मैंने वंदना से पहले भी कहा था पर उसने हंसकर टाल दिया. जैसे मैं किसी नामुमकिन चीज़ का ज़िक्र कर रही होऊं. ‘मेरे चाचा और भाई ऐसा नहीं कर सकते, आख़िर वे उसके दोस्त रहे हैं,’ वह कहती थी. मेरे बार-बार यह कहने पर कि उसके चाचा और भाई वह सब सिर्फ़ इसलिए ही करेंगे कि वे उनके दोस्त रहे हैं और उन्हें लगातार लग रहा है कि उसने उनसे छल किया है, वह बोली थी, ‘नहीं स्नेहा, यह उनके वश की बात नहीं है, वे उस पर हमला नहीं कर सकते, इसलिए नहीं कि वे उसके दोस्त रहे हैं, इतना मैं भी जानती हूं बल्कि इसलिए कि वे दुस्साहसी नहीं, कायर हैं. डरे हुए लोग हैं.’

कितना भरोसा था, वंदना को, भले ही थोड़ा-सा पर अपने चाचा और भाई के डरे हुए होने का, कैसा विश्वास उनके दुस्साहसी न होने का. वह यह देखने से चूक गई कि कायरता ख़ुद को बचाए रखने कई बार दुस्साहसी भी हो उठती है. बहुत कुछ कर गुज़र सकती है. और फिर दोबारा अपने खोल में दुबक जाती है. वह यह देखने से चूक गई कि कोई भी मानवीय भावना विशुद्ध नहीं होती. मुझे हमेशा ऐसा लगा कि वह विशुद्ध हो ही नहीं सकती, शायद इसलिए कि मैं हमेशा ही हर भावना से थोड़ी दूरी पर ही रही. मुझे डर कभी विशुद्ध मालूम नहीं दिया, उसमें मुझे हमेशा निडरता और आश्चर्य घुले-मिले नज़र आते रहे. हिकारत की भावना के किसी कोने में लगाव की चमक दिखाई देती रही, घृणा के ऊपर धुंध की तरह आकर्षण की सतह तिरती हुई अनुभव होती रही.

मैंने वंदना को कितना कहा लेकिन उनकी कायरता पर उसे पूरा भरोसा था, शायद इसलिए कि वह हर भावना को अपने प्रेम की तरह ही मानती थी : विशुद्ध. कौन जाने यह सच भी हो. प्रेम ही शायद एकमात्र विशुद्ध भावना है इसलिए नहीं कि उसमें दूसरी भावनाएं होतीं नहीं. वे होती हैं बल्कि बाकी भावनाओं की तुलना में वे यहां कुछ ज्यादा ही बड़ी संख्या में होती हैं पर वे सब की सब प्रेम में प्रवेश करते ही अपने रंग को छोड़कर प्रेम के ही रंग में रंग जाती हैं. अब क्रोध, क्रोध नहीं रह जाता प्रेम का ही अंग हो जाता है, डर, डर नहीं, प्रेम का ही एक अंग हो जाता है. क्या इसीलिए प्रेम में डूबी वंदना को कायरता के किसी कोने में चुपचाप छुरा लिए खड़ा दुस्साहस दिखाई नहीं दिया?

मैं यह कह ज़रूर रही हूं कि उसे दिखाई नहीं दिया पर सच ये है कि उसने उसे देखने की कोशिश नहीं की. यही उसे माकूल जान पड़ा. वह दिन-ब-दिन सिर्फ़ यही सोचती रही कि वह अगली शाम उससे मिलने कैसे जाएगी, वह अगली शाम उससे मिलने कहां जाएगी. कहीं वह मिलने की ठीक जगह और समय भूल तो नहीं गई? उसने सोचा तक नहीं कि किसी दिन कोई और दो शामों के बीच की रात में उससे मिलने की योजना बना सकता है. बिना उसके जाने, चुपचाप. इतने दिन बीत जाने पर भी आज तक यह पता नहीं चल सकता कि किसने रात के अंधियारे में उसकी उन सांसों की अंतिम रूप से गिन दिया था जिनके उतरने-चढ़ने में वंदना ने अपना विस्तार देखा था.

किसी को शक है कि यह काम उसके चाचा और भाई का है लेकिन कोई भरोसे से नहीं कह सकता. पर ऐसे मामलों में शक ही कुछ उजास कर जाता है. कोई कहता है यह काम उसकी बीवी का है पर यहां भी कोई भरोसे से नहीं कह सकता कि ऐसा ही है. मुझे यह एहसास था कि वह भी सुदीप्त से गहराई से जुड़ी थी. उसकी आंखों में सुदीप्त के लिए लगाव ही दिखाई देता था. सुदीप्त से उसका जुड़ाव वंदना से अलग ढंग का भले रहा हो, कम नहीं था. वह सुदीप्त के गहरे धर्मबोध से उत्पन्न हुआ था. कुछ का कहना था है कि यह काम वंदना के चाचा और उसके भाई ने उसकी बीवी के साथ मिलकर किया है. उसी ने देर रात चुपचाप दरवाजा खोलकर उन्हें घर के भीतर आने दिया था और वे दबे कदमों भीतर आकर वह कर गए जो करने की इच्छा उन्हें न जाने कितने दिनों से थी.

