लगभग दो महीने तक असमंजस की स्थिति में रहने के बाद आखिरकार कांग्रेस ने रायबरेली से पार्टी विधायक अदिति सिंह के खिलाफ कार्रवाई करने का फैसला कर लिया. उसने अदिति सिंह की विधानसभा सदस्यता खत्म करने संबंधी याचिका उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित को सौंप दी है.

अदिति सिंह बीती दो अक्टूबर को राज्य सरकार द्वारा बुलाए गए विधानमंडल के विशेष सत्र में पार्टी के व्हिप का उल्लंघन करते हुए शामिल हुई थीं. इसके बाद उन्हें दो बार कारण बताओ नोटिस भेजे गये लेकिन उन्होंने इनमें से एक का भी जवाब नहीं दिया. जाहिर सी बात है कि न चाहते हुए भी कांग्रेस को उनके खिलाफ यह कदम उठाना ही था.

जानकार इसे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का आखिरी गढ़ भी ढहाने की भाजपा की कोशिश के तौर पर देख रहे हैं. आखिरी गढ़ यानी कांग्रेस की मौजूदा अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी का संसदीय क्षेत्र रायबरेली. इस संसदीय क्षेत्र की पांच विधानसभा सीटों में से पिछली बार कांग्रेस को सिर्फ दो सीटें ही मिली थीं. हरचंदपुर से कांग्रस विधायक राकेश सिंह पहले ही भाजपा में शामिल हो चुके हैं. और अब अदिति सिंह का कांग्रेस छोड़ना सिर्फ एक औपचारिकता ही रह गई है. रायबरेली में कांग्रेस के पुराने कार्यकर्ता रघुवंश शुक्ला कहते हैं कि ‘यहां कांग्रेस का पेड़ अब सूखता दिख रहा है. अगर जिले में कांग्रेस का एक भी विधायक नहीं बचेगा तो संगठन कैसे जिन्दा रहेगा.’

लेकिन नौबत यहां तक आई कैसे? महात्मा गांधी की 150वीं जयन्ती के मौके पर उत्तर प्रदेश विधान मंडल का 36 घंटे का एक विशेष सत्र बुलाया गया था. रायबरेली की सदर विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक अदिति सिंह न सिर्फ शामिल हुईं बल्कि इसमें उन्होंने योगी सरकार की जमकर तारीफ भी की. जबकि उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने पार्टी के फैसले के आधार पर इस विशेष सत्र के बहिष्कार की घोषणा की थी थी.

अपने विधायकों को इस विशेष सत्र में शामिल होने से रोकने के लिए कांग्रेस ने व्हिप भी जारी किया था. लेकिन अदिति सिंह ने इसके बावजूद विधानसभा में आने के बारे में अपना स्पष्टीकरण सदन में अपने वक्तव्य के दौरान ही यह कहकर दिया कि, ‘दलगत भावना से उपर उठकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सम्मान में मैं यहां उपस्थित हूं. पढ़ी-लिखी विधायक हूं. मुझे लगा कि विकास पर बात हो रही है तो मुझे यहां होना ही चाहिए. यह गांधी जी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी. राष्ट्रहित व देशहित के मसले पर जो मुझे सही लगता है वह मैं हमेशा करती रही हूं, चाहे वह अनुच्छेद 370 पर फैसले का समर्थन हो या ग्रामीण विकास के लिए मौजूदा सरकार के काम.’

अदिति सिंह के विधानसभा के विशेष सत्र में शामिल होने के राजनीतिक मायने इस तरह से नहीं तलाशे जाते अगर वे उसी दिन लखनऊ में प्रियंका गांधी के नेतृत्व में आयोजित गांधी संदेश यात्रा में शामिल हो गई होतीं. इस यात्रा में प्रियंका गांधी का साथ देने के लिए कई विधायक व नेता शामिल हुए थे. लेकिन उनकी करीबी माने जाने वाली अदिति सिंह का इसमें मौजूद न होना कांग्रेस के गढ़ में कुछ भी ठीक-ठाक न होने का साफ संकेत था.

