पिछले सप्ताह अहमदाबाद में शिरीष पंचाल द्वारा पांच ज़िल्दों में, गुजराती में, संकलित भारतीय कथाओं के लोकार्पण करने का सुयोग मिला. इस अनूठी पुस्तक में शिरीष जी ने अनेक स्रोतों से कथाएं एकत्र की हैं जिनमें रामायण, महाभारत, कथासरित्सागर, हितोपदेश, पंचतंत्र, जातक, जैन कथाएं, लोक कथाएं आदि शामिल हैं. उन्होंने हिंदी साहित्य सम्मेलन, गीता प्रेस, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् आदि का आभार भी माना है. ऐसा कोई कथा-संग्रह हिंदी में है ऐसा नहीं लगता. हमारे यहां इस तरह के दीर्घकालीन काम करने का अवसर खोजने-पानेवाले लोग अब शायद नहीं रहे. कई अर्थों में यह ग्रंथ भारतीय कथा का विश्वकोष जैसा है.

इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए मुझे ख़याल आया कि जिन सभ्यताओं ने अपने जीवन-प्रवाह में सबसे अधिक कथाएं कही हैं उनमें निश्चय ही भारत एक है. कथा-विपुलता में शायद उसकी तुलना सिर्फ़ ग्रीस और चीन जैसे देशों से ही की जा सकती है. यह विपुलता इतनी विशाल है कि यह तक कहा जा सकता है कि भारत स्वयं एक महान कथा, महागाथा है जो असमाप्य है. यही नहीं, भारत में कथा ने बहुत पहले कल्पना, यथार्थ, पौराणिकता, ऐतिहासिकता, मिथक, एकरैखिकता, भटकाव, अतियथार्थ आदि का ऐसा घाल-मेल कर लिया गया था कि कथा कहने का कोई एक ढंग रूढ़ नहीं हो पाया. आज भी हमारे अनेक लोकरूप जैसे पण्डवानी, यक्षगान, पण्डून के कड़े आदि मुख्यतः कथावाचक रूप हैं. हमारे अपने दो महाकाव्य ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ की कथाओं को हमने बार-बार अनेक रूपों में कहा है. यह भी लक्ष्य करने की बात है कि हर बात कहने में कथा थोड़ी सी बदल भी जाती है: सीता, कैकेयी, लक्ष्मण, उर्मिला, रावण, भरत, वशिष्ट और विश्वामित्र, हनुमान आदि, और अर्जुन, द्रोपदी, कर्ण, भीष्म, अश्वत्थामा, अभिमन्यु, उत्तरा आदि के कोणों से देखने-कहने पर इन महाकाव्यों की कथाएं बहुत बदल जाती हैं. इसका महत्व रहा है और आज तक है कि कथा कह कौन रहा है- उसकी विश्वसनीयता और प्रामाणिकता क्या है.

यह भी ध्यान में आता है कि जैसे मनुष्य अन्य प्राणियों से अलग मुख्यतः इसलिए होता है कि उसके पास भाषा है वैसे ही वह इस मामले में भी अलग है कि वह एक कथाकार प्राणी है. वह कथा रचता है, कहता है. हम निरे संसार में नहीं रहते हम भाषिक और कथात्मक संसार में अनिवार्यतः रहते हैं. यह दावा करना निराधार नहीं होगा कि भारत एक कथावाचक देश है जो सदियों से अपने और दूसरों के लिए कथा कहता रहा है. कभी यह कथा सीख देती है, कभी आनन्द. कभी दोनों एक साथ. जो भी हो, मनुष्य की स्थिति की विडम्बनाओं, सम्भावनाओं, सुख-दुख-व्यथा, अन्तर्विरोध आदि का गहरा और, टिकाऊ अहसास कथाएं ही कराती रही हैं. इन दिनों हर दिन व्यापक हो रही झूठ की कथाओं से चिढ़ और ऊब दोनों ही होती है. हमें सच की कथा कहनेवाले चाहिये. वे हैं पर हम उन्हें सुनते नहीं.

