अनुच्छेद 370, जो भारत के संविधान में जम्मू-कश्मीर को एक विशेष स्थिति देता था, उसे हटाये जाने के समय इसके जो फायदे और वजहें गिनाई गयी थीं, उनमें से एक यह भी थी कि हर भारतीय नागरिक को कश्मीर में रहने का उतना ही हक़ होना चाहिए जितना कि कश्मीर के लोगों को है.

यह भी कहा गया था कि अब बाहर के लोगों को कश्मीर में रहने में आसानी होगी. लेकिन, पांच अगस्त को, यह अनुच्छेद हटाये जाने के बाद से कश्मीर घाटी में जो हालात बन रहे हैं उनसे एक बात बिलकुल स्पष्ट है कि इतना मुश्किल देश के अन्य भागों के लोगों के लिए कश्मीर में रहना कभी नहीं था जितना अभी है.

कारण कई हैं, लेकिन इससे पहले कश्मीर में बाहर के लोगों के आने और रहने पर थोड़ी बात की जाये.

कश्मीर में बाहर के लोग

कश्मीर घाटी में बाहर के लोगों के आने का सिलसिला 90 के दशक के आखिरी सालों में शुरू हुआ था. इसके बाद से हर साल यहां हजारों लोग आने लगे और यहां की अलग-अलग जगहों पर काम काम करने लगे.

बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और कई अन्य राज्यों से आने वाले इन लोगों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती गयी और अभी की बात की जाये तो एक अनुमान के मुताबिक हर साल करीब 12 लाख लोग रोजगार की तलाश में कश्मीर घाटी आते हैं. इन लोगों में नाई, बढ़ई, मजदूर और हर तरह के कामकाजी लोग शामिल हैं. सामान्य हालत में ये लोग मार्च के महीने में कश्मीर आते हैं और फिर नवंबर में वापिस अपने घर चले जाते हैं.

लेकिन इस साल अगस्त में ही सरकार ने इन लोगों को अपने घर लौट जाने का आदेश दे दिया था, जो पहले कभी नहीं हुआ था. अनुच्छेद 370 हटाये जाने के तुरंत पहले और बाद के कुछ दिनों में यहां के प्रशासन ने यह सुनिश्चित किया कि कोई भी बाहर का व्यक्ति कश्मीर घाटी में न रहे.

“यह सब इन लोगों की सुरक्षा के लिए किया गया था. आशंका यह थी कि 370 हटाये जाने के बाद घाटी के हालात खराब होंगे और इन लोगों को निशाना बनाया जाएगा” प्रशासन में महत्वपूर्ण पद पर काम कर रहे एक अधिकारी सत्याग्रह को बताते हैं.

घाटी में हालात बेहतर होते देखकर पिछले कुछ महीनों में इनमें से कई लोगों ने वापिस घाटी का रुख किया. हजारों ट्रक ड्राइवर भी कश्मीर से सेब ले जाने के लिए यहां आ पहुंचे. और फिर वही हुआ जिसका प्रशासन को डर था.

धमकियां और हमले

अनुच्छेद 370 हटाये जाने के फौरन बाद कश्मीर में कई मिलिटेंट गुटों ने बाहर के लोगों को यहां न आने की चेतावनी दी. कई जगह मिलिटेंट्स ने इस बारे में पोस्टर छपवाकर बांटे और कई जगह उन्होने मस्जिदों से भी ऐलान करवाए.

“अगर बाहर का कोई इंसान किसी मस्जिद का इमाम भी होगा तो उसको भी यहां रहने की इजाज़त नहीं है. लोगों से अनुरोध है कि बाहर के लोगों को रहने और काम करने की जगह न दें” छापे गए पोस्टरों और मस्जिदों के एलानों में यह बात स्पष्ट रूप से कही गयी थी.

शुरू में तो ये बस धमकियां ही लगी थीं, लेकिन सात अक्टूबर की शाम दक्षिण कश्मीर के शोपियां जिले में अलवर, राजस्थान के रहने वाले एक ट्रक ड्राइवर की गोली मारकर हत्या कर दी गई. साथ ही उसका सेबों से लदा ट्रक भी जला दिया गया.

