भारत के अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव (इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया - इफ्फी) ने इस बार अपने आयोजन के 50 साल पूरे कर लिये. गोवा में हुए इस फ़िल्म फेस्टिवल के आयोजन में भारतीय सिनेमा और इफ्फी के इतिहास को बताने-दर्शाने वाले आयोजन भी किये गए. 2004 में इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया के लिए गोवा को स्थायी जगह के तौर पर चुना गया था. उस समय यह बहस जोरों पर थी कि इफ्फी के लिए एक स्थायी जगह होनी चाहिए और भारत को इस महोत्सव का आयोजन इस तरह से करना चाहिए कि इसे भी कांस, बर्लिन और वेनिस जैसे अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सवों का दर्जा हासिल हो सके. गोवा में इफ्फी को होते हुए पंद्रह बरस हो चुके हैं. उसने अपने आयोजन के भी पचास साल पूरे कर लिए हैं. ऐसे में यह सवाल तो उठता ही है कि भारत के अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म फेस्टिवल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करने की जो बात थी, वह किस मुकाम तक पहुंची है? और क्या इस बारे में वाकई कोई गंभीर कोशिश की भी जा रही है या नहीं?

2004 में जब गोवा को इफ्फी के स्थायी आयोजनस्थल के तौर पर चुना गया था तब ये सवाल उठे थे कि क्या अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव के लिए गोवा सही जगह है. गोवा में संगीत की तो एक समृद्ध परंपरा थी, लेकिन फ़िल्म संस्कृति के मामले में ऐसा नहीं कहा जा सकता है. फिर भी, अंतरराष्ट्रीय पयर्टकों से गोवा की वाकफियत, यहां का फेस्टिव मूड और सुरक्षा जैसे मसले गोवा के पक्ष में गये और वह इफ्फी के आयोजन की स्थायी जगह बन गया.

फ़िल्म फेस्टिवल में आये ओल्ड गोवा के ही रहने वाले दयाशंकर याद करते हैं कि कैसे उस वक्त ओल्ड गोवा मेडिकल कालेज परिसर में आइनॉक्स के चार स्क्रीन वाले सिनेप्लेक्स का निर्माण कुछ ही महीनों में हो गया था. वे कहते हैं, ‘उस समय तो गोवा में ऐसे सिनेमाहॉल भी नहीं थे कि इफ्फी कराया जा सके. लेकिन तब सरकार ने बहुत तेज काम दिखाया.’ वे इसके लिए गोवा के तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर की इच्छाशक्ति की सराहना करते हैं. लेकिन, गोवा में फ़िल्म फेस्टिवल होते हुए पंद्रह साल हो गए हैं, तब से अब में क्या फर्क आया है? गोवा में हुए पिछले सभी फ़िल्म फेस्टिवल में शरीक हो चुके दयाशंकर थोड़ा सोचने के बाद कहते हैं, ‘अभी मैनेजमेंट का प्रॉब्लम थोड़ा बढ़ा है. एंट्री गेट्स कम कर दिए हैं. टिकट की बुकिंग का तरीका गड़बड़ है. शुरुआत के दो-तीन इफ्फी बहुत अच्छे थे. लेकिन, अभी ब्यूरोक्रेसी बढ़ा है.’ दयाशंकर गोवा के ही बाशिंदे हैं. वे फ़िल्म फेस्टिवल की कुछ अच्छाइयां भी गिनाते हैं. मसलन, बीच पर हो रही ओपनएयर स्क्रीनिंग की इसलिए तारीफ करते हैं कि उसमें कई कोंकणी फिल्में दिखाई गईं.

गोवा के मीरामार बीच पर इफ्फी-2019 के लिए किए गए इंतजाम
गोवा के मीरामार बीच पर इफ्फी-2019 के लिए किए गए इंतजाम

लेकिन, कोलकाता से फ़िल्म फेस्टिवल में आईं फ़िल्म निर्माता शीला दत्ता कहती हैं, ‘गोवा में परमानेंट वेन्यू बनने के बाद ऐसा लगा था कि इफ्फी दुनिया भर के फ़िल्म फेस्टिवल के बीच एक ब्रांड बनेगा. लेकिन, हर साल इसमें गिरावट आती जा रही है और अब तो धीरे-धीरे यह एक औपचारिक सरकारी आयोजन जैसा होता चला जा रहा है.’ केरल के रहने वाले बेंगलुरु में सॉफ्टवेयर इंजीनियर सुधीर बाबू भी कुछ ऐसा ही मानते हैं. वे कहते हैं, ‘मैं हर फ़िल्म फेस्टिवल में आता हूं. हर साल इसमें गिरावट आ रही है. ऑनलाइन टिकट बुकिंग में टिकट नहीं मिलता. रश लाइन में खड़े हो. सीट्स खाली रहतीं हैं फिर भी हॉल में नहीं जाने देते. फेस्टिवल में सिनेमा प्रेमी फ़िल्म देखने आते हैं, इतनी औपचारिकता करने नहीं.’