ज्ञान, कोष और सत्य

अहमदाबाद जाने का दूसरा कारण था वहां के विश्व कोष ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित बाल विश्व-कोष का लोकार्पण. गुजराती में विश्वकोष ट्रस्ट कई दशकों से कार्यरत हैं और उसका अपना अच्छा-ख़ासा भवन, पुस्तकालय आदि हैं. अहमदाबाद में वह बहुत सारी साहित्यिक गतिविधियों का केन्द्र भी है. उसकी शुरूआत कुछ विद्वानों और परोपकारी लोगों की इस चिन्ता से हुई थी कि उनकी मातृभाषा गुजराती में ज्ञान, सारे संसार का ज्ञान, उपलम्य होना चाहिये. दोनों दिनों के कार्यक्रम गुजराती में हुए.

विश्वकोष प्रकाशित कर उन्हें पुस्तकालयों की अलमारियों में बन्द हो जाने से बचाने और उन्हें साधारण लोगों की जानकारी में लाने के लिए गुजराती विश्वकोष ग्रन्थगौरव यात्राएं भी निकाली गयी हैं. एक चित्र में एक हाथी के हौदे के ऊपर विश्वकोष की प्रतियाँ अपने हाथों में लिये बच्चे सवार हैं. ज़ाहिर है कि यत्न ज्ञान पुस्तकों में महदूद कराने के बजाय व्यापक करने का है.

बच्चों में साहित्यिक रुचि कैसे पैदा हो और पढ़े और कैसे उनमें अपनी मातृभाषा का अनुराग बढ़े यह हमारे समय के भीषण प्रश्न हैं. इन पर हिंदी में व्यापक विचार बहुत कम हुआ है. हम यह लगभग भूल चुके हैं कि साहित्य बच्चों के बीच सहानुभूति का भूगोल प्रस्तुत करता है और उन्हें यह अहसास कराता है कि अपने और दूसरों के बीच भेदभाव अस्वाभाविक वृत्ति है. हम सभी एक-दूसरे जैसे ही हैं. विश्वकोष जैसे उपक्रम बच्चों की ज्ञान-पिपासा शांत करते और स्वस्थ दिशा में बढ़ाते भी हैं. उन्हें यह भी सिखाते हैं कि ज्ञान के उत्पादन और प्रसार में सारा संसार शामिल है कि कई तथाकथित छोटे देशों से क्रान्तिकारी ज्ञानी आये हैं कि तथ्यों की व्याख्या कई तरह से की जाती है, कि ज्ञान की यात्रा कभी समाप्त नहीं होती, कि वही ज्ञान हमारे काम का है जिसमें हमारी हिस्सेदारी हो, कि ज्ञान मनुष्य का सहज स्वभाव है और यही उसे अन्य प्राणियों से भिन्न बनाता है, कि आज के संसार में ज्ञान के बिना सार्थक-सफल नहीं हुआ जा सकता; कि ज्ञान पर किसी जाति या धर्म या सम्प्रदाय या लिंग का एकाधिकार या वर्चस्व नहीं होता, कि ज्ञान के दरबार में सभी ज्ञानी बराबर हैं आदि.

ऐसी बहुत सारी शिक्षा सीधे-सीधे नहीं मिलती पर धीरे-धीरे अन्तस्थ होकर घर करती जाती है. हम अकसर उसी शिक्षा पर ध्यान देते हैं जो सीधे-सीधे दी जाती है, यह भूलकर कि हर बच्चा जितना पुस्तकों, शिक्षकों, स्कूलों से सीखता है उतना ही अपने परिवार, पुरा-पड़ोस, परिवेश से भी. ज्ञान का एक अनिवार्य प्रतिफल होना चाहिये बाल प्रश्नवाचकता का सहज उद्दीपन. बच्चा प्रश्न पूछे और कुछ भी यों ही न मान ले. यह प्रश्नवाचकता ही आगे जाकर उसे एक लोकतांत्रिक नागरिक बनायेगी. ज्ञान का दूसरा प्रतिफल है निर्भयता और तीसरा विनयशीलता. यह निरा आदर्श नहीं है हम चाहें तो यह यथार्थ में बदल सकता है. हमारा ऐसा चाहना दिखायी नहीं देता. असली कठिनाई बच्चे नहीं, हम हैं.