लेकिन इन किन्हीं भी किस्सों पर किसी को भी पूरा भरोसा नहीं है. इसलिए भी नहीं कि यह सब को पता है कि उस रात उसके चाचा और भाई शहर में नहीं थे, वे अपनी दुकान के लिए कुछ सामान खरीदने जम्मू गए हुए थे और उसकी बीवी ने भी वह रात अपनी बीमारी के कारण अस्पताल में गुज़ारी थी. लेकिन लोगों का यह कहना भी है कि वे उसी रात जम्मू क्यों गए जिस रात उसकी बीवी अस्पताल में भरती हुई. या ऐसी रात ही मृदुला अस्पताल में भरती क्यों हुई जब वे दोनों शहर से बाहर गए हुए थे.

मैं जब इनमें से कोई भी क़िस्सा सुनती हूं, मेरा दिमाग उस पर विश्वास करने लगता है लेकिन जैसे ही वह अगले किस्से के सामने पड़ता है, उस पर विश्वास मानो इस नए किस्से की आंच में पिघल जाता है. एक किस्से से दूसरे पर लगातार भागती हुई मैं कहीं टिक नहीं पाती. कभी मैं उसके चाचा और भाई को छुरा लिए देखती हूं, कभी मृदुला को और बार-बार मैं ही उनके हाथों से इन छुरों गिरते हुए देखती हूं. कई बार मुझे इन सभी के हाथों में छुरा अटपटा लगता है, कई बार मुझे ही इनमें से हरेक के हाथ में ख़ून से रंगा छुरा बिल्कुल स्वाभाविक जान पड़ता है. मैं अपने शक को शतरंज के मोहरे की तरह उठाकर कभी किसी खाने पर रखती हूं, कभी किसी पर और कभी-कभी ये पाती हूं कि मेरा वह शक मेरे ही हाथों में अटका है और उसे रखने के लिए सामने कोई खाना खाली नहीं है. तब मैं चीखकर उस अच्छे-बुरे शक को पत्थर की तरह हवा में फेंककर हल्की हो जाती हूं.

यह सच है कि ईर्ष्या में डूबकर मृदुला यह कर सकती थी लेकिन यह भी सच है कि वह यह केवल तब कर सकती थी जब ईर्ष्या उसे इतना अंधा कर देती कि उसे कोई उपाय दिखाई नहीं देता. पर क्या वह सुदीप्त के अपने प्रति गहरे लगाव को जानती न होगी? उसके भाई और चाचा जैसे आत्म मुग्ध लोग अपनी बेटी या भतीजी की ख़ातिर अपनी ज़िंदगी जोखिम में नहीं डाल सकते. अपने आप से इतने प्रसन्न लोग किसी हालत में अपने को इस तरह के जोखिल में नहीं डाल सकते. अपने आप से इतने प्रसन्न लोग किसी हालत में अपने को इस तरह के जोखिम में कैसे डाल सकते थे? ये सब नहीं तब सुदीप्त का हत्यारा कौन हो सकता है? एक तरह से देखो तो इनमें से हरेक हो सकता है, एक और तरह से देखो तो इनमें से कोई भी नहीं.

मृत्यु वैसे भी रहस्य में लिपटी होती है. इस पर कई बार वह अपने इस रहस्य को कोई ऐसा आकार दे देती है कि वह लगातार गड़ता है. हम बार-बार पीड़ा में लिपटे उस रहस्य की ओर लौटते हैं और हर बार एक अजीब-सी चोट खाकर लौट आते हैं. मैं कई बार सोचती हूं जो भी हुआ हो, सुदीप्त तो चला गया, अब वंदना की सोचो, उसकी हालत देखो. लेकिन मैं जानती हूं कि वंदना सुदीप्त के इस तरह जाने से बिंधी है, वह सुदीप्त के कैसे भी जाने बेहाल हुई होती लेकिन तब सुदीप्त और उसकी मौत के बीच वह ईश्वर को ला सकती थी, पर उसके इस तरह जाने से सुदीप्त और उसकी मौत के बीच खड़ी कोई अनजान छाया उसे बार-बार नज़र आ रही है, ‘स्नेहा, ये कोई कैसे कर सकता है?’ यह रहस्य शायद उसके विरह में गहरे तक गड़ा कांटा है जिससे रह-रहकर यह टीस उठती है : ‘ये कोई कैसे कर सकता है?’