निर्देशक: एंथनी मारस
लेखक: एंथनी मारस, जॉन कॉली
कलाकार: अनुपम खेर, देव पटेल, अदिति कलकुंटे, आर्मी हैमर, नाज़नीन बोनियादी
रेटिंग: 3.5/5

मुंबई आतंकी हमले पर कॉमेडीग्रुप ‘ऐसी-तैसी डेमोक्रेसी’ के ट्विटर हैंडल से आई एक टिप्पणी पर गौर करिए. हैशटैग नेवर फॉरगेट के साथ की गई इस टिप्पणी का सार कुछ यूं है कि ‘11 साल इस बात को हो चुके हैं कि पाकिस्तान के आतंकी संगठनों ने मुंबई पर भयावह हमला किया था. छह महीने इस बात को हो चुके हैं कि भोपाल के लोगों ने एक ऐसी महिला को चुना जिसका दावा था कि यह हमला इसलिए हुआ क्योंकि उसने श्राप दिया था. यह श्राप हमले में शहीद होने वाले पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे को दिया गया था. और अब, एक हफ्ता इस श्राप-लेडी को भारत सरकार के डिफेंस पैनल का हिस्सा बने हुए बीत चुका है. कभी मत भूलना.’ इस कटाक्षपूर्ण टिप्पणी की सार्थकता समझनी हो और जानना हो कि मुंबई हमले के दौरान गोली खाकर शहीद होने वाले हेमंत करकरे हमारे नायक क्यों होने चाहिए तो जाइए, ‘होटल मुंबई’ देखकर आइए.

फिल्म पर आएं तो ‘होटल मुंबई’ 26 नवंबर, 2008 को दक्षिणी मुंबई के कई इलाकों में हुए आतंकी हमलों पर आधारित है. लेकिन इसकी पटकथा का केंद्र होटल ताज महल पैलेस पर हुआ हमला है. यह फिल्म होटल के उन कर्मचारियों को समर्पित है जिन्होंने ‘मेहमान भगवान है’ जैसे सूत्र वाक्य को सही मायनों में समझा और हमले के दौरान इन भगवानों की जान बचाने के लिए खुद की जान न सिर्फ खतरे में डाली बल्कि कइयों ने गंवा भी दी. आंकड़े बताते हैं कि ताज होटल पर हुए इस हमले में 13 मेहमानों और 18 कर्मचारियों की मौत हुई थी.

सैकड़ों देसी-विदेशी मेहमानों और दसियों होटल कर्मचारियों की इस आपबीती में आतंकियों की धड़ाधड़ चलती गोलियों का फिल्मांकन अंदर तक सहमा देता है. इन धमाकों और उनके असर को दिखाते हुए ‘होटल मुंबई’ लगातार आपकी नसों को झनझनाती रहती है. फिल्म इसके लिए उस समय की असली फुटेज का इस्तेमाल भी करती है. लेकिन जैसा कि आमतौर पर त्रासदी प्रधान फिल्मों में होता है, इस तरह की झनझनाहट के समांतर कोई हल्की-फुल्की साइड स्टोरी दिखाकर आपको राहत की सांस लेने का मौका भी दिया जाता है. होटल मुंबई इसके ठीक उलट ऐसे किसी भी घिसे हुए तरीके से दूरी बनाकर रखती है. कई बार तो इसका सच के बेहद करीब होना ही आपको अखरने लगता है और असहायता से भरकर आप मनाने लगते हैं कि काश यह सब एक कल्पना होता.

‘होटल मुंबई’ का निर्देशन ऑस्ट्रेलियन फिल्मकार एंथनी मारस ने किया है. उन्होंने ही जॉन कॉली के साथ मिलकर इसकी पटकथा भी लिखी है. अंग्रेजी में बनाई गई इस फिल्म की खास बात यह है कि इसका लेखन पूरी तरह से भारतीयता से भरा हुआ है. यानी इस फिल्म के किसी भी पक्ष को पश्चिमी नज़र से देखे और बरते जाने की शिकायत नहीं की जा सकती है. फिर चाहे वह भारतीयों के बीच मौजूद क्लास डिफरेंस हो या उनका अंग्रेजी उच्चारण. यहां तक कि पाकिस्तानी आतंकियों द्वारा बोली गई पंजाबी भी इतनी सटीक और पहचानी हुई है कि आश्चर्य होता है. किरदारों की बात करें तो फिल्म में ताज होटल के हेड शेफ हेमंत ओबेरॉय के अलावा सभी किरदार काल्पनिक लेकिन असल ज़िंदगियों से प्रेरित हैं. फिल्म का प्रमुख किरदार एक सिख वेटर अर्जुन है जिसे कई बहादुर कर्मचारियों की खूबियां लेकर रचा गया है. 26 नवंबर को अर्जुन के दिन की शुरूआत से लेकर हमले से बचकर वापस घर पहुंचने तक का यह किस्सा, उस दिन हमले का सामना करने वाले मुंबई के तमाम लोगों और उनके परिवारों की कहानी भी कह जाता है.