इफ्फी 2019 के आयोजन में टिकटिंग व्यवस्था से तमाम लोग नाखुश नज़र आये. इफ्फी के शुरुआती कुछ सालों में टिकटिंग की व्यवस्था नहीं थी. फ़िल्म की स्क्रीनिंग शुरू होने से कुछ देर पहले लाइन लगती थी और जिसकी जो फ़िल्म देखने की इच्छा हो उस लाइन में लग सकता था. यहां तक कि लोग थियेटर की सीढ़ियों और फर्श पर बैठकर भी फ़िल्म देख सकते थे. लेकिन, बाद में टिकटिंग की व्यवस्था कर दी गई. इसमें सामान्य डेलीगेट्स तीन और प्रोफेशनल डेलीगेटेस एक दिन में चार फिल्मों के टिकट ले सकते हैं. इस व्यवस्था के तहत पहले टिकट वाले डेलीगेट्स को एंट्री दी जाती है और फिर सीट्स बचने पर रश लाइन में खड़े लोगों को. लेकिन इसमें टिकट बुक कराने वाले बहुत से डेलीगेट्स उस स्क्रीनिंग में नहीं आते हैं या आते भी हैं तो काफी देर से. ऐसे में रश लाइन में खड़े लोग या तो एंट्री नहीं कर पाते हैं या टिकटधारकों की लेटलतीफी के चलते उनकी काफी फ़िल्म छूट जाती है.

इसके अलावा सीट्स खाली रहने पर भी कई बार फ़िल्म क्रू के लिए या किसी अन्य के लिए सीट्स खाली होने का बहाना कर दिया जाता है. दिल्ली से फ़िल्म फेस्टिवल में आईं आरती ने बताया, ‘इस बार पहले दिन रश लाइन भी नहीं लगने दी जा रही थी. लोगों के विरोध के बाद रश लाइन शुरू हुई. इसे अब आप अनुभवहीनता कह लीजिए या कुछ और. टिकटिंग व्यवस्था बनाये रखने के लिए हो सकती है, लेकिन इसके बहाने आप फ़िल्म फेस्टिवल में आये लोगों से शॉपिंग मॉल जैसा व्यवहार नहीं कर सकते.’

एक स्थायी जगह पर आयोजित होने के बाद क्या गोवा फ़िल्म फेस्टिवल दुनिया के प्रतिष्ठित फ़िल्म समारोहों की श्रेणी में गिना जा सकता है. इस पर ‘बदला’, ‘अक्टूबर’ जैसी फिल्मों के सिनेमेटोग्राफर अनूप सिंह कहते हैं, ‘2004 और उसके बाद के कुछ सालों के दौरान इंटरनेशनल कॉम्पटीशन सेक्शन में आई फिल्मों में से ज्यादातर के डायरेक्टर या उनसे जुड़ा कोई न कोई व्यक्ति स्क्रीनिंग के वक़्त हॉल में मौजूद रहता था और दर्शकों के साथ उनके सवाल-जवाब हुआ करते थे. लेकिन पिछले कुछ सालों में एकाध फिल्म को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर के निर्देशक फ़िल्म स्क्रीनिंग के वक़्त नहीं आते हैं. प्रतिष्ठा बढ़ रही है या घट रही है इससे ही अंदाजा लग जाता है.’ तमिलनाडु से आये एन जोसेफ इस बारे में कहते हैं, ‘फ़िल्म फेस्टिवल फ़िल्म देखने के अलावा दुनिया भर के फिल्मकारों के लिए एक-दूसरे के विचार जानने की जगह भी होता है. लेकिन गोवा फ़िल्म फेस्टिवल इस मामले में हर साल पिछड़ता ही जा रहा है. ऐसे में आप इसे दुनिया के बेहतर फ़िल्म फेस्टिवल्स में कैसे शामिल कर पाएंगे!’