इस हत्या ने कश्मीर घाटी में खलबली मचा दी. प्रशासन, पुलिस, सुरक्षा एजेंसियां और आम लोग सब हैरान-परेशान थे. फिर भी सभी यह आशा कर रहे थे कि यह शायद अपनी तरह की अकेली घटना थी. लेकिन ऐसे लोग गलत थे.

इसके एक हफ्ते बाद, 16 अक्टूबर को, दो और घटनाएं हुई और दोनों दक्षिण कश्मीर में. दिन में पुलवामा जिले में एक मजदूर की गोली मारकर हत्या कर दी गयी और रात में शोपियां जिले में एक ट्रक ड्राइवर को मार दिया गया. मिलिटेंट्स के इस हमले में एक और व्यक्ति घायल हो गया था.

23 अक्टूबर को फिर शोपियां जिले में दो ट्रक ड्राइवर मार दिये गए. ये दोनों राजस्थान के रहने वाले थे. उसके कुछ दिन बाद जम्मू के एक ट्रक ड्राइवर को अनंतनाग जिले के बिजबेहरा इलाक़े में मार दिया गया.

फिर 29 अक्टूबर को जो हुआ उसने सबके दिल दहला दिये. दक्षिण कश्मीर के ही कुलगाम जिले में अज्ञात बंदूकधारियों ने पश्चिम बंगाल के छह मजदूरों को उनके कमरे से अगवा कर लिया.

बंदूकधारियों ने इन लोगों को, उनके कमरे से कुछ ही दूर, एक दीवार के साथ खड़ा किया और उन पर अंधाधुंध गोलियां चला दीं. इस गोलीबारी में पांच लोग मारे गए और एक गंभीर रूप से घायल हो गया.

सत्याग्रह जब अगले दिन कुलगाम जिले के इस गांव में तो वहां दहशत का माहौल था और लोग निराश थे. “ये बेचारे आज अपने घर जा रहे थे. देखें कैसे सेब की पेटियां बिखरी पड़ी हैं. अपने बच्चों के लिए सेब लेके जा रहे थे ये लोग. यह सरासर अन्याय है” कातरसू गांव के एक व्यक्ति ने सत्याग्रह से बात करते हुआ कहा.

इस व्यक्ति के साथ-साथ पूरा गांव इन मजदूरों की मौत का शोक माना रहा था और प्रार्थना कर रहा था कि अब ऐसा कुछ न हो.

पुलिस कहती है कि यह मिलिटेंट्स का काम है. “हमें पता चला है कि जैश-ए-मुहम्मद और हिज़्ब-उल-मुजाहिदीन के मिलिटेंट इस हत्याकांड के पीछे हैं. हम जल्द ही इन लोगों की पहचान भी कर लेंगे” कुलगाम जिले के एक आला पुलिस अधिकारी सत्याग्रह को बताते हैं.

अब इन मिलिटेंट्स की पहचान हो या न हो, इस तरह की घटनाओं के बाद कश्मीर में जो बाहर के लोग वापिस आ गए थे उनमें से ज्यादातर लोग अब वापिस लौट गए हैं.

सत्याग्रह ने बिहार के रहने वाले, दानिश अहमद, से बात की, जो अगले ही दिन अपना सामान लेकर कश्मीर से अपने घर जाने वाले थे. “कल से 80 फोन आ चुके हैं घर से. घर वाले कह रहे हैं कि आकर यहां भीख मांग लो, लेकिन वहां मत रहो.”

दानिश पिछले 20 साल से कश्मीर में आकर काम कर रहे हैं और उनका कहना है कि ऐसा डर का माहौल यहां कभी नहीं था जैसा अभी है. “इन बीस सालों में मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि मुझे यहां कोई खतरा है, चाहे हालात कितने भी खराब क्यों न हों. लेकिन इस बार मुझे भी ऐसा लग रहा है कि समझदारी यहां से निकलने में ही है,” दानिश सत्याग्रह को बताते हैं.

लेकिन अभी भी कुछ लोग ऐसे हैं जो डर के बावजूद यहां रहकर किसी भी तरह से अपना काम करना चाहते हैं.

लेकिन ऐसे लोगों के लिए एक और परेशानी है

अनुच्छेद 370 हटाये जाने के बाद कश्मीर घाटी में इस समय कोई भी किसी बाहर वाले को अपनी दुकान या रहने के लिए जगह देने को बिलकुल तैयार नहीं है. लोगों में यह डर बैठ गया है कि अब बाहर वालों को किराए पर जगह देना सुरक्षित नहीं है.

“पहले हमें पता था कि कोई बाहर वाला कितने ही साल हमारे यहां किराए पर रह ले, वो हमारी जगह नहीं हथिया सकता है. लेकिन 370 हटने के बाद अब इस बात का डर हमेशा लगा रहेगा. तो बेहतर है कि जगह ही न दें इन लोगों को,” श्रीनगर के रामबाग इलाक़े में रहने वाले, मुहम्मद यूसुफ बताते हैं.

यूसुफ ने कई सालों से अपनी दो दुकानें बाहर के लोगों को किराये पर दे रखी थीं. लेकिन अगस्त में जब ये लोग घर चले गए तो यूसुफ ने अपनी दुकानों के ताले बदल दिये.

“वो लोग वापिस आए थे लेकिन मैंने उन्हें अपनी दुकानें नहीं दी. खाली पड़ी रहें दुकानें, कोई मसला नहीं है,” यूसुफ कहते हैं.

ऐसे ही उत्तर प्रदेश के बिजनौर के रहने वाले नाई, रिज़वान अहमद, अनंतनाग जिले में पिछले 14 सालों से नाई की दुकान चला रहे थे. अगस्त में अपने परिवार समेत रिज़वान अपने घर चले गए थे. लेकिन सितंबर में जब वे वापस लौटे तो देखा उनकी दुकान पर लगा बोर्ड हटा दिया गया था और उसके ताले भी बदल दिये गए थे.

“पिछले एक महीने से मैं अपने दुकान मालिक को मनाने की कोशिश कर रहा हूं, लेकिन वो मान ही नहीं रहा, इसके बावजूद कि मैं उसी के घर में रह रहा हूं आजकल. लेकिन अब फर्क यह है कि मैं मेहमान हूं, किरायेदार नहीं,” रिज़्वान ने सत्याग्रह को बताया.

रिजवान कहते हैं कि उनका मकान मालिक उनकी खूब मेहमाननवाज़ी कर रहा है, लेकिन रहने और काम करने के लिए किराये पर जगह देने को तैयार नहीं है.

पिछेल कुछ दिनों में चीज़ें और बिगड़ गयी हैं. बाहर के लोगों की हत्याओं के बाद यहां अफवाह यह है कि अगर किसी का बाहर का किरायेदार मारा गया तो उसको मारे गए व्यक्ति के परिवार को 18 लाख रुपये देने पड़ेंगे.

“इस अफवाह से वो लोग भी सहम गए हैं जो अब वापिस बाहर वालों को किरायेदार बनाने का मन बना रहे थे,” एक पुलिस अधिकारी सत्याग्रह को बताते हैं.

अब ऐसे अभूतपूर्व डर और अनिश्चिता के माहौल में कौन ऐसा होगा जो अपना घर-बार छोड़कर कश्मीर में रहना चाहेगा. तो धीरे-धीरे वापिस आये ज्यादातर लोग अपने-अपने घरों को लौट रहे हैं.

उधर पुलिस और प्रशासन भी परेशान है. सेब के व्यापारी और ट्रक चालकों को तो पुलिस ने सुरक्षा बलों के कैंपों के नजदीक रहने की हिदायत दे दी थी, लेकिन आबादी में रहने वाले बाहर के लोग अभी भी असुरक्षित हैं.

“कई दिन तक पुलिस ने कश्मीर आने वाले बाहर के लोगों को रास्ते में ही रोक लिया था और उनमें से काफी सारे वापिस अपने घर लौट गए थे. लेकिन यह कोई समाधान नहीं है और मसला यह भी है कि इतने सारे लोगों को सुरक्षा कैसे दी जाये,” एक आला पुलिस सूत्र कहते हैं.

ऐसे में बस उम्मीद की सिर्फ एक किरण यह दिखाई देती है कि कश्मीर के स्थानीय लोग इस स्थिति से खुश नहीं हैं. शायद यह चीज़ आने वाले समय में बाहर के लोगों की जिंदगियां आसान कर दे. लेकिन फिलहाल तो चीज़ें खराब ही होती दिख रही हैं.