कानून व्यवस्था का सवाल उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के लिए उसी तरह की मुसीबत बना हुआ है जैसा वह अखिलेश सरकार के दिनों में हुआ करता था. कानून-व्यवस्था के सवाल पर ही बीजेपी अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार का सफाया कर सत्ता में आई थी, लेकिन ढाई साल बाद भी योगी आदित्यनाथ की सरकार इस मोर्चे पर कुछ भी ऐसा नहीं कर पाई है जिसे उल्लेखनीय माना जा सके. थानों में मनमानी, पुलिस की खुली लूट, राजनैतिक दबाव में अपराधियों को संरक्षण आदि सभी पुराने हथकंडे बदस्तूर जारी हैं. पत्रकारों का पुलिस उत्पीड़न बढ़ता जा रहा है, उस पर सरकार के जिम्मेदार मंत्री भी यदा-कदा ऐसे कारनामे करते ही रहते हैं जिनसे योगी सरकार के सामने नई समस्याएं खड़ी हो जाती हैं.

ताजा मामला उत्तर प्रदेश की एक चर्चित मंत्री स्वाति सिंह का है. स्वाति सिंह भाजपा नेता दयाशंकर सिंह की पत्नी हैं. दयाशंकर सिंह को बीजेपी के बड़े नेताओं का करीबी माना जाने के साथ-साथ पार्टी के लिए कोष जमा करवाने के मामले में भी काफी कारगर माना जाता है. मायावती के खिलाफ एक अशोभनीय टिप्पणी करने के कारण दयाशंकर सिंह बसपाइयों के निशाने पर आ गए थे. इसके बाद जब बसपा के बड़े नेताओं ने दयाशंकर सिंह की बेटियों के बारे में अमर्यादित बयान दिए तो उनकी पत्नी स्वाति सिंह सामने आ गईं. स्वाति ने अपना घरेलू महिला का चोला उतार कर आक्रामकता अपना ली और बसपा के नेताओं को ऐसे तीखे बयानों से घेरा कि मायावती तक उनके निशाने पर आ गईं.

अपने इस नए रूप में स्वाति सिंह रातों-रात एक ममतामयी मां के साथ-साथ एक आक्रामक महिला नेता के रूप में भी मीडिया की सुर्खियों में आ गईं. उस समय दयाशंकर सिंह को तो पार्टी के पदों से इस्तीफा और निलम्बन की सजा मिली मगर स्वाति सिंह बीजेपी के महिला मोर्चे की पदाधिकारी बन गईं. इसके बाद विधानसभा चुनाव में लखनऊ की एक सीट से बीजेपी ने टिकट दे दिया और वे अपना पहला चुनाव ही जीतकर महिला कल्याण विभाग की राज्य मंत्री भी बन गईं.

लेकिन मंत्री बनने के कुछ समय बाद ही उनकी तेजतर्रार छवि पर सवाल उठने भी शुरू हो गए. यहां तक कि योगी मंत्रीमण्डल के पहले फेरबदल में उनका पद छिनने की चर्चाएं भी थीं. मगर सूत्रों के मुताबिक अंतिम क्षणों में ‘ऊपर के आदेश’ से उनकी कुर्सी बच गयी. लेकिन अब गता है कि ऐसा ही एक और ‘ऊपर का आदेश’ उनके खुद के और योगी सरकार के लिए भी एक बिन बुलाई आफत बन गया है. यह आफत एक वाइरल मोबाइल रिकार्डिंग के जरिए आई है. यह रिकार्डिंग कथित तौर पर लखनऊ की एक पुलिस क्षेत्राधिकारी डॉक्टर वीनू सिंह और स्वाति सिंह के बीच की है. इसमें स्वाति सिंह पुलिस क्षेत्राधिकारी को लखनऊ के केंट थाने में चर्चित अंसल बिल्डर्स के विरूद्ध एक एफआईआर लिखे जाने को लेकर हड़का रही हैं. बातचीत का एक अंश इस तरह है -

राज्य मंत्री स्वाति सिंह - गुड इवनिंग सीओ साहब. आपने अंसल का कोई एफआईआर लिखा है, अंसल पे...

सीओ - हां एक कनौडिया करके थे. पति-पत्नी का मैटर था, उसमें लिखा गया था.

राज्यमंत्री स्वाति सिंह - क्यों लिखा आपने? आपको पता नहीं है, ऊपर से आदेश है, कोई एफआईआर नहीं लिखा जाएगा. सारे फेक एफआईआर लिखे जा रहे हैं, उसके ऊपर...

सीओ - नहीं, वो तो जांच करके लिखी गई थी.