इफ्फी के 50 साल पूरे होने पर नेशनल फिल्म आर्काइव द्वारा लगाई गई प्रदर्शनी का एक दृश्य
इफ्फी के 50 साल पूरे होने पर नेशनल फिल्म आर्काइव द्वारा लगाई गई प्रदर्शनी का एक दृश्य

गोवा फ़िल्म फेस्टिवल में विदेशी डेलीगेट्स हर साल कम होते जा रहे हैं. यह बात नियमित रूप से इफ्फी पर निगाह रखने वाला कोई भी शख्स महसूस कर सकता है. टैक्सी ड्राइवर हनीफ भी बातचीत के दौरान कहते हैं कि इफ्फी में फॉरेनर्स का आना कम हुआ है. ऐसा क्यों हुआ है? क्या फ़िल्म फेस्टिवल के आयोजक विदेशी निर्देशकों को स्क्रीनिंग के दौरान मौजूद रखने के लिए कोई अतिरिक्त कोशिश नहीं करते या फिल्मकार पर्याप्त गंभीरता न होने के चलते खुद दूरी बनाते हैं. इसका स्पष्ट उत्तर किसी के पास नहीं है. हालांकि, इफ्फी के आयोजकों में शामिल एंटरटेनमेंट सोसायटी ऑफ गोवा(ईएसजी) के लोग इससे इन्कार करते हैं. और इसमें तमाम इंटरैक्टिव सेशन होने की बात कहते हैं.

इफ्फी में सिर्फ विदेशी दर्शक और फिल्मों से जुड़े लोगों का ही आना कम नहीं हुआ है, बल्कि फ़िल्म स्कूलों और मास कम्युनिकेशन संस्थानों से आने वाले जत्थे भी कम हुए हैं. फ़िल्मों के जानकर और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में सिनेमा के प्राध्यापक सुनील उमराव कहते हैं, ‘फिल्म समारोह के गोवा आने के बाद फिल्म संस्थानों के छात्र यहां बड़ी संख्या में आते थे, लेकिन अब यह संख्या बहुत कम हो गई है. मुंबई में फ़िल्म फेस्टिवल शुरू होने के बाद वहां के उन लोगों का गोवा आना भी कम हुआ है जो समानांतर सिनेमा में रुचि रखते थे. क्योंकि उन्हें वहीं इसका विकल्प मिल जाता है. इसके अलावा इंटरनेट पर फिल्मों की उपलब्धता के चलते अब वे लोग भी नहीं आते जो सिर्फ अच्छी फिल्में देखने के लिए फेस्टिवल में आते थे.’

इफ्फी के बारे में एक समाचार पत्र से बात करते हुए वरिष्ठ फ़िल्मकार अडूर गोपालकृष्णन ने कहा कि फ़िल्म फेस्टिवल का जो मौजूदा स्वरूप है वह गंभीर सिनेमा के बजाय मुंबई फ़िल्म उद्योग की मुख्यधारा के प्रमोशन का जरिया बनता जा रहा है. उन्होंने भारतीय पैनोरमा में बहुत सी मुख्यधारा की और लोकप्रिय फिल्मों के चयन पर सवाल उठाए. उनकी यह बात कुछ हद तक सही भी लगती है. इसका उदाहरण तब देखने को मिला जब फ़िल्म फेस्टिवल के दौरान कला एकडेमी परिसर में अनिल कपूर के आने के दौरान इतनी भीड़ थी कि लोग फिल्मों के टिकट भी नहीं ले पा रहे थे.

लोकप्रिय व्यावसायिक सिनेमा और कला सिनेमा के बीच यह बहस चलती ही रहती है. भारत जैसे देश में जहां इतने बड़े पैमाने पर व्यावसायिक सिनेमा बनता है और देखा जाता है, वहां फिल्म फेस्टिवल में कला फिल्मों और लोकप्रिय सिनेमा के बीच एक संतुलन जरूरी होता है. ऐसे में फिल्मों के चयन के मामले में इफ्फी को संतोषजनक कहा जा सकता है. लेकिन फिल्मों पर गंभीर किस्म की चर्चा इफ्फी में कम दिखती है. कुछ कार्यक्रमों का हवाला जरूर दिया जा सकता है. लेकिन, शायद इतना काफी नहीं है. फेस्टिवल के इन-हाउस जर्नल ‘पीकॉक’ को देखा जाए तो ऐसा लगता है कि फिल्मों पर चर्चा को लेकर बहुत गंभीरता यहां भी नहीं बरती जा रही है. इसमें हर दिन पिछले दिनों के इवेंट्स और फिल्मों पर लिखे कुछ लेख होते हैं लेकिन इनमें भी बहुत गंभीरता नहीं दिखती. कई दिनों के ‘पीकॉक’ में तस्वीरों और लोगों से बातचीत का इतना इस्तेमाल किया गया था कि ऐसा लगता था कि छापने के लिए कंटेट कम है और किसी तरह से जगह को भरा जा रहा है.

