हैदराबाद में एक महिला डॉक्टर के साथ 28 नवंबर को सामूहिक बलात्कार और उसकी हत्या की घृणित घटना को, निर्भया कांड के बाद संसद से लेकर सड़क तक, एक बार फिर ऐसा रंग दिया जा रहा है, मानो भारत ‘पृथ्वी’ पर नहीं, किसी दूसरे ग्रह पर बसा हुआ है! मानो ऐसे कुकृत्य केवल भारत में ही और इसलिए होते हैं क्योंकि यहां की सरकारें महिलाओं को सुरक्षा देने के मामले में बिलकुल निकम्मी हैं.

चीन में माओ से-तुंग के समाजवादी शासनकाल की जन-अदालतों में जिस तरह ‘जनता’ कहलाने वाली भीड़ किसी को भी ‘प्रतिक्रांतिकारी’ ठहराकर मॉब लिंचिंग कर दिया करती थी, उसी तरह भारत की समाजवादी पार्टी की सांसद जया बच्चन भी ‘दोषियों’ को जनता के हवाले कर देना चाहती हैं, ताकि जैसा उन्होंने कहा जनता-रूपी क्रुद्ध भीड़ सरेआम उनकी ‘मॉब लिंचिंग’ कर सके! गाय चुराने वालों की यदि ‘मॉब लिंचिंग’ हो सकती है, तो बलात्कारियों की भी क्यों नहीं!

हर जगह और हर समय पूर्ण सुरक्षा संभव नहीं

तरस आता है ऐसे सांसदों की सदबुद्धि पर. महिलाओं का मान-सम्मान करने वाले भारत के सच्चे-झूठे सांसदों और सामान्यजनों को भी इस सुखभ्रांति से विदा ले लेने की ज़रूरत है कि आज की दुनिया में कोई भी सरकार, महिलाओं तो क्या, नेताओं को भी हर समय और हर जगह पूर्ण सुरक्षा प्रदान कर सकती है. दूर क्यों जायें. क्या इंदिरा गांधी को उन्हीं के अतिविश्वस्त अंगरक्षकों ने ही नहीं मार डाला! दुनिया का हर देश उदाहरण है कि सरकारें सिर्फ एक हद तक कानून के शासन का डर बनाकर ही रख सकती हैं. वे हर जगह, हर समय आपको बचाने का काम नहीं कर सकतीं.

भारत में हैदराबाद वाली घटना से तीन दिन पहले, सोमवार 25 नवंबर की शाम, यूरोपीय देशों के अनगिनत शहरों की अनगिनत इमारतें नारंगी रंग के प्रकाश में नहाये हुए थीं. नारंगी रंग कुछ समय से ‘’महिलाओं के साथ हिंसा के उन्मूलन हेतु अंतरराष्ट्रीय दिवस’’ की पहचान बन गया है. इसे संयुक्त राष्ट्र के 1999 के एक निर्णय के आधार पर हर वर्ष 25 नवंबर को मनाया जाता है. अकेले जर्मनी में ही इस दिन 100 से अधिक शहरों की अनेक इमारतों का रंग शाम होते ही नारंगी हो गया. यह दिन हर वर्ष आठ मार्च को मनाये जाने वाले उस ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ से अलग है, जो 1921 से मनाया जाता है और जिसे संयुक्त राष्ट्र ने भी 1975 में अपना लिया.

आठ मार्च वाले महिला दिवस की परिपाटी यूरोप के साम्यवादी-समाजवादी संगठनों ने, प्रथम विश्वयुद्ध से कुछ पहले, 1911 में शुरू की थी. तब उसे 19 मार्च के दिन मनाया जाता था. उद्देश्य था नारी-मुक्ति, नारी-समानता और चुनावों में महिलाओं के लिए भी मताधिकार को साकार करना. 1921 से उसे हर वर्ष आठ मार्च को मनाया जाने लगा. 25 नवंबर को मनाये जाने वाले अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के पीछे एक दूसरी ही कहानी है.