कविता-समग्र

1950 की जनवरी में जब पहले गणतन्त्र दिवस की अर्भ्यथना में अपनी पहली तुकबन्दी लिखी थी तो कभी सोचा भी न था कि यह लगभग 70 वर्षों में फैले कविता-जीवन का एक फीक़ा सा भले उत्साहित आरम्भ है. 12 बरस की उमर में ग्वालियर की पत्रिका ‘भारती’ में दिनकर जी के एक गीत के नीचे मेरा एक गद्यगीत प्रकाशित हुआ था. 16-17 बरस की उमर तक आते-आते उस समय की सभी प्रसिद्ध पत्रिकाओं ‘वसुधा’, ‘कल्पना’, ‘ज्ञानोदय’, ‘युगचेतना’, ‘राष्ट्रवाणी’, ‘आजकल’, ‘सुप्रभात’, ‘कृति’ आदि में कविताएं प्रकाशित कराने का सौभाग्य मिल गया था. 1966 में पहला कवितासंग्रह भारतीय ज्ञानपीठ ने प्रकाशित किया. उसके बाद के अधिकांश संग्रह राजकमल प्रकाशन से आये: एक-एक वाग्देवी, प्रवीण और वाणी प्रकाशनों से। अब कविता-समग्र सेतु प्रकाशन से आ रहा है जो तीन ज़िल्दों में है जिसमें से आखि़री ज़िल्द अनुवादों की है जिनमें से अधिकांश, पोलिश पाँच कवियों से, विदुषी रेनाता चेकाल्स्का की सहायता से किये थे। एक हज़ार से अधिक मौलिक कविताए हैं.

प्रूफ़ देखते हुए उन्हें एक बार फिर पढ़ने का सुयोग हुआ. थोड़ी सख़्ती बरतता, जैसी कि मैंने अपने पहले कविता संग्रह के लिए कविताएं सुनते समय बरती थी और कुल 56 कविताएं रखी थीं और लगभग 150 खारिज कर दी थीं, तो समग्र से कम से कम दो सौ कविताएं निकाल सकता था. पर ऐसा नहीं किया क्योंकि इतने बरसों बाद कविता से अनुराग के अलावा कुछ ममता भी हो जाती है, अपनी कविता से भी. सो मुनासिब बेरहमी से पेश नहीं आ सका. कविता, एक अर्थ में, कवि की आत्मकथा नहीं तो अन्तर्कथा भी होती है. उसमें से कुछ को बाद में खारिज़ करना शायद नैतिक नहीं होता, भले कविता के प्रतिमानों की दृष्टि से वह वांछनीय होता हो.

अब जब कविता में किया-धरा अधिकांश एक साथ आ ही रहा है तो याद करता हूं बहुत कृतज्ञता से उन सबको जिनसे मैंने प्रेरणा पायी और जिन्होंने कविता में मेरी आस्था अटल रखी. उनमें मेरे बालसखा रमेशदत्त दुबे, अज्ञेय, शमशेर, मुक्तिबोध, श्रीकान्त वर्मा, रघुवीर सहाय, कमलेश, कुंवर नारायण, जितेन्द्र कुमार, सोम दत्त, विनोद कुमार शुक्ल, रेनाता चेकाल्स्का, उदयन वाजपेयी, मदन सोनी, ध्रुव शुक्ल आदि शामिल हैं. ईलियट, यीट्स, आक्तोवियो पाज़, पाब्लो नेरूदा, ज्बीग्न्येब हेर्बेत, ईव बोनफुआ, ग़ालिब आदि को भी कृतज्ञतापूर्वक याद करता हूं. कबीर-तुलसी-सूर से कोई हिन्दी कवि कैसे उऋण हो सकता है? कालिदास, भवभूति, अमरु आदि से कुछ बिम्ब और अभिप्राय चुराना भी अलक्षित नहीं जा सकता. इन कवियों के बिना मैं कवि नहीं हो सकता था और मुझे यह ग़लतफ़हमी है कि उनमें से कुछ कभी-कभी मुझमें याने मेरी कविता में अन्तर्ध्वनित होते हैं- मेरा अपनी आवाज़ में जब-तब उनकी अनुगूंज भी है. कोई कवि अकेले नहीं लिखता- उसके भौतिक एकान्त में भी दूसरे कवि उसे लिखता हुआ देखते रहते हैं. कभी चौकसी की तरह, कभी दुलार से.