महाराष्ट्र के राजनीतिक परिवारों में चाचा-भतीजे की लड़ाई कोई नई बात नहीं है. इनमें सबसे ताजा मामला पवार परिवार का है. जहां चाचा शरद पवार और भतीजे अजित पवार की लड़ाई के चलते महाराष्ट्र की राजनीति ने एक अजीबोगरीब मोड़ ले लिया है. इसके चलते राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में काफी बेचैनी है. लेकिन, महाराष्ट्र में एनसीपी से पहले शिवसेना और भाजपा भी राजनीतिक चाचा-भतीजों की लड़ाई से दो-चार हो चुकी हैं.

गत शनिवार को अजित पवार पार्टी संरक्षक एवं अपने चाचा शरद पवार के विरुद्ध चले गए और भाजपा के साथ मिलकर राज्य के उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण कर ली. इससे एक दिन पहले ही एनसीपी ने अद्धव ठाकरे के नेतृत्व में शिवसेना और कांग्रेस के साथ मिलकर महाराष्ट्र में सरकार बनाने की घोषणा की थी. अजित पवार की बगावत ने न सिर्फ एनसीपी को झकझोर कर रख दिया, बल्कि पवार परिवार को भी अंदर तक हिला दिया.

अपने भाई अनंत राव की मौत के बाद शरद पवार ने उनके बेटे अजित पवार को अपने संरक्षण में ले लिया था. अजित पवार ने 1991 में पहली बार बारामती से संसदीय चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की थी. शरद पवार जब 1991 में पीवी नरसिम्हा राव सरकार में रक्षा मंत्री बने तो अजित ने यह सीट उन्हें दे दी.

सात बार विधायक और पूर्व में उपमुख्यमंत्री रहे अजित पवार को काफी समय से एनसीपी प्रमुख के राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाने लगा था. लेकिन तनाव तब शुरू हुआ जब शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले ने राजनीति में प्रवेश किया.

इसी तरह का विवाद ठाकरे परिवार में भी लगभचुग एक दशक पहले हुआ था. उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के बीच विवाद के चलते अंतत: शिवसेना दो फाड़ हो गई. बाल ठाकरे ने भतीजे की तुलना में अपने बेटे उद्धव को तवज्जो दी और राज ठाकरे ने अपनी नई पार्टी - महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना - बना ली.

पवार और ठाकरे परिवार की तरह मुंडे परिवार में भी ऐसा ही विवाद हो चुका है. वर्ष 2009 में जब ओबीसी नेता गोपीनाथ मुंडे बीड से लोकसभा चुनाव जीते तो ज्यादातर लोगों ने सोचा कि उसी साल होने वाले विधानसभा चुनाव में वे अपने भतीजे धनंजय मुंडे को मैदान में उतारेंगे. लेकिन इसकी जगह उन्होंने अपनी बेटी पंकजा मुंडे को परली सीट से चुनाव लड़वाया. इससे चाचा-भतीजे के बीच का मनभेद और गहरा गया. इसके बाद धनंजय मुंडे एनसीपी में शामिल हो गए. बाद में वे विधान परिषद में नेता विपक्ष भी बने.

गोपीनाथ मुंडे के निधन के बाद मुंडे परिवार की अंदरूनी प्रतिद्वंद्विता अकसर सुर्खियों में आती रही. 2014 में पंकजा मुंडे ने परली से अपने चचेरे भाई को हरा दिया. वहीं, 2019 में धनंजय मुडे ने बाजी पलटते हुए पंकजा को 2019 में हरा दिया.

महाराष्ट्र में ऐसा ही एक कम चर्चित उदाहरण और है. पिछले महीने हुए विधानसभा चुनाव में शिवसेना के जयदत्त क्षीरसागर को उनके भतीजे और एनसीपी उम्मीदवार संदीप क्षीरसागर ने बीड सीट से हरा दिया था.