राज्यमंत्री स्वाति सिंह - कौन सी जांच हो गई, भई कौन सी जांच हो गई. इतना हाई प्रोफाइल केस है. पूरा जांच चल रहा है. आप कौन सी जांच कर रही हैं...

इस वीडियो के वाइरल होने के बाद पहले तो पुलिस अधिकारियों ने मामले में लीपापोती करने का प्रयास किया. लेकिन जब मामले ने तूल पकड़ लिया और मीडिया से लेकर राजनैतिक मंचों तक से योगी सरकार पर हमले किए जाने लगे तो राज्य के पुलिस महानिदेशक को बचाव के लिए सामने आना पड़ा. पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह ने इस वायरल रिकार्डिंग की जांच का आदेश देते हुए रिकार्डिंग की फोरेंसिक जांच भी करवाने की घोषणा की. लेकिन वे यह बताना भी नहीं भूले कि इस बात की भी जांच कराई जाएगी कि आखिर यह रिकार्डिंग सार्वजनिक कैसे हुई है और किसने कराई है.

रिकार्डिंग के सार्वजनिक होने की जांच की यह बात कहकर डीजीपी ने यह संकेत तो दे ही दिए हैं कि मामले की दाल में बहुत कुछ काला है. जाहिर है अगर यह बातचीत मंत्री स्वाति सिंह और क्षेत्राधिकारी डॉ वीनू सिंह के बीच हुई थी तो इन्हीं दोनों में से किसी एक ने ही इसे सार्वजनिक किया होगा. चूंकि यह स्वाति सिंह के खिलाफ है इसलिए इस बात की संभावना नजर नहीं आती कि वे इसे सार्वजनिक करेंगी. इसलिए डीजीपी का इस बात की जांच कराने की बात कहना यह दर्शाता है कि वे अपनी ही अधिकारी को दबाव में लाने का प्रयास कर रहे हैं. अगर वे ऐसा नहीं कर रहे होते तो यह कह सकते थे कि पहले इस बात की जांच होगी कि यह रिकॉर्डिंग सही है या नहीं. फिर इस पर वे आगे की कार्रवाई करेंगे. इस आगे की कार्रवाई का स्वरूप कुछ-कुछ ऐसा हो सकता था कि अगर रिकॉर्डिंग सही होती तो स्वाति सिंह के खिलाफ मामला दर्ज होता और अगर यह गलत होती तो यह जांच कराई जा सकती थी कि इसे किसने रिकॉर्ड करवाया और सार्वजनिक किया.

लेकिन डीजीपी ने न केवल जांच को गलत दिशा में ले जाने की बात कही बल्कि महिला क्षेत्राधिकारी के मीडिया से बातचीत करने पर भी रोक लगा दी. उधर इतनी छीछालेदर होने के बावजूद राज्य मंत्री स्वाति सिंह के खिलाफ कोई भी कार्रवाई नहीं की गई है. जबकि उनके इस्तीफे की मांग विपक्ष के नेताओं के साथ-साथ भाजपा के भी कुछ नेता कर चुके हैं. अलबत्ता बीजेपी के मीडिया प्रभाग द्वारा यह प्रचारित करने का प्रयास जरूर किया जा रहा है कि रिकार्डिंग प्रकरण में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बहुत कड़ा रूख अपनाया है और उन्होने स्वाति सिंह को बुलाकर आधे घंटे तक फटकार भी लगाई है.

कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने इस प्रकरण पर योगी सरकार को घेरते हुए कहा है कि जिस तरह योगी सरकार की महिला मंत्री एक बिल्डर के पक्ष में पुलिस अधिकारी को धमका रही हैं उससे तो साफ दिखता है कि राज्य सरकार अपराधियों के साथ खड़ी है. वरिष्ठ कांग्रेस नेता आमिर हुसैन कहते हैं, ‘योगी जी खुद को बहुत बड़ा रामभक्त बताते हैं तो उन्हें राम के आदर्शों पर चलना भी चाहिए. राम जी ने तो एक धोबी के आरोप पर सीता जी की अग्निपरीक्षा करवाई थी, योगी जी कम से कम अपने मंत्री के आचरण की ही निष्पक्ष जांच करवा लें.’