25 नवंबर वाले महिला दिवस की कहानी

अमेरिका के पास के कैरीबियन सागर में बसे देश डोमिनिकन रिपब्लिक में 1960 में एक बड़ी ही वीभत्स घटना हुई. वहां के तानाशाह राफ़ाएल त्रुख़ियो के विरुद्ध एक विद्रोह के विफल हो जाने के बाद सेना व्यापक गिफ्तारियां कर रही थी. इस दौरान मीराबाल नाम के एक परिवार की तीन बहनों के पतियों को भी जेल में ठूंस दिया गया. 25 नवंबर 1960 के दिन पत्रिया, मिनर्वा और मरिया-तेरेसा नाम की तीनों बहनें अपने पतियों को देखने जेल गयी थीं. बाद में जब वे घर लौट रही थीं, तब तानाशाह त्रुख़ियो के गुर्गों ने एक पहाड़ी रास्ते में उनकी कार पर हमला बोल दिया. इन दुष्टों ने गला दबाकर दम घोंटते हुए कार के चालक सहित तीनों बहनों को भी मार डाला. इस हत्याकांड की सच्चाई को छिपाने के लिए उसे एक कार-दुर्घटना बताया गया. पर, ढोल की पोल अंततः खुल ही गयी.

21 वर्ष बाद 1981 में, लैटिन (दक्षिण) अमेरिकी और कैरीबियाई सागर वाले देशों की महिलाओं के एक सम्मेलन में इस घटना को याद करते हुए तय हुआ कि 25 नवंबर के दिन को अब हर साल, हिंसा का शिकार हुई महिलाओं के अंतरराष्ट्रीय स्मृतिदिवस के रूप में मनाया जायेगा. 1999 में संयुक्त राष्ट्र ने भी इस दिन को अपना लिया और उसे महिलाओं के साथ हर प्रकार की हिंसा के उन्मूलन-दिवस के तौर मनाने का आग्रह किया.

इस्तांबूल कन्वेंशन

महिलाओं के साथ हिंसा के उन्मूलन की दिशा में अगला बड़ा क़दम था यूरोपीय परिषद (काउन्सिल ऑफ़ यूरोप) के 13 सदस्य देशों द्वारा तुर्की के इस्तांबूल शहर में 11 मई 2011 को किया गया एक समझौता. इसे ‘इस्तांबूल कन्वेशन’ कहा जाता है. इस समझौते में महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा के विभिन्न रूपों की व्याख्या की गई है और वे मानदंड तथा नियम-क़ानून तय किये गये हैं, जिनका हस्ताक्षरकर्ता देशों को पालन करना होगा. सितंबर 2018 तक इस समझौते पर यूरोप के 46 देशों ने हस्ताक्षर कर दिये थे. तब तक 33 देशों ने उसकी विधिवत पुष्टि भी कर दी थी. ब्रिटेन, चेक गणराज्य, स्लोवाकिया, हंगरी, यूक्रेन, मोल्दाविया, बुल्गारिया और आर्मेनिया वे प्रमुख देश हैं, जिन्होंने इस्तांबूल समझौते की पुष्टि नहीं की है.

‘इस्तांबूल कन्वेशन’ ऐसा पहला अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जो यौन-दुराचार सहित महिलाओं के साथ हर प्रकार की शारीरिक एवं मानसिक हिंसा को दंडनीय अपराध मानता है. साथ ही हस्ताक्षरकर्ता देशों से अपने यहां ऐसे अपराधों की रोकथाम करने, अपराधियों को दंडित करने और पीड़ित महिलाओं की सहायता करने की मांग भी करता है. तब भी यह सोचना ख़याली पुलाव पकाना ही कहलायेगा कि यूरोप के जिन देशों ने ‘इस्तांबूल कन्वेशन’ पर हस्ताक्षर किये हैं या उसकी पुष्टि करते हुए उसे अपना राष्ट्रीय क़ानून भी बना दिया है, वहां महिलाओं के साथ हिंसा अब नहीं हो रही है या घट गयी है.

महिलाएं हज़ारों की संख्या में सड़कों पर उतरीं

यदि ऐसा होता तो यूरोप के लगभग हर बड़े शहर में, 25 नवंबर के दिन, महिलाएं हज़ारों की संख्या में सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन नहीं करतीं. वे यह नहीं कहतीं कि उन्हें अब भी समाज में वह मान-सम्मान, वह सुरक्षा नहीं मिल रही है, जिसका उनसे बार-बार वादा किया जाता है. उस दिन फ्रांस और जर्मनी में इस प्रकार के सबसे बड़े प्रदर्शन देखने में आये.

