महाराष्ट्र में शुक्रवार की रात में जो राजनीतिक उलटफेर हुआ उसका परिणाम शनिवार की सुबह दिखा. देवेंद्र फडणवीस ने एक बार फिर से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी प्रमुख शरद पवार के भतीजे अजित पवार प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बन गए. इसके बाद बहुत सारे लोगों ने यह कहना शुरू किया कि राजनीति के धुरंधर माने जाने वाले शरद पवार को उनके भतीजे अजित पवार ने ही पटखनी दे दी. लोग कहने लगे कि चुनावी राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा करने वाले शरद पवार से उनकी पार्टी छीनने का काम उनके भतीजे अजित पवार ने कर दिया. लेकिन बहुत तेजी से बदले इन घटनाक्रमों के 12 घंटों के अंदर ही यह साफ हो गया कि शरद पवार ही अब भी एनसीपी के बाॅस हैं और अजित पवार बहुत बुरे फंस गए हैं.

जब अजित पवार ने आनन-फानन में भाजपा का समर्थन करके देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री बनवाया तो उनकी ओर से यह दावा किया गया था कि पार्टी के कुल 54 विधायकों में से 35 उनके साथ हैं. अगर दो-तिहाई या उससे ज्यादा विधायक या सांसद किसी दल से अलग होते हैं तो दल-बदल कानून लागू नहीं होता है और उनकी सदस्यता नहीं जाती है. एनसीपी के विधायकों के मामलों में यह संख्या 36 होती है. अगर 35 विधायक अजित पवार के साथ होते तो एक विधायक का और बंदोबस्त करके वे आसानी से एनसीपी तोड़ सकते थे.

लेकिन शाम होते-होते यह स्पष्ट हो गया कि एनसीपी के अधिकांश विधायक अब भी शरद पवार के साथ ही हैं. शनिवार की शाम शरद पवार ने एनसीपी विधायकों की जो बैठक की, उसके बारे में बताया गया कि उसमें एनसीपी के 54 में से 49 विधायक शामिल थे. खबर लिखे जाने तक यह जानकारी आ रही है कि एनसीपी के 51 विधायक शरद पवार के साथ आ गए हैं और दो अन्य विधायकों ने भी उनके साथ होने की बात दोहराई है. अगर यह सच है तो बगावत करने वाले अजित पवार ही एनसीपी के इकलौते विधायक बचे हैं जो फिलहाल भाजपा के खेमे में दिख रहे हैं.

इन घटनाक्रमों के बारे में कुछ राजनीतिक जानकारों को यह लग रहा है कि महाराष्ट्र में जो कुछ हो रहा है, शरद पवार उसके शिकार नहीं बल्कि उसके केंद्र में हैं. अब यह कहना तो मुश्किल है कि सीनियर पवार ने किसी योजना के तहत अजित पवार के जरिये भाजपा की फजीहत करने की योजना बनाई थी. लेकिन राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं माना जाता.

अगर शरद पवार ने खुद ऐसा नहीं भी किया हो तो भी यह माना जा सकता है कि शनिवार की सुबह तक महाराष्ट्र की राजनीति में सबसे हारे हुए खिलाड़ी माने जाने वाले पवार ही इस खेल के अंत में सबसे मजबूत सियासी खिलाड़ी के तौर पर उभरते दिख रहे हैं. इसमें यह भी लग रहा है कि चाहे जिन भी परिस्थितियों में महाराष्ट्र में जो भी चल रहा है, उसमें पवार जिस तरह की सूझबूझ दिखा रहे हैं, उससे एक साथ उनके कई निशाने सधते दिख रहे हैं.

पवार परिवार में आंतरिक मतभेद की खबरें पहले भी आती रही हैं. माना जाता है कि शरद पवार के बाद उनकी विरासत को लेकर उनकी बेटी सुप्रिया सुले और भतीजे अजित पवार के बीच एक तरह का संघर्ष लगातार चल रहा है. हालांकि, शरद पवार अक्सर कहते आए हैं कि सुप्रिया सुले की दिलचस्पी केंद्र की राजनीति में है और वे लोकसभा सांसद के तौर पर दिल्ली की राजनीति कर रही हैं. वहीं अजित पवार महाराष्ट्र की राजनीति में सक्रिय हैं. लेकिन अब जो हो रहा है उससे ऐसा लगता है कि अजित पवार एनसीपी में नेतृत्व की दौड़ से बाहर हो गये हैं. यानी जब तक कोई और भी विचित्र खेल सामने ना आये, शरद पवार की राजनीतिक विरासत अजित पवार के हाथ से फिसल गई लगती है.