अदिति सिंह की राजनीतिक पारी बहुत लंबी नहीं है. वे 28 वर्ष की और उत्तर प्रदेश विधानसभा की सबसे युवा विधायक हैं. रायबरेली सदर सीट से पहली बार चुनाव लड़ने का मौका उन्हें अपने बाहुबली पिता अखिलेश सिंह की लंबी बीमारी के कारण मिला. अखिलेश कई राजनीतिक दलों के टिकट पर पांच बार रायबरेली सदर सीट से विधानसभा चुनाव जीते थे. लेकिन 2017 में कैंसर से पीड़ित होने के कारण उन्होने इस सीट पर अपनी बेटी को आगे बढ़ाया.

अपनी दबंग छवि के बावजूद अखिलेश सिंह ने अदिति को बेहतरीन शिक्षा दिलवाई. उन्होंने अमेरिका से मैनेजमेंट की डिग्री हासिल की है. इसलिए वे यह समझते थे कि उनकी दबंगई की राजनीति उनकी बेटी को रास नहीं आ सकती है. इसलिए उन्हें कांग्रेस के जरिए अदिति को आगे बढ़ते देखना सबसे सही विकल्प लगा था. कांग्रेस ने भी अदिति सिंह को हाथों-हाथ लिया. उसने न केवल उन्हें 2017 में रायबरेली सदर सीट से टिकट दिया बल्कि अगस्त 2018 में राहुल गांधी ने उन्हें महिला कांग्रेस का राष्ट्रीय महासचिव भी बना दिया. उन्हें महिला कांग्रेस की प्रियदर्शिनी विंग की मुख्य जिम्मेदारी दी गई थी.

लोकसभा चुनाव के दौरान अदिति, सोनिया गांधी के चुनाव की मुख्य कर्ताधर्ताओं में से एक थीं. प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी महासचिव बनाए जाने के बाद वे उनकी चुनावी यात्राओं में भी अक्सर दिखाई पड़ती थीं. रायबरेली में जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव के दौरान भाजपा समर्थकों द्वारा उनके काफिले पर हमले के कथित आरोपों के कारण भी वे खूब चर्चा में आई थीं.

लेकिन अखिलेश सिंह की मृत्यु के बाद भाजपा ने भी अदिति सिंह से निकटता बढ़ानी शुरू कर दी. उनके घर जाकर श्रद्धांजलि देने वालों में सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी तो थे ही, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी वहां पहुंचे थे. रायबरेली सीट से विधान परिषद के सदस्य दिनेश प्रताप सिंह और यहां के हरचंदपुर से विधायक उनके भाई राकेश प्रताप सिंह को भाजपा लोकसभा चुनाव से पहले ही अपने पाले में ला चुकी थी. जाहिर है अदिति सिंह को भाजपा का अगला निशाना होना ही था. वे न सिर्फ जनाधार वाली राजनीति का प्रतिनिधित्व करती हैं (पिछले विधानसभा चुनाव में अदिति सिंह ने 90 हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी) बल्कि संगठन चलाने की क्षमता के लिहाज से भी अच्छी खासी अहमियत रखती हैं.

अखिलेश सिंह, नरसिम्हा राव की सरकार के दिनों में रायबरेली सदर सीट पर विधायक रहे थे. 13 वर्ष तक कांग्रेस में रहने के बाद वे निर्दलीय और पीस पार्टी से भी विधायक बने. 1996 और 1998 में रायबरेली संसदीय सीट से भाजपा उम्मीदवार अशोक सिंह की जीत में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी. 2014 में अखिलेश ने सोनिया गांधी का विरोध नहीं किया और 2017 में वे खुलकर कांग्रेस और सोनिया गांधी के साथ खड़े दिखाई दिए थे. दबंग होने के बावजूद उनकी छवि अपने इलाके में रॉबिन हुड की तरह थी इसलिए उनके राजनीतिक समर्थकों की कभी कमी नहीं रही. अदिति अब इसी जनाधार को आगे ले जाने की कोशिश कर रही हैं.

अदिति सिंह को अपने पाले में लाकर गांधी परिवार को उनके ही गढ़ में घेरने की भाजपा की राणनीति का पता एक और बात से भी चलता है. विधानसभा के विशेष सत्र में योगी सरकार की तारीफ करने के तुरंत बाद ही अदिति सिंह को वाई प्लस श्रेणी की सुरक्षा दे दी गई.

इसके बाद न केवल अदिति ने कांग्रेस के किसी नोटिस का जवाब नहीं दिया बल्कि पार्टी को अपने खिलाफ कार्रवाई करने के लिए लगातार चुनौती भी देती रहीं. उनका कहना था कि ‘मैंने वही किया जो क्षेत्र की जनता के हित में है. जनता की आवाज उठाना मेरा फर्ज है.’

अदिति सिंह के ये तेवर ही रायबरेली में सोनिया गांधी के गढ़ के ढहने का सबब बन गये हैं. अदिति सिंह का कांग्रेस छोड़ना पहले से ही मुश्किल में फंसी पार्टी की चुनौतियां को और ज्यादा बढ़ाने वाला है. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की सक्रियता अपने संसदीय क्षेत्र में लगातार कम होती जा रही है. 2019 के लोकसभा चुनावों में उनकी जीत काफी चुनौतीपूर्ण रही थी. 2014 में उन्होंने भाजपा उम्मीदवार को 3.52 लाख वोटों से हराया था जबकि 2014 में उनकी जीत का अंतर सिर्फ 1.67 लाख वोट ही रह गया. इसमें भी अदिति सिंह वाले सदर विधानसभा क्षेत्र में उन्हें सबसे अधिक 1.23 लाख वोट मिले थे.

अब जब अदिति सिंह की कांग्रेस से विदाई हो रही है तो अपने क्षेत्र में सोनिया गांधी की चुनौती पहले से कई गुना बड़ी हो सकती है. क्योंकि अदिति का जाना न सिर्फ कांग्रेस को कमजोर करेगा बल्कि उनके भाजपा के पाले में जाने से उसे भी बड़ी मजबूती मिल सकेगी. खास कर तब जब उसके पड़ोस की अमेठी लोकसभा सीट गांधी परिवार से पहले ही छिन चुकी है. 2019 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी अपनी इस परंपरागत सीट से भाजपा की स्मृति ईरानी के हाथों हार गये थे.

लेकिन यही नहीं रायबरेली जिले की सीमा से लगे कालाकांकर की राजकुमारी रत्ना सिंह भी कांग्रेस छोड़कर पिछले महीने ही भाजपा में शामिल हुई हैं. रत्ना सिंह तीन बार की सांसद और पूर्व विदेश मंत्री राजा दिनेश सिंह की बेटी हैं. रायबरेली की जनता पर इस परिवार का भी खासा प्रभाव है.

रायबरेली सीट पर अब तक हुए कुल 16 लोकसभा और दो उपचुनावों में से 15 बार कांग्रेस को जीत हासिल हुई है. 1957 में हुए पहले चुनाव में फिरोज गांधी यहां से सांसद बने. नेहरू परिवार के एक और सदस्य अरूण नेहरू भी यहां से सांसद रह चुके हैं. 2004 से सोनिया गांधी इसी सीट से चुनाव जीतती रही हैं और अब कांग्रेस इस सीट को प्रियंका गांधी की सीट बनाने का सपना देख रही है. शायद भाजपा भी इसी कारण इस सीट पर अपनी किलाबंदी पहले से ही मजबूत कर लेना चाहती है और अदिति सिंह इसी सिलसिले की एक अहम कड़ी हैं.