‘होटल मुबंई’ अपने बाकी किरदारों की बैकस्टोरी भी बहुत समझदारी से बगैर फ्लैशबैक में गए ही हमें समझा देती है. अच्छा यह भी है कि ऐसा वह न सिर्फ ताज होटल में मौजूद वीआईपी मेहमान किरदारों के साथ करती है बल्कि हमला करने वाले आतंकियों को लेकर भी उतनी ही विचारशील रहती है. एक आतंकी द्वारा अपने घर फोन करके पैसे मिलने के बारे में पूछने और सलह पढ़ने वाली महिला को जिंदा छोड़ देने वाले दृश्यों का जिक्र यहां पर किया जा सकता है. इसके अलावा, फिल्म गोरे मेहमानों के पगड़ीधारी वेटर या मुसलमान महिला पर शक करने वाले दृश्यों से नस्लभेद की झलक भी दे देती है. कुल मिलाकर, कहानी को परतदार गहराई देने में भी मारस और कॉली की कलम ने कमाल किया है.

अभिनय पर आएं तो फिल्म में हेमंत ओबेरॉय की भूमिका अनुपम खेर ने निभाई है और कुछ चुनिंदा दृश्यों में प्रभावित करने के अलावा, खेर ज्यादातर वक्त केवल परेशान ही नज़र आते हैं. वहीं, वेटर और युवा पिता अर्जुन की भूमिका में नज़र आ रहे देव पटेल शुरूआत को छोड़कर, लगभग पूरे वक्त इतना उम्दा अभिनय करते हैं कि उनकी फैली हुई आंखें और दबी हुई आवाज उनके सहमेपन में छिपी हिम्मत का प्रतीक बन जाती है. पटेल की पत्नी की भूमिका में अदिति कलकुंटे मात्र दो-तीन दृश्यों में ही दिखाई देती हैं लेकिन इतने भर से ही वे आपको अपने बेहतरीन कलाकार होने का भरोसा दिला देती हैं. अमेरिकी-ईरानी जोड़े की भूमिका में आर्मी हैमर और नाज़नीन बोनियादी अपेक्षाकृत लंबा स्क्रीन स्पेस तो लेते हैं लेकिन खुद को नजरें टिकाकर देखने पर मजबूर भी करते हैं.

यूं तो, मुंबई हमला एक ऐसा हादसा है जिसे भूल जाना ही बेहतर था लेकिन जिस तरह के पॉलिटिकली चार्ज्ड माहौल में हम आज रह रहे हैं और जितने बंटे हुए हैं, ऐसे हादसों को याद रखना ज़रूरी हो जाता है. ‘होटल मुंबई’ भले ही एक विदेशी फिल्मकार ने बनाई हो लेकिन यह हमें नस्ल, रंग और आर्थिक भेदों से अलग जाकर एक होने वाले सबक को फिर से दोहराने की जरूरत बेहद खूबसूरती से बताती है. इसके अलावा यह प्रशासन के अलसाकर जागने और मीडिया की अतिरेक से भरी रिपोर्टिंग, जैसी उन बेवकूफियों की तरफ भी इशारा करती हैं जो न सिर्फ 26/11 की कई मौतों का कारण बनीं थीं बल्कि आज भी एक बारूदी माहौल रचने में लगी हुई हैं. इसलिए कलेजा मजबूत करिए, थोड़ी हिम्मत बटोरिए, ‘होटल मुंबई’ देखिए और सोचिए कि मुंबई हमलों की यह याद ज्यादा बारूदी है या हमारा आज?