इफ्फी के फिल्म बाजार में अपनी फिल्म ‘चिंटू का बर्थडे’ के साथ आए निर्देशक देवांशु सिंह एक और समस्या के बारे में हमें बताते हैं, ‘फिल्म बाजार प्रोफेशनलों के लिए अपनी फिल्म के प्रमोशन और मार्केटिंग का अच्छा मौका है. लेकिन इस साल फिल्म बाजार को एक होटल में शिफ्ट कर दिया गया, जिससे सामान्य डेलीगेट्स और फिल्म बाजार के डेलीगेट्स एक दूसरे से ज्यादा मुखातिब नहीं हो पाए. यह अच्छी बात नहीं है.’ यानी कि चर्चा की गुंजाइश यहां हर स्तर पर ही कम हो रही है.

फिल्म फेस्टिवल में लगा प्रसार भारती का एक स्टॉल, जहां ‘मन की बात’ कार्यक्रम के लिए एक सुझाव पेटिका भी रखी गई थी.
फिल्म फेस्टिवल में लगा प्रसार भारती का एक स्टॉल, जहां ‘मन की बात’ कार्यक्रम के लिए एक सुझाव पेटिका भी रखी गई थी.

गोवा के स्थानीय मीडिया में भी इस बार फिल्म फेस्टिवल को जो कवरेज मिली उससे भी पता चलता है कि इसने आखिरकार क्या स्वरूप ले लिया है. यहां पर छपने वाले अंग्रेजी के अखबारों में सेलिब्रेटियों के आवागमन और प्रेस कान्फ्रेंस की ही प्रमुखता रही. कभी-कभार छपे कुछ अच्छे लेखों को छोड़ दिया जाए तो मीडिया भी अब फिल्म फेस्टिवल को लेकर कोई गहरी बात या बहस करता नहीं दिखता. यह तो अंग्रेजी अखबारों की बात है. मराठी और कोंकणी में फिल्म फेस्टिवल की कवरेज महज पन्ने भर में ही सिमट जाती थी. इसमें भी सिर्फ प्रेस रिलीज और प्रेस कॉन्फ्रेंसों की ही भरमार थी.

गोवा से बाहर के देश के अन्य हिस्सों के अखबारों में इफ्फी की कवरेज पर नजर डाली जाए तो यहां आकर वह और ज्यादा संक्षिप्त हो जाती है. अंग्रेजी के अखबारों में तो थोड़ी बहुत कवरेज नजर भी आती है, लेकिन भाषायी अखबारों में सिर्फ उद्घाटन और समापन समारोह के अलावा कुछ खास नहीं दिखता. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का जो स्वरूप है उसमें इफ्फी जैसे आयोजनों या फिल्मों पर किसी गंभीर चर्चा की उम्मीद ही बेमानी है. जब देश के मीडिया का रवैया यह है तो विदेशों में इस फेस्टिवल की किस तरह की चर्चा होगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है.

इफ्फी के गोवा आने के बाद यहां के कार्निवल वाले मूड ने शुरुआती सालों में इसे कुछ खासियत बख्शी थी. जैसे 2004 में गोवा के स्टूडेंट्स द्वारा बनाए गए बैंड मांडवी नदी के किनारे अपनी कला का प्रदर्शन करते थे. लेकिन, धीरे-धीरे ये गायब होते गए और उनकी जगह फूड स्टालों ने ले ली. महाराष्ट्र से आए सुरेश मून इस पर तंज करते हैं कि यह फिल्म नहीं बल्कि फूड फेस्टिवल है.

गोवा में फिल्म फेस्टिवल के पिछले पंद्रह सालों का सफर बताता है कि शुरुआत में कम से कम प्रबंधन और प्रयास के तौर पर इसने यह उम्मीद जताई थी कि इफ्फी का आयोजन एक प्रतिष्ठित मुकाम हासिल करेगा. लेकिन, वक्त के साथ इसमें दिल्ली के बाबू कल्चर की भरपूर मात्रा में वापसी हो चुकी है और सरकारी तंत्र के लिए यह भी महज एक आयोजन भर बचा है.