ब्रिटेन में अगले महीने चुनाव होने वाले हैं. विपक्षी लेबर पार्टी ने कहा है कि अगर वह सत्ता में आई, तो वहां की प्रमुख टेलिकॉम कंपनी ‘ब्रिटिश टेलिकॉम’ के निजीकरण को उल्टा करने का काम करेगी. पार्टी का कहना है कि 2030 तक पूरे ब्रिटेन में फाइबर आधारित ब्रॉडबैंड सेवा करने के लिए ब्रिटिश टेलिकॉम सबसे कारगर कंपनी है.

पाठकों को यह बताना ज़रूरी है कि एक समय पर ब्रिटिश टेलिकॉम सरकारी कंपनी थी, जिसका 90 के दशक में निजीकरण किया गया था. अब इस घटना के सापेक्ष, ज़बर्दस्त घाटे में चल रहीं हमारी दो सरकारी टेलिकॉम कंपनियों - बीएसएनएल और एमटीएनएल - के लिए 23 अक्टूबर को लाए गए रिवाइवल (राहत) पैकेज को समझा जा सकता है. बताया जाता है कि वित्त मंत्रालय की मंज़ूरी के बिना ही इसे स्वीकृति दी गई है.

अपुष्ट सूत्र बताते हैं कि 22 अक्टूबर, 2019 की शाम को दूरसंचार विभाग (डीओटी) के आला अधिकारियों को प्रधानमंत्री कार्यालय से आदेश आया कि बीएसएनएल और एमटीएनएल के लिए रिवाइवल पैकेज का प्लान तुरंत बनाकर उसे भेजा जाए. अधिकारियों ने कहा कि ऐसा प्लान कई महीने पहले ही वित्त मंत्रालय के पास भेजा गया था जिसे उसने खारिज (रिजेक्ट) कर दिया था. डीओटी के अधिकारियों को कहा गया कि वित्त मंत्रालय का मसला बाद में, फ़िलहाल प्रधानमंत्री कार्यालय में प्लान भेजें और आज (22 अक्टूबर की रात को) ही भेजें.

अगले दिन, 23 अक्टूबर को दोनों सरकारी कंपनियों के लिए नए पैकेज की घोषणा कर दी गई. इसमें, बीएसएनएल में एमटीएनएल के विलय और उनके कर्मचारियों के लिए वीआरएस के प्रावधान थे.

आख़िर ऐसा क्या हुआ कि इस मामले में वित्त मंत्रालय की राय दरकिनार कर दी गई? प्रधानमंत्री मोदी त्वरित निर्णय लेने के लिए जाने जाते हैं. लेकिन इतनी तेजी तो उनके हिसाब से भी कुछ ज्यादा ही लगती है.

कहा जा रहा है कि मोदी सरकार के इस फैसले में गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल की भी भूमिका रही. और उसके पीछे कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने के बाद उपजे हालात हैं. सरकार को लगता है कि विशिष्ट परिस्थितियों में निजी संचार माध्यमों पर भरोसा नहीं किया जा सकता. लिहाज़ा, आनन-फ़ानन में उसने यह क़दम उठाया.

सरकारी कंपनियों को दिए गए इस पैकेज का राजनीतिक कारण भी समझ में आता है. कुछ लोगों का कहना है कि एक निजी कंपनी को ज़रूरत से ज़्यादा फ़ायदा मिलने की वजह से आज पूरा टेलिकॉम सेक्टर संकट से गुज़र रहा है. देश की तीन सबसे बड़ी कंपनियों में से दो, यानी वोडाफ़ोन-आईडिया और भारती एयरटेल, इस वक्त ज़बरदस्त घाटे में चल रही हैं. इससे उबरने के लिए हाल ही में उन्होंने अपनी कॉल और डाटा की दरों को बढ़ाने की घोषणा की है. कुछ कंपनियों पर पहले ही ताले लग चुके हैं, कई लाख नौकरियां स्वाह हो गई हैं. बैंकिंग सेक्टर पर भी इस सबका बुरा असर पड़ा है और निवेशकों को भी ख़ासा नुकसान हुआ है.