पेरिस में प्रदर्शन कर रही महिलाओं ने अपनी मांगों के नारों वाली बैंगनी रंग की पट्टियां पहन रखी थीं या तख्तियां और पोस्टर लेकर चल रही थीं. फ्रांस के मीडिया में इन प्रदर्शनों की काफ़ी चर्चा रही. वहां की मुख्य समाचार एजेंसी ‘एएफपी’ ने लिखा कि 25 नवंबर को इन प्रदर्शनों के होने तक 2019 में फ्रांस में ऐसी कम से कम 116 महिलाओं की हत्या हो चुकी है, जिन्हें उनके वर्तमान पति या पिछले जीवनसाथी ने मार डाला.

पेरिस में प्रदर्शन करने वाली महिलाओं की प्रवक्ताओं का कहना था कि यह संख्या 116 नहीं, कम से कम 137 है. एक वर्ष पूर्व 2018 में यह संख्या 121 थी. स्मरणीय है कि फ्रांस की जनसंख्या केवल छह करोड़ 70 लाख है, जो भारत की जनसंख्या के करीब 20वें हिस्से के बराबर है. दूसरे शब्दों में, पतियों या पिछले जीवनसाथियों द्वारा महिलाओं की हत्या के मामले में भारत को यदि फ्रांस की बराबरी करनी हो, तो यहां ढाई हजार से ज्यादा महिलाओं की हत्या हुई होनी चाहिये!

महिलाओं के साथ हिंसा सर्वव्यापी है

फ्रांस के पड़ोसी और उससे कहीं अधिक धनी-मानी जर्मनी की महिलाओं का भी यही हाल है. महिलाओं के साथ हिंसा के उन्मूलन का इस्तांबूल समझौता जर्मनी में फ़रवरी 2018 से आधिकारिक क़ानून बन गया है. किंतु इससे वास्तविक स्थिति में कोई परिवर्तन आया दिखता नहीं है. चाहे मूल जर्मन जनता हो या विदेशों से आकर बस गये आप्रवासी, चाहे साधनसंपन्न और अच्छी शिक्षा प्राप्त उच्च एवं मध्यवर्ग हो या साधनहीन निम्नवर्ग, लड़कियों और महिलाओं के साथ हिंसा की प्रवृत्ति सभी वर्गों, तबकों और राष्ट्रीयताओं में न केवल एक जैसी है, बल्कि लगातार बढ़ती ही जा रही है.

25 नवंबर के अपने एक भाषण में जर्मनी की परिवार कल्याण मंत्री फ्रांत्सिस्का गिफ़ाइ को भी स्वीकार करना पड़ा कि जर्मनी में भी “हर तीसरी महिला घरेलू हिंसा से या तो पीड़ित है या पीड़ित रही है.” आंकड़े बताते बैं कि करीब सवा आठ करोड़ की जनसंख्या वाले जर्मनी में हर सप्ताह औसतन तीन महिलाएं अपने वर्तमान या पिछले जीवनसाथी की हिंसा के कारण दम तोड़ बैठती हैं. कम से कम इतनी ही मौतें बलात्कारियों के हाथों से भी होती हैं.

1917 में जर्मन पुलिस ने महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा के कुल 1,09,000 मामले दर्ज किये. इन घटनाओं में 147 महिलाओं की हत्या की गई या मृत्यु हो गयी थी. एक साल पहले के, यानी 2016 के आंकड़े बताते हैं कि हत्या करने, पीट-पीटकर मार डालने या बलात्कार के बाद मार डालने के कुल 1036 प्रयासों में यहां 435 महिलाओं की मृत्यु हो गयी. इस दौरान 11 हज़ार से कुछ अधिक मामले ऐसे भी थे, जिनमें महिलाओं के पतियों या जीवनसाथियों ने उन्हें ख़तरनाक़ ढंग से घायल कर दिया.

