महाराष्ट्र में भाजपा को झटका देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कल बहुमत परीक्षण का आदेश दिया है. बीते शनिवार को देवेंद्र फडणवीस के शपथ ग्रहण पर सवाल उठाते हुए शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कि वह तुरंत बहुमत परीक्षण का आदेश दे. भाजपा ने इसके लिए कुछ दिनों का समय मांगा था. महाराष्ट्र में हालात को असाधारण बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बहुमत परीक्षण कल शाम पांच बजे हो और इसकी वीडियोग्राफी करवाई जाए.

अब सबकी नजरें कल पर टिक गई हैं. उधर, बीते शनिवार को महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने वाले एनसीपी नेता अजित पवार अभी भी पार्टी के विधायक दल के नेता हैं या नहीं, इस पर स्थिति स्पष्ट नहीं है. पीटीआई के मुताबिक इस बारे में विधानसभा अधिकारियों और संविधान विशेषज्ञों ने अलग-अलग राय जाहिर की है. प्रदेश विधानसभा के प्रभारी सचिव राजेंद्र भागवत की मानें तो यह निर्णय करने का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष को है कि क्या जयंत पाटिल को एनसीपी के विधायक दल का नया नेता माना जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, ‘एनसीपी से उनके नये नेता के बारे में हमें एक पत्र प्राप्त हुआ है, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष (हरिभाऊ बागडे) इस पर निर्णय करेंगे.’ उधर, विधान भवन के एक सूत्र ने बताया कि विधानसभा अध्यक्ष ने अबतक अजित पवार को हटा कर जयंत पाटिल को विधायक दल का नेता बनाये जाने के एनसीपी के निर्णय को स्वीकार नहीं किया है. पिछले हफ्ते पार्टी से बगावत कर अजित पवार द्वारा प्रदेश में सरकार बनाने के लिए भाजपा को समर्थन देने के बाद एनसीपी ने उन्हें विधायक दल के नेता पद से हटा दिया था. इस पद के सभी अधिकार जयंत पाटिल को सौंप दिए गए थे.

भाजपा नेता हरिभाऊ बागड़े विधानसभा के पिछले कार्यकाल में 2014 से 19 तक सदन के अध्यक्ष रह चुके हैं. तकनीकी तौर पर अब भी वे विधानसभा के अध्यक्ष हैं, हालांकि किसी विधायक ने अब तक शपथ नहीं ली है. उधर, मुंबई भाजपा के पूर्व प्रमुख आशीष शेलार ने कहा कि नयी विधानसभा अभी शुरू नहीं हुई है इसलिए अजित पवार एनसीपी के विधायक दल के नेता हैं और सरकार बनाने के लिए भारतीय जनता पार्टी को समर्थन देने का उनका निर्णय सर्वोच्च माना जाना चाहिए. उन्होंने कहा, ‘इस पर कोई विवाद नहीं हो सकता.’

हालांकि, संविधान विशेषज्ञों की राय उलट है. संविधान संबंधी मामलों के जानकार उल्हास बापट का मानना है कि अगर एनसीपी ने अजित पवार को हटा कर जयंत पाटिल को विधायक दल का नेता नियुक्त किया है तो उनको ही विधानसभा में पार्टी विधायक दल का नेता समझा जाना चाहिए.

उल्हास बापट ने कहा, ‘ये सच है कि विधानसभा अध्यक्ष के पास विवेकाधीन शक्तियां हैं लेकिन वे (बागड़े) अजित पवार को हटा कर जयंत पाटिल को सदन में विधायक दल का नेता नियुक्त किए जाने के पार्टी के फैसले की अनदेखी नहीं कर सकते.’ उनका आगे कहना था, ‘जब संविधान तैयार किया जा रहा था, तो उसमें इसका स्पष्ट उल्लेख किया गया कि पार्टी को एक व्यक्ति के हित से अधिक महत्वपूर्ण समझा जाना चाहिए . इसलिए, प्रदेश में भाजपा की सरकार को समर्थन दिये जाने के मामले में अगर एनसीपी की राय अजित पवार से अलग है तो पार्टी का निर्णय सर्वोच्च होगा.’