महाराष्ट्र में बन रही राजनीतिक परिस्थितियों के बीची अगर देवेंद्र फडणवीस बहुमत साबित करने में असफल होते हैं तो यह उनके राजनीतिक सफर के लिए भी बहुत बुरा होगा. बहुत कम उम्र में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने वाले देवेंद्र फडणवीस के बारे में यह माना जाता था कि उनका राजनीतिक भविष्य सिर्फ इसी प्रदेश तक सीमित नहीं है बल्कि दिल्ली की राजनीति में भी आने वाले दिनों में उनकी प्रमुख भूमिका हो सकती है. नरेंद्र मोदी और अमित शाह के दौर में भाजपा के पहले क्षत्रप के तौर पर उनकी गिनती होने लगी थी.

लेकिन अब जो राजनीतिक परिस्थितियां बनती हुई दिख रही हैं, उनमें एनसीपी के विधायक अजित पवार के साथ नहीं दिख रहे हैं. इसका मतलब यह हुआ कि देवेंद्र फडणवीस के लिए विधानसभा में बहुमत साबित करना अब आसान साबित नहीं होने जा रहा है. ऐसी परिस्थिति में फडणवीस के लिए आगे का राजनीतिक सफर काफी मुश्किल हो सकता है. चुनाव प्रचार के दौरान फडणवीस पवार पर भी हमले करते आए हैं. मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को पवार जिस तरह से अपने पक्ष में मोड़ते हुए दिख रहे हैं, उससे देवेंद्र फडणवीस भी उनके शिकार होते दिख रहे हैं.

लेकिन शरद पवार की राजनीतिक सूझबूझ के सबसे बड़ा असर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर होता दिख रहा है. भाजपा सूत्रों के मुताबिक अजित पवार के कहने पर भाजपा के महाराष्ट्र प्रभारी भूपेंद्र यादव ने अमित शाह को और बाद में भाजपा अध्यक्ष ने नरेंद्र मोदी को बहुमत का भरोसा दिलाया था. लेकिन अब जिस तरह से भाजपा के पक्ष में संख्या बल नहीं दिख रहा है, उसमें अगर फडणवीस सरकार बहुमत नहीं साबित कर पाती है तो इससे सबसे अधिक किरकिरी पार्टी और उसके दोनों शीर्ष नेताओं - नरेंद्र मोदी और अमित शाह - की ही होगी. ऐसे में लोग कहेंगे कि आखिर किस आधार पर इन लोगों ने बगैर कैबिनेट की बैठक बुलाए आनन-फानन में राष्ट्रपति शासन हटाने और राज्यपाल के जरिए भाजपा सरकार को शपथ दिलाने का का काम किया.

अमित शाह ने पिछले कुछ सालों में अपनी छवि राजनीतिक चाणक्य की बनाई है. उनके बारे में माना जाता है कि वे जोड़-तोड़ करके सरकार बनाने में माहिर हैं. शनिवार को जब फडणवीस ने बतौर मुख्यमंत्री दोबारा शपथ ली तो अमित शाह की तारीफ में न सिर्फ भाजपा नेताओं ने बल्कि मीडिया के एक वर्ग ने भी काफी चर्चा की. लेकिन अब जब ऐसा लग रहा है कि फडणवीस के लिए बहुमत साबित करना आसान नहीं है तो इससे अमित शाह की उस चाणक्य वाली छवि को धक्का लगेगा जिसकी तारीफ करते हुए उनकी पार्टी के अधिकांश नेता थकते नहीं हैं. इसके बाद पूरे देश में शरद पवार को लेकर यह संदेश जाएगा कि चाणक्य अमित शाह पर पवार की चाणक्य नीति भारी पड़ गई.

कुल मिलाकर महाराष्ट्र की राजनीति में पिछले कुछ दिनों में राजनीतिक घटनाक्रम जिस तेजी से बदले हैं, उसमें तमाम उठापटक के बावजूद अंतिम बाजी शरद पवार के हाथों ही लगती दिख रही है.