जर्मनी में भी महिलाओं के साथ हिंसा, अत्याचार या बलात्कार के सारे मामले पुलिस तक नहीं पहुंचते. इनमें से कई घटनाओं को मीडिया में भी शायद ही कभी जगह मिलती है. जनता को तो इनके बारे में पता तक नहीं चलता. भारत की तरह जन-प्रदर्शनों को तो भूल ही जायें. इसके अलावा इस्तांबूल समझौते के अनुसार, हर देश में प्रति 10 हज़ार निवासियों पर एक ऐसी शरणस्थली होनी चाहिये, जहां हिंसा-पीड़ित महिलाएं कुछ समय के लिए शरण पा सकें. जर्मनी में इस नियम के पालन का अर्थ होगा इतने नारी-निकेतन, कि वहां कम से कम 21,400 महिलाओं के रहने-सोने की व्यवस्था हमेशा उपलब्ध रहे. इस समय देश के लगभग 350 नारी-निकेतनों में उपलब्ध हैं केवल 6,800 बिस्तर.

यूरोप में इटली, जर्मनी और ब्रिटेन वे देश हैं, जहां महिलाओं की सबसे अधिक हत्याएं दर्ज होती हैं. लेकिन यदि इस आंकड़े को जनसंख्या के अनुपात में देखें तो यूरोप के छोटे देशों मोन्टेनेग्रो, लातविया, लिथुआनिया, चेक गणराज्य, हंगरी, बोस्निया और क्रोएशिया में महिलाओं को मार डालने की घटनाओं का आंकड़ा इन तीन देशों से अधिक है. यानी कि लोगों को यह भ्रम ही है कि महिलाओं के साथ अत्याचार-बलात्कार भारत में ही होते हैं, यूरोप और जर्मनी में शायद ही कभी. लेकिन यूरोप में कोई ऐसा देश नहीं है, जहां महिलाओं के साथ जानलेवा हिंसा नहीं होती.

यूरोपीय संघ का अखिल यूरोपीय सर्वेक्षण

इस्तांबूल समझौते में महिलाओं-लड़कियों को मारने-पीटने तथा उनकी हत्या के साथ-साथ उनके साथ यौनदुराचार, बलात्कार एवं मानसिक प्रताड़ना को भी दंडनीय आपराधिक हिंसा की श्रेणी में रखा गया है. यूरोपीय संघ के 28 सदस्य देशों में महिलाओं की असली स्थिति जानने के लिए यूरोपीय संघ ने कुछ वर्ष पूर्व एक व्यापक सर्वेक्षण करवाया था. इसके परिणाम 2014 में प्रकाशित किये गये. सर्वेक्षण में हर सदस्य देश की औसतन डेढ़ हज़ार महिलाओं से यानी कुल मिलाकर 42 हज़ार महिलाओं से विभिन्न प्रकार के प्रश्न पूछे गये. महिलाओं के उत्तरों से मिले सबसे चौंकाने वाले कुछ परिणाम इस प्रकार रहेः

* 42 हजार में से हर तीसरी महिला ने बताया कि उसे अपने 15वें जन्मदिन के बाद कम से कम एक बार शारीरिक या यौन-हिंसा या दोनों झेलनी पड़ी हैं.

* हर 20वीं महिला को कम से कम एक बार बलात्कार की वेदना सहनी पड़ी.

* इसमें से 22 प्रतिशत को अपने जीवनसंगी की ओर से शारीरिक या बलात्कारी हिंसा झेलनी पड़ी और 43 प्रतिशत को मानसिक यातना से गुज़रना पड़ा. दोनों प्रकार की 67 प्रतिशत पीड़िताओं ने पुलिस से कभी शिकायत नहीं की.

* 33 प्रतिशत को अपने बचपन में ही किसी वयस्क की ओर से शारीरिक प्रताड़ना या लैंगिक हिंसा का कटु अनुभव मिला.

* 11 प्रतिशत को भद्दे ईमेल और एसएमएस भेज कर मानसिक रूप से तंग किया गया.

* अपने पति या संगी से भिन्न दूसरे लोगों द्वारा यौन-हिंसा झेल चुकी हर दसवीं महिला ने कहा कि उसे अपरिचित लोगों ने सामूहिक बलात्कार या शीलभंग का शिकार बनाया.

देश जितना खुशहाल, महिलाएं उतनी ही बदहाल

यूरोपीय संघ की ‘मौलिक अधिकार एजेंसी’ द्वारा करवाये गये इस सर्वेