सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर में लगाई गई पाबंदियों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बुधवार को सुनवाई पूरी कर ली. मामले में फैसला बाद में सुनाया जाएगा. राज्य में ये पाबंदियां संविधान के अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधान खत्म किए जाने के बाद लगाई गई थीं. न्यायमूर्ति एनवी रमण, आर सुभाष रेड्डी और बीआर गवई की पीठ ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद और कश्मीर टाइम्स की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन और कई अन्य की याचिकाओं पर सभी पक्षों को विस्तार से सुना.

पीटीआई के मुताबिक गुलाम नबी आजाद की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले को वे समझते हैं, लेकिन इस वजह से घाटी की समूची 70 लाख की आबादी को ‘ताले में बंद’ नहीं किया जा सकता. अनुराधा भसीन की ओर से अधिवक्ता वृन्दा ग्रोवर ने इन पाबंदियों को ‘असंवैधानिक’ बताया. उधर, जम्मू-कश्मीर प्रशासन की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने राज्य में इंटरनेट सेवाओं पर लगायी गयी पाबंदियों को मंगलवार को न्यायोचित ठहराया था. उनका कहना था कि लड़ाई भीतर सक्रिय दुश्मनों से ही नहीं बल्कि सीमा पार से सक्रिय शत्रुओं से भी है. तुषार मेहता ने कहा कि पाकिस्तानी सेना, अफगान तालिबान और अन्य आतंकी समूहों के आधिकारिक ट्विटर हैंडल्स पर जम्मू-कश्मीर की जनता को भड़काने वाले हजारों संदेश हैं. उनका कहना था, ‘पाकिस्तानी सेना का दुष्प्रचार चल रहा है. यदि हमने ऐहतियाती कदम नहीं उठाये होते तो हम अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने मे विफल हो जाते.’

केंद्र ने भी 21 नवंबर को अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधान खत्म किये जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में लगायी गयी पाबंदियों को न्यायोचित ठहराया था. उसका कहना था कि ऐहतियात के तौर पर उठाये गये कदमों की वजह से घाटी में एक भी व्यक्ति की जान नहीं गयी और न ही सुरक्षा बलों को एक भी गोली चलानी पड़ी.