निर्देशक: आदित्य दत्त
लेखक: डेरियस यार्मिल, जुनैद वासी
कलाकार: विद्युत जामवाल, अदा शर्मा, अंगिरा धर, गुलशन देवैया, राजेश तैलंग
रेटिंग: 2/5

कमांडो सीरीज की पिछली फिल्म में जहां नोटबंदी और कालेधन की वापसी जैसी थीम का इस्तेमाल किया गया था, वहीं, ‘कमांडो-3’ एक कदम आगे बढ़कर युवाओं, खासकर मुसलमानों के कट्टरपंथ की तरफ बढ़ने और इससे देश में भीतरी खतरा पैदा होने के विषय को उठाती है. ढेर सारा प्रोपेगैंडा समेटने के बावजूद फिल्म से जुड़ी दो बातें राहत देती हैं. इनमें से पहली यह है कि कमांडो-2 की राह पर चलकर भी यह पूरी तरह सरकारी विज्ञापन नहीं बनी है. वहीं, दूसरी राहत वाली बात यह है कि फिल्म ‘अच्छे मुसलमानों’ के किस्से दिखाकर और देशभक्ति को हिंदू-मुसलमान के पैमाने पर न तौले जाने की बात कहकर कुछ हद तक संतुलन साध लेती है. ऐसा करते हुए ‘कमांडो-3’ देशभक्ति से सराबोर होकर उस जॉनर की एक्शन फिल्म बन जाती है जिसमें अब तक अक्षय कुमार और जॉन अब्राहम की फिल्में ही फिट होती रही हैं.

कहानी की बात करें तो सनी देओल की ‘द हीरो’ से लेकर अक्षय कुमार की ‘बेबी’ और ऋतिक रोशन की ‘वॉर’ जैसी एक्शन फिल्मों में आप जो कहानी देख चुके हैं उसे ही ‘कमांडो-3’ भी दोहराती है. यानी यहां भी देश पर कोई बड़ा खतरा आने को है और एक जांबाज नायक अकेले उससे ऩिपटने के मिशन पर निकला है. जो बात इसे बाकी फिल्मों से अलग बनाती है, वह इसके संवाद हैं जिनमें कूट-कूटकर प्रोपेगैंडा भरा गया है. उदाहरण के लिए ‘बहुत जज़्बाती हो’ के जवाब में असहमत नायक कहता है ‘सिर्फ भारतवासी.’ इसी तरह देशभक्ति, हिंदू-मुसलमान, सेना, गोरक्षा जैसी तमाम चीजें संवादों का हिस्सा बहुत बनावटी ढंग से बनी हैं. इतनी कि शुरूआत में तो आप कान बंद कर लेना चाहते हैं. हां, कुछ देर बाद आपका टॉलरेंस लेवल बढ़ जाता है.

कमांडो सीरीज की तमाम फिल्मों की तरह ‘कमांडो-3’ का भी सबसे मजबूत पक्ष इसका एक्शन है और इसका पूरा क्रेडिट विद्युत जामवाल को जाता है. मार-पीट करना हो, कई मंजिलों से कूदना हो या संकरी जगहों से निकलना, विद्युत जामवाल यह सब बहुत कुशलता से करते हैं. इस बार एक खास चीज जो आपका ध्यान खींचती है वह यह है कि हर बार एक्शन सीक्वेंस के पहले एक खास तरह का बैकग्राउंड म्यूजिक बजता है और जामवाल अपनी चोटी टाइट करते हुए नज़र आते हैं. बांहें चढ़ाने को रिप्लेस करने वाले, चोटी कसने के ये दृश्य इतने प्रभावशाली हैं कि युवाओं का लोकप्रिय स्टाइल भी बन सकते हैं. फिर भी फिल्म में उनका एक्शन दर्शनीय तो है लेकिन इसमें एक भी एक्शन सीक्वेंस ऐसा नहीं है जिसे आपको सांसे रोककर देखना पड़े. वहीं, फिल्म की दोनों नायिकाओं अदा शर्मा और अंगिरा धर का एक्शन भी आपको सुहाता है. अपने साझा एक्शन दृश्यों में ये नायिकाएं कमाल की फुर्ती और को-ऑर्डिनेशन दिखाती हैं.

अभिनय की बात पर आएं इससे पहले आपको कमांडो की पहली किस्त में मौजूद एक दृश्य की याद दिला देते हैं. इस दृश्य में नायिका विद्युत जामवाल की तारीफ करते हुए कहती है कि ‘क्या सपाट चेहरे से इंसान की झंड कर देते हो यार. लोगों के कपड़े इस्त्री होते हैं, तुम्हारा तो चेहरा ही इस्त्री किया हुआ है.’ इस कमांडो के बाद, कमांडो-2 और अब ‘कमांडो-3’ भी आ चुकी है और जामवाल के चेहरे की इस्त्री है कि बिगड़ ही नहीं रही है. यानी पिछली दोनों फिल्मों की तरह यहां पर भी वे अपने चेहरे पर अभिनय की सलवटें यानी एक्स्प्रेशन्स नहीं ला पाए हैं.

अभिनय के मामले में अगर कोई फिल्म की लाज बचाता दिखता है तो वह विलेन की भूमिका निभा रहे गुलशन देवैया हैं. बड़ी-बड़ी आंखों और संवाद अदायगी के एक खास अंदाज से वे ढेर सारी दहशत रचने में कामयाब होते हैं. लेकिन उनका अभिनय भी उनकी पिछली चर्चित फिल्म ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ का दोहराव भर लगता है. उनके अलावा यहां पर अभिनय की चुटकी भर मात्रा अदा शर्मा के मजेदार हैदराबादी अंदाज में देखने को मिलती है और वे ही फिल्म के दौरान कुछ ठहाकों की वजह भी बनती हैं.

‘कमांडो-3’ का निर्देशन ‘टेबल नं21’ और ‘आशिक बनाया आपने’ जैसी फिल्में रचने वाले आदित्य दत्त ने किया है. फिल्मकार होने के अलावा दत्त की एक और पहचान यह है कि वे मशहूर गीतकार आनंद बक्शी के नाती हैं. ऐसे में दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा कि लेखन उनकी फिल्म का सबसे कमजोर पक्ष है. उनकी इस फिल्म में कमजोर पटकथा, टुच्चे संवादों और छिछले अभिनय के अलावा लचर निर्देशन भी वह वजह है, जिसके चलते ‘कमांडो-3’ अपना मनोरंजन कोशंट खोती है. कुल मिलाकर, ‘कमांडो-3’ एक बार फिर बताती है कि अच्छी एक्शन फिल्म बनाने के लिए केवल अच्छा एक्शन होने भर से बात नहीं बनती है.