अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हांगकांग में लोकतंत्र और मानवाधिकार के समर्थन वाले एक विधेयक पर हस्ताक्षर कर दिए. इस विधेयक के तहत हांगकांग में लोकतंत्र समर्थकों के मानवाधिकारों का हनन करने वाले अधिकारियों पर पाबंदियां लगाने जैसे कई प्रस्ताव हैं. पीटीआई के मुताबिक अमेरिकी संसद के दोनों सदनों प्रतिनिधिसभा और सीनेट से यह विधेयक पारित हो चुका है. प्रतिनिधिसभा में इस विधेयक के समर्थन में 417 वोट पड़े और विरोध में सिर्फ एक. वहीं सीनेट में यह विधेयक सर्वसम्मति से पारित हुआ.

हांगकांग मानवाधिकार एवं लोकतंत्र अधिनियम 2019, संयुक्त राज्य-हांगकांग नीति अधिनियम 1992 में संशोधन का नतीजा है. इसे इसी साल जून में पेश किया गया था. तब हांगकांग में लोकतंत्र समर्थकों के प्रदर्शन अपने शुरूआत दौर में थे. इस विधेयक में कहा गया है कि हांगकांग चीन का हिस्सा है लेकिन इसकी प्रशासनिक और आर्थिक व्यवस्था बहुत हद तक उससे अलग है. विधेयक के मुताबिक सालाना समीक्षा के जरिये यह सुनिश्चित किया जाएगा कि कहीं चीन हांगकांग में नागरिक स्वतंत्रता का हनन तो नहीं कर रहा. यह भी कि हांगकांग में नियमों के तहत ही शासन चल रहा है या नहीं.

विधेयक के मुताबिक अमेरिका यह भी देखता रहेगा कि हांगकांग की स्वायत्ता और विशेष व्यापारिक दर्जा बरकरार रहे. इस दर्जे के चलते हांगकांग चीन के खिलाफ किसी भी अमेरिकी पाबंदी या व्यापार शुल्क से प्रभावित नहीं होता. विधेयक में यह भी कहा गया है कि अमेरिका हांगकांग के उन सभी लोगों को वीजा देगा तो इन दिनों चल रहे अहिंसक प्रदर्शनों का हिस्सा रहे हैं.

डोनाल्ड ट्रंप ने एक बयान में कहा, ‘मैं चीन के राष्ट्रपति शी और हांगकांग की जनता का सम्मान करता हूं और मैं इस विधेयक पर हस्ताक्षर कर रहा हूं.’ इससे पहले इस सप्ताह की शुरूआत में डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए थे कि वह इस विधेयक पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे.

सवाल उठता है तो फिर क्या हुआ जो डोनाल्ड ट्रंप ने अपना रुख बदल लिया. माना जा रहा है कि इसकी वजह अमेरिकी कांग्रेस यानी संसद का बढ़ता दबाव रहा. कांग्रेस के कई सदस्य इस बिल का समर्थन कर रहे थे. जानकारों के मुताबिक अगर डोनाल्ड ट्रंप इस बिल पर वीटो भी करते तो बाकी के सांसद उनके फैसले के खिलाफ वोट कर इसे पलट सकते थे.

उधर, चीन ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए अमेरिका के खिलाफ जवाबी कार्रवाई करने की धमकी दी है. चीन के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि, ‘इसकी (विधेयक) प्रकृति अत्यंत घृणित है और इसके इरादे बेहद भयावह.’ हालांकि बयान में यह नहीं कहा गया है कि चीन किस तरह के कदम उठा सकता है.

व्यापार युद्ध के चलते पहले से ही खराब चल रहे चीन और अमेरिका के रिश्तों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस कदम से खटास और बढ़ सकती है. चीन ने पहले भी कहा था कि अमेरिका हांगकांग के मामले में टांग न अड़ाए. मंगलवार को चीन के विदेश मंत्रालय ने बीजिंग में मौजूद अमेरिकी राजदूत को समन जारी किया था. इस समन में उनसे कहा गया था कि अगर डोनाल्ड ट्रंप इस विधेयक को मंजूरी देते हैं तो फिर उसके बाद होने वाले परिणामों के लिए भी तैयार रहें.

हांगकांग लंबे समय तक ब्रिटेन का उपनिवेश रहा था. 1997 में ब्रिटेन ने स्वायत्तता की शर्त पर उसे चीन को सौंपा था. तब चीन ने ब्रिटेन से वादा किया था कि वह ‘एक देश-दो व्यवस्था’ के सिद्धांत के तहत काम करेगा. और हांगकांग को अगले 50 साल के लिए अपनी सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी व्यवस्था बनाए रखने की पूरी आजादी देगा. लेकिन कुछ समय पहले वहां के प्रशासन द्वारा प्रत्यर्पण कानून में बदलाव को लोगों ने 1997 में हुए समझौते के खिलाफ बताया. इसके बाद बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए. आखिरकार हांगकांग प्रशासन को झुकते हुए यह बदलाव वापस लेना पड़ा.