बीते महीने भर से महाराष्ट्र में जो राजनैतिक खींचतान जारी थी, शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री बनने के साथ थम गई. इस पूरी उठापटक के बीच देश भर के राजनैतिक गलियारों में कई तरह के कयास और सवालों के दौर जमकर चले. लेकिन जो एक बात थोड़ी कम चर्चा में रही वह यह थी कि अपने ही गढ़ महाराष्ट्र में हुई इस जबरदस्त राजनैतिक खींचतान के बीच आरएसएस कहां थी?

इस सवाल का हमें सबसे सामान्य जवाब यह मिला कि चूंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक ग़ैर राजनैतिक संगठन है, इसलिए उसने इस पूरे मामले से दूरी बनाए रखी. इस जवाब का दूसरा आधा हिस्सा काफ़ी हद तक सही माना जा सकता है. आरएसएस ने इस मामले से दूरी तो बनाकर रखी लेकिन इसकी वजह वह बिल्कुल नहीं है जो पहले हिस्से में बताई जा रही है.

महाराष्ट्र के एक प्रमुख अख़बार मुंबई मिरर के मुताबिक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने इस गहमागहमी के बीच पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से साफ तौर पर कहा था कि शिवसेना के बगैर सरकार बनाने से बेहतर है कि विपक्ष में बैठकर जनता की सेवा की जाए. सूत्रों के हवाले से इस अख़बार ने छापा है कि ‘मोहन भागवत ने फडणवीस को इस बारे में भी चेताया कि किसी भी अनैतिक गठबंधन या खरीद-फरोख़्त के जरिये सरकार बनाने से भविष्य में भारतीय जनता पार्टी को नुकसान उठाना पड़ सकता है.’ लेकिन इस पूरे मामले में भागवत की अनदेखी हुई और नतीजा सामने है.

हालांकि महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी से जुड़े एक वरिष्ठ नेता का इस बारे में कहना है कि यदि संघ की तरफ़ से ऐसी कोई सलाह दी गई तो इसे मानना व्यवहारिक नहीं था. सत्ता को इस तरह विरोधियों के समक्ष परोस देने पर भाजपा के लिए प्रदेश में अगले दस साल तक वापसी कर पाना मुश्किल हो जाता. नतीजतन यह जोखिम उठाना जरूरी हो गया था. यह अलग बात है कि दांव सही जगह नहीं लग पाया.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यशैली की नज़र रखने वाले कुछ जानकारों का यह भी मानना है कि यदि संघ चाहता तो देवेंद्र फडणवीस समेत भाजपा हाईकमान की इतनी फजीहत होने से बचा सकता था. लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. इसके दो कारण बताए जा रहे हैं. पहला तो यह कि अतिआत्मविश्वास से लबरेज भाजपा शीर्ष नेतृत्व ख़ुद इस मामले में संघ का ज्यादा दखल नहीं चाहता था. और दूसरे संघ को भी भारतीय जनता पार्टी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अध्यक्ष अमित शाह का एकतरफा नियंत्रण कुछ खास नहीं सुहा रहा है. भाजपा पर इस जोड़ी के वर्चस्व को संतुलित करने और अपनी अहमियत का अहसास करवाने के लिए भी संघ ने इस मामले से ख़ुद को दूर रखने की रणनीति बनाई.

ऐसा मानने वाले विश्लेषकों की दलील है कि यदि ऐसा न होता तो क्या संघ अपने ही गढ़ और महाराष्ट्र जैसे अहम राज्य में शिवसेना को साथ लाने के लिए उसी तरह जिद पर नहीं अड़ जाता जैसे कि वह उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनवाने के लिए कर चुका है.

इस बात से सहमति जताते हुए प्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार एक और बात बताते हैं, ‘दूसरे राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार न रहने पर अक्सर आरएसएस की सक्रियता और दबदबे पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है. इसे उत्तर प्रदेश के ही उदाहरण से समझा जा सकता है जहां वर्षों तक भाजपा के सत्ता में न रहने पर संघ की शाखाओं की संख्या में खासी कमी देखी गई थी. लेकिन महाराष्ट्र में ऐसा नहीं है. यहां अपना मुख्यालय होने की वजह से संघ को किसी भी पार्टी की सरकार आने या जाने से कोई खास फ़र्क नहीं पड़ता. शायद इसलिए ही उसे भाजपा के हाथ से महाराष्ट्र की सत्ता फिसलने की ज्यादा फ़िक्र नहीं थी.’

वहीं कुछ अन्य लोग मानते हैं कि इस मामले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नितिन गडकरी की वजह से भी उदासीन रहा. यह बात किसी से नहीं छिपी है कि गडकरी को संघ का वरदहस्त हासिल है. 2019 के लोकसभा चुनाव में जब मोदी लहर के साथ भारतीय जनता पार्टी की सीटें घटने से जुड़ी कयासबाजी जोरों पर थी, तब संघ ने नितिन गडकरी को आगे करने की योजना पर काम करना शुरु कर दिया था. विश्लेषकों के मुताबिक संघ अब भी नितिन गडकरी को अगले चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के मजबूत विकल्प के तौर पर देखना और तैयार करना चाहता है.

महाराष्ट्र में चल रही अनबन के बीच शिवसेना के नेता किशोर तिवारी ने भी सार्वजनिक तौर पर कहा था कि अगर भाजपा नितिन गडकरी को बात करने के लिए भेजेगी तो वे दो घंटे में इस संकट को सुलझा देंगे. इसके लिए तिवारी ने संघ प्रमुख मोहन भागवत को एक पत्र भी लिखा. यह साफ इशारा था कि शिवसेना गडकरी के नेतृत्व में भाजपा को समर्थन देने पर विचार कर सकती है. लेकिन भाजपा आलाकमान इसके लिए राजी नहीं हुआ. इसके पीछे माना जा रहा है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी भी गडकरी को बड़े मौके देने के संभावित ख़तरों को भली-भांति जानती है.

वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ तिवारी इस बारे में कहते हैं कि ‘इस पूरे घटनाक्रम में आरएसएस की भूमिका के बारे में कोई निश्चित जवाब दे पाना मुश्किल है. क्योंकि यदि नितिन गडकरी संघ के चहेते हैं तो देवेंद्र फडणवीस के प्रति भी आरएसएस का रुख नरम ही है. इस पूरी गहमागहमी के बीच जब नितिन गडकरी दिल्ली से महाराष्ट्र आए तो संभावनाएं जताई गईं कि भाजपा हाईकमान ने उन्हें उद्धव ठाकरे को मनाने के लिए भेजा है. वे बाला साहब के जमाने से ही ठाकरे परिवार से करीबी रहे हैं. लेकिन आख़िरी समय में गडकरी उद्धव ठाकरे से मिले बिना ही वापिस लौट गए. इस बारे में सिर्फ़ अनुमान लगाया जा सकता है कि गडकरी ने यह निर्णय किसके इशारे पर लिया होगा.’ यहां तिवारी का संकेत आरएसएस की तरफ़ है.

हालांकि जानकारों का एक धड़ा ऐसा भी है जो इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता कि अजित पवार को साथ लेने के भाजपा के फैसले से संघ को कोई आपत्ति थी. इस बात के पक्ष में संघ विचारक दिलीप देवधर की एक हालिया टिप्पणी का हवाला दिया जा रहा है. इसमें उन्होंने दावा किया था कि शिवसेना के अड़ियल रवैये से संघ पदाधिकारी नाराज हैं. अपने इस बयान में देवधर ने यह भी कहा था कि भाजपा में किसी बाहरी के आने से पार्टी के नेताओं को भले ही दिक्कत होती हो, मगर संघ अपने परिवार में बाहरी लोगों के आने का हमेशा स्वागत करता है. संघ को इसमें विस्तार दिखता है. इतना ही नहीं, दिलीप देवधर ने अपनी टिप्पणी में यह तक संभावना जता दी थी कि 2022 में एनसीपी प्रमुख शरद पवार एनडीए की तरफ़ से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हो सकते हैं.

वहीं, मुंबई मिरर की असिस्टेंट एडिटर अलका धुपकर का इस बारे में कहना है कि ‘यह सिर्फ़ कहने-सुनने की बात है कि इतने बड़े राजनैतिक घटनाक्रम से आरएसएस दूर रही थी. यदि ऐसा होता तो भाजपा द्वारा अजित पवार को साथ लेते ही संघ के सह सरकार्यवाह मनमोहन वैद्य उनका बचाव करने मैदान में नहीं उतरते’. गौरतलब है कि उपमुख्यमंत्री बनते ही जब विरोधियों ने अजित पवार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को जोर-शोर से उठाना शुरु किया तो इसके जवाब में वैद्य का कहना था कि पवार पर सिर्फ़ आरोप लगे हैं, वे अभी तक दोषी साबित नहीं हुए हैं.

सत्याग्रह से हुई बातचीत में धुपकर आगे जोड़ती हैं, ‘महाराष्ट्र में जो कुछ हुआ उसकी प्रमुख वजह देवेंद्र फडणवीस और अमित शाह का आपसी विरोधाभास और गफलत भी थी. यह भी सही है कि संघ महाराष्ट्र में भाजपा हाईकमान को आईना दिखाना चाहता था. लेकिन बाजी इस तरह हाथ से निकल जाएगी, इसका अंदाज भाजपा और संघ दोनों ही नहीं लगा पाए. यदि ऐसा होता तो शायद बात इतनी नहीं बिगड़ती.’