लेकिन शायद इस मामले में योगी आदित्यनाथ भी मजबूर हैं. यह कथित ‘ऊपर का आदेश’ वास्तव में कितने ऊपर का है कोई नहीं जानता. लेकिन यह साफ है कि इस मामले का मुख्य पक्षकार अंसल बिल्डर कोई छोटे-मोटे घपले करने का आरोपित नहीं हैं. अंसल बिल्डर पर अन्य कुछ राज्यों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश में भी घोटाला करने के कई और बड़े आरोप हैं. लखनऊ में अंसल ग्रुप पर आरोप हैं कि उन्होंने बिना जमीन खरीदे ही लोगों को हजारों प्लॉट, विला और फ्लैट बेच दिये. बताया जाता है कि अंसल एपीआई ग्रुप के कर्मचारी ग्राहकों को जमीन दिखाते, सौदा करते और 20 से 40 फीसदी रकम बुकिंग के नाम पर उनसे वसूल कर लेते थे. इसके बाद ग्राहकों को रजिस्ट्री के लिए लटका दिया जाता था. जबकि जमीन कहीं होती ही नहीं थी.

अंसल बिल्डर पर ये भी आरोप है कि उसके प्रमोटर इस तरह के कई मामलों में शिकायत करने वाले ग्राहकों को ही उल्टे मुकदमों में फंसा देते थे. इस काम के लिए समूह ने कुछ महिलाएं, दबंग और अनुसूचित जाति के लोगों को नियुक्त कर रखा था. बहरहाल इस दबंगई और गुंडागर्दी के बावजूद अंसल बिल्डर के खिलाफ लखनऊ के विभूतिखण्ड, गोमतीनगर, हजरतगंज व पीजीआई समेत कुछ अन्य थानों में धोखाधड़ी के तीन दर्जन से ज्यादा मुकदमे दर्ज हो चुके हैं.

लखनऊ विकास प्राधिकरण के नए उपाध्यक्ष प्रभुनारायण सिंह ने जब अंसल समूह के खिलाफ जांच शुरू की तो उसके घोटालों की पर्ते खुलनी शुरू हुईं. इसके बाद अंसल समूह के मैनेजिंग डायरेक्टर सुशील अंसल और दो बड़े अधिकारियों की गिरफ्तारियां हुईं और अंसल समूह के वाइस चेयरमैन प्रणव अंसल को इसी साल सितम्बर में दिल्ली एयरपोर्ट से बड़े नाटकीय ढंग से तब गिरफ्तार किया गया जब वे लंदन जा रहे थे. बताया जाता है कि अंसल समूह लंबे समय से इस तरह के घोटालों में लगा हुआ था और लखनऊ में लखनऊ विकास प्राधिकरण के कई उपाध्यक्ष, कुछ आईएएस अधिकारी और राजनेता इस काम में उसके मददगार व संरक्षणकर्ता रहे थे. उधर अंसल के शिकार लोगों में भी सामान्य नागरिकों के साथ-साथ, न्यायपालिका, सेना और पुलिस के अधिकारी तथा कई आईएएस अधिकारी भी शामिल हैं.

वायरल रिकार्डिंग में सीओ वीनू सिंह ने जिन कनौडिया दंपत्ति की बात कर रही थीं, उन्होंने जो एफआईआर दर्ज कराई है उसमें भी सुशील अंसल, प्रणव अंसल व दो अधिकारियों को आरोपित बनाया गया है. शिकायतकर्ता कनौडिया दम्पत्ति की ओर से कहा गया है कि उन्होने सचिन व दीप्ति कनौडिया के नाम 2011 में अंसल बिल्डर्स के दो प्लॉट बुक करवाए थे. इसके लिए उन्होंने 30 लाख रूपये का भुगतान किया था. लेकिन तय समय के कई वर्षों बाद भी उन्हें ये प्लॉट नहीं मिले.

अब अगर यह रिकॉर्डिंग सही है तो इतने साफ मामले में पुलिस पर एफआईआर दर्ज न करने के लिए दबाव डालने और उन्हें धमकाने की जरूरत साफ-सुथरी होने का वादा करने वाली सरकार की एक मंत्री को क्यों पड़ी? और ये ‘ऊपर का आदेश’ क्या है? ये दोनों प्रश्न इस पूरे प्रकरण को अनेक संदेहों से जोड़ देते हैं.

विभिन्न राजनैतिक दल अब योगी सरकार पर यह आरोप लगा रहे हैं कि वह अंसल से कोई बड़ी सौदेबाजी कर रही है जिसकी वजह से उनके खिलाफ नई रिपोर्ट दर्ज करने से पुलिस को रोका जा रहा है. नहीं तो जिस बिल्डर पर पहले से ही दर्जनों आपराधिक मामले दर्ज हैं और जिसके कर्ताधर्ता फिलहाल जेल में बंद हैं उसे बचाने की कोशिश एक मंत्री के द्वारा क्यों की जा रही है? और अगर मंत्री ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के कारण यह दबाव बनाने की कोशिश की थी तो फिर योगी आदित्यनाथ उस मंत्री को हटा कर खुद को पाक साफ क्यों नहीं दिखा रहे हैं?