बीएसएनएल और एमटीएनएल भी इससे अछूती नहीं थीं. 20 नवम्बर, 2019 को संसद में दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने जानकारी दी थी कि चालू वित्त वर्ष के सितम्बर माह तक बीएसएनएल और एमटीएनएल को 7506 और 2003 करोड़ रुपये का घाटा हो चुका है. इनके कर्मचारियों की तनख्वाह समय पर न मिलना सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर चर्चा का विषय बन रहा था.

ज़ाहिर है, सरकार की किरकिरी हो रही थी. माहौल बनता जा रहा था कि अगर सरकारी कर्मचारियों को समय पर वेतन और भुगतान नहीं मिल रहा है तो फिर देश के आर्थिक हालात ठीक नहीं हैं. लोगों का विश्वास डगमगा रहा था. पहले ही मंदी की वजह से मुश्किल में घिरी सरकार की चौतरफ़ा निंदा हो रही थी. कुछ जानकारों का मानना है कि इस वजह से भी सरकार ने यह कदम उठाया है.

आपको यह भी बताना ज़रूरी है कि सरकार से ‘तथाकथित’ फ़ायदा उठाने वाली टेलिकॉम कंपनी ने कुछ महीने पहले थर्ड पार्टी रोल के करीब पांच हजार कर्मचारियों को एक साथ नौकरी से निकाल दिया था. बाद में जब हो-हल्ला मचा, तो उन्हें दुबारा रख लिया गया. अफवाह यह उड़ी कि किसी राजनीतिक दवाब में कंपनी ने अपना फ़ैसला पलटा था.

अगर फिर से बीएसएनएल और एमटीएनएल पर लौटें तो जानकार मान रहे हैं कि दोनों कंपनियों का विलय और वीआरएस इस बात का इशारा है कि साल-दो साल बाद इस संयुक्त इकाई को निजी हाथों में बेच दिया जाएगा. सरकार हरचंद कोशिश करेगी कि विलय के बाद वाली बीएसएनएल छोटी, चुस्त और मुनाफ़ेदार हो ताकि इसके अच्छे दाम मिल सकें. किसी भी निजी संस्था के लिए दो अलग-अलग इकाइयां, जहां औसत कर्मचारी उम्र 54 साल है, ख़रीदना ज़रा मुश्किल काम है. विलय और वीआरएस इन दोनों बातों से निजात दिलाएगा. पर निजीकरण अलग चर्चा का विषय है. फ़िलहाल यह समझने की ज़रूरत है कि क्यों दूरसंचार की सरकारी कंपनियों का टिके रहना देशहित में है?

एकाधिकार से सुरक्षा

आज से कुछ साल पहले, टेलिकॉम के हर सर्किल में तकरीबन 9-10 प्लेयर्स थे. सितम्बर 2016, यानी रिलायंस जिओ के शुरू होने के बाद हालात बिलकुल बदल गए. टेलिकॉम सेक्टर में अभूतपूर्व कंसोलिडेशन हुआ. आज हर सर्किल में सिर्फ़ तीन निजी और एक सरकारी मोबाइल ऑपरेटर ही हैं - वोडाफ़ोन-आईडिया, एयरटेल, रिलायंस जिओ और बीएसएनएल/एमटीएनएल.

ऐसे हालात में अगर सरकारी कंपनी बंद हो जाती है या निजी हाथों में चली जाती है तो इस क्षेत्र में एकाधिकार की आशंकाएं पैदा हो जाएंगी. टेलिकॉम सेक्टर बहुत कैपिटल इंटेंसिव इंडस्ट्री है. इसमें नए ऑपरेटरों का आना कोई आसान बात नहीं है. बहुत संभव है कि मौजूदा तीन मोबाइल ऑपरेटर्स में से ही कोई एक इसे ख़रीद ले.

तकरीबन तीन साल तक अपने दाम न बढ़ाने के बाद, बाकी टेलिकॉम कंपनियों के साथ-साथ रिलायंस जिओ ने भी अपनी कीमतें बढ़ा दी हैं. करीब दो महीने, पहले रिलायंस जिओ ने अपनी आउटगोइंग कॉल की घंटी की अवधि भी 30 सेकंड से घटाकर 20-25 सेकंड्स कर दी थी. अन्य कंपनियों ने इसे टेलिकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) के नियमों के साथ छेड़छाड़ बताया. इतने कम समय घंटी बजने से इस बात की ज्यादा संभावना होती है कि जिसे कॉल की गई है वह उसे उठा ही न पाये. ऐसे में वह वापस फोन कर सकता है. चूंकि हर ऑपरेटर को अपने नेटवर्क से किसी दूसरे ऑपरेटर के नेटवर्क पर की गई कॉल पर पैसा (इंटरकनेक्ट यूसेज चार्जेज) देना होता है. इसलिए जियो ने अपना नुकसान बचाने और ज्यादा आर्थिक लाभ कमाने के लिए ऐसा किया था. सरकारी कंपनी के बाज़ार में टिके रहने से निजी कंपनियां ऐसा ऐसा करने से पहले चार बार सोचेंगी.

डिजिटल इंडिया के प्रोग्राम को झटका

जब हमने बीएसएनएल के एक उच्च अधिकारी से बात की तो उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ग्रामीण भारत के कई हिस्सों में सेवाएं देना घाटे का सौदा है. वे बताते हैं कि उनके अधिकार क्षेत्र में 193 एक्सचेंज ऐसे हैं जिनमें से 140 से ज़्यादा तो बिजली का बिल चुकाने जितनी राशि भी नहीं जुटा पाते. शहरी एक्सचेंजों की कमाई से कुछ हद तक वे इस घाटे को कम करते हैं. वे कहते हैं कि निजी ऑपरेटर्स इतनी दरियादिली नहीं दिखायेंगे. इंग्लैंड में इसीलिए ब्रिटिश टेलिकॉम के सरकारीकरण की बात की जा रही है. बीएसएनएल का बने रहना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि आज भी देश में 40 करोड़ ग्राहक ऐसे हैं जो 2-जी सेवाओं का ही इस्तेमाल करते हैं. बीएसएनएल की स्थापना में निहित सामाजिक सरोकार उन ग्राहकों को इंटरनेट की सुविधाओं से जोड़ सकता है.

और इसके लिए धन की समस्या नहीं है. यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फंड (यूएसओएफ़) के तहत डीओटी के पास लगभग 55,000 करोड़ रूपये पड़े हैं जो उसे बीएसएनएल को ग्रामीण इलाकों में संचार सेवा के विस्तार के लिए देने थे. इसी प्रकार एक और टैक्स था जो निजी ऑपरेटर से लेकर बीएसएनएल तक सभी को देना था. इसका नाम था एक्सेस डेफिसिट चार्ज(एडीसी). कुछ साल पहले यह बंद कर दिया. तब नृपेंद्र मिश्रा ट्राई के चेयरमैन थे. उन्होंने बाक़ायदा घोषणा की थी कि एडीसी बंद करने की सूरत में बीएसएनएल को यूएसओएफ़ की राशि दी जायेगी. पर आज तक ऐसा नहीं हुआ. अगर यह धन बीएसएनएल को मिल जाए तो वह आसानी से वह कर सकती है जिसके लिए बनी थी. और तब बाकी कंपनिया भी अपनी हदों में ही रहेंगी.

रोज़गार की संभावनाएं

बीएसएनएल के अधिकारी बताते हैं कि पिछले कई सालों से भारत संचार निगम लिमिटेड में जूनियर टेलिकॉम ऑफिसरों की भर्तियां नहीं हुई हैं. इसकी वजह से निगम में काम करने वाले कर्मचारियों की औसत उम्र 54 हो गई. यानी कंपनी में नये टैलेंट का अभाव है. वे आगे कहते हैं कि वीआरएस के ज़रिये सरकार तकरीबन एक लाख कर्मचारियों को विदा करेगी. उनकी जगह कम तनख्वाह पर नयी भर्तियां की जा सकती हैं जिससे निगम पर अधिक वित्तीय भार नहीं पड़ेगा. वे उदाहरण देकर समझाते हैं कि फिलहाल टेलीफोन ऑपरेटर का औसत वेतन 60,000 रुपये है. इसकी जगह 20,000-30,000 के वेतन वाले जवान ऑपरेटर ख़ुशी-ख़ुशी काम कर लेगें. आपको याद दिला दें कि सैम पित्रोदा की कमेटी ने भी 2010 में ऐसा ही सुझाव दिया था.