एक भाषा के तौर पर संस्कृत का हाल इसका उदाहरण है

शंबूक पैदा होते रहेंगे, संस्कृत का क्या होगा?