महाराष्ट्र में महीने भर से अधिक चली राजनीतिक खींचतान के बाद आज शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे प्रदेश के नए मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेंगे. इस बीच महाराष्ट्र ने राष्ट्रपति शासन को भी देखा और 80 घंटों की दूसरी देवेंद्र फडणवीस सरकार को भी. लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि जो सरकार बन रही है, उसके पास संख्या बल है और अगर शिव सेना के साथ आ रही दोनों पार्टियां - राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस - की ओर से आगे सबकुछ ठीक रहा तो उद्धव ठाकरे की सरकार एक स्थायी सरकार साबित होगी.

लेकिन जिस आनन-फानन में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने बगैर संख्या बल के, सिर्फ एनसीपी के अजित पवार के भरोसे देवेंद्र फडणवीस को फिर से मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई, उसे लेकर खुद पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अंदर कई तरह की बातें चलने लगी हैं. दबी जुबान में भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेता कह रहे हैं कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने अपनी जिद की वजह से महाराष्ट्र जैसे बेहद अहम राज्य में फिर से सरकार बनाने का अवसर गंवा दिया. पार्टी और संघ के अंदर कुछ लोग यह मानते हैं कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, नितिन गडकरी का नाम आगे करके शिवसेना से बातचीत करते तो प्रदेश में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार बनाने का रास्ता साफ हो सकता था.

जब महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम आए तो शिवसेना ने इस बात को लेकर बहुत कठोर रुख अपना लिया कि उससे सत्ता और जिम्मेदारियों में बराबर-बराबर हिस्सेदारी का वादा किया गया था और इस फाॅर्मूले के हिसाब से उसे ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद चाहिए. उस वक्त भी भाजपा और संघ में यह बात चली थी कि अगर नितिन गडकरी का नाम आगे करके बात होगी तो शिवसेना मान जाएगी. तब शिवसेना के नेता किशोर तिवारी ने भी सार्वजनिक तौर पर यह कहा था कि अगर भाजपा गडकरी को बात करने के लिए भेजेगी तो वे दो घंटे में इस संकट को सुलझा देंगे. इसके लिए उन्होंने संघ प्रमुख मोहन भागवत को एक पत्र भी लिखा था.

अब सवाल यह उठता है कि जब भाजपा और संघ के अंदर चल रही अनौपचारिक बातचीत में और शिवसेना की ओर से सार्वजनिक तौर पर गडकरी का नाम आगे लाया गया तो भी भाजपा ने उन्हें इस मसले पर बातचीत करने तक का काम क्यों नहीं सौंपा? पहले भी कुछ राज्यों में भाजपा के पास संख्या बल नहीं होने की स्थिति में अमित शाह उन्हें इस तरह के काम में लगा चुके हैं. गोवा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. वहां भाजपा के पास कांग्रेस से कम सीटें थीं. इसके बाद अमित शाह ने नितिन गडकरी को वहां भेजा और उन्होंने कुछ ही घंटों में जरूरी संख्या बल का बंदोबस्त कर दिया. ऐसे में ज्यादातर लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि जरूरत के वक्त गडकरी का उनके गृह राज्य में ही इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया?

इस बारे में भाजपा के अलग-अलग नेताओं से बातचीत करने पर एक ही तरह की बात सामने आती है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता इस बाबत कहते हैं, ‘2014 में भी नितिन गडकरी को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनाया जा सकता था. लेकिन क्यों नहीं बनाया गया? सब लोग जानते हैं कि गडकरी संघ के चहेते हैं और वे कई मामलों में स्वतंत्र नेता हैं. पार्टी अध्यक्ष रहते हुए भी उन्हें जो ठीक लगता था, वे वही करते थे. नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा में भले ही पार्टी के अधिकांश नेता इन दोनों के सामने कुछ नहीं बोल पाते हों लेकिन गडकरी को जब अपनी बात रखनी होती है तो वे अपने ढंग से अपनी बात रख देते हैं. 2014 में भी इसी वजह से उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया था.’

वे आगे कहते हैं, ‘इस बार भी उन्हें इसी वजह से आगे नहीं लाया गया. हम राजनीति के जिस दौर में हैं, उस दौर में संसाधन संपन्न महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की राजनीतिक हैसियत क्या होती है, यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है. आप कल्पना कीजिए कि उस कुर्सी पर अगर गडकरी जैसा मजबूत व्यक्ति बैठे तो उसकी क्या राजनीतिक ताकत होगी. जाहिर है कि इससे पार्टी के ही कुछ लोग सहज नहीं थे.’

अनौपचारिक बातचीत में भी जो बात भाजपा नेता खुलकर नहीं बोल पा रहे हैं बल्कि इशारों में कह रहे हैं, वह यह है कि नितिन गडकरी को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनाने को लेकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी सहज नहीं है. 2014 में भी इसी वजह से अपेक्षाकृत बेहद कमजोर माने जाने वाले देवेंद्र फडणवीस को महाराष्ट्र जैसे राज्य की बागडोर सौंप दी गई. गडकरी जिस तरह से संघ के चहेते हैं, उसमें बहुत से लोगों को यह लगता है कि अगर वे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने और जिस तरह से उन्हें अपने मंत्रालयों में अच्छे प्रदर्शन के लिए जाना जाता है, उसी तरह का प्रदर्शन उन्होंने राज्य में भी किया तो आने वाले दिनों में वे प्रधानमंत्री पद की दौड़ में बेहद मजबूती के साथ शामिल हो सकते हैं. संभवतः उनके अंदर की यही संभावना पहले 2014 में और अब 2019 में उनकी राह की बाधा बन गई.

अब सवाल यह उठता है कि जो शिवसेना लगातार ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद पर अड़ी हुई थी, क्या उसने नितिन गडकरी के कहने से और उनके नाम पर अपनी जिद छोड़ दी होती? इस सवाल के जवाब में महाराष्ट्र भाजपा के एक नेता कुछ रोचक बातें बताते हैं. वे कहते हैं, ‘फडणवीस ऊपर से दिखाते हैं कि वे बहुत सरल हैं लेकिन कई बार ऐसा हुआ कि उनके व्यवहार से शिवसेना में नाराजगी बढ़ी. इससे भी बड़ी बात यह है कि महाराष्ट्र में फडणवीस को मोदी-शाह के प्रतिनिधि के तौर पर देखा जाता था. जबकि गडकरी के बारे में यह माना जाता है कि अगर वे मुख्यमंत्री बनेंगे तो स्वतंत्र ढंग से काम करेंगे. ठाकरे परिवार और गडकरी का संबंध बहुत पुराना है और दोनों पक्ष एक-दूसरे का बहुत सम्मान भी करते हैं.’

वे आगे कहते हैं, ‘शिवसेना जिस तरह से मराठी मानुष की राजनीति करती आई है, अगर उससे गडकरी का नाम आगे करके बात की जाती कि तो वह उनकी सरकार को समर्थन देने के लिए तैयार हो सकती थी. फिर शिवसेना को लेकर बार-बार यह बात भी चल रही थी कि वह भाजपा की पिछलग्गू पार्टी हो गई थी. इसलिए उसे अपने समर्थकों को उत्साहित रखने के लिए अपना दम दिखाना था. फडणवीस को मुख्यमंत्री बनने से रोककर एक तरह से वह अमित शाह की योजना को बेपटरी करती. गडकरी के मुख्यमंत्री बनने की स्थिति में शिवसेना फडणवीस को रोकने को ही अपनी जीत दिखाकर इसके लिए तैयार हो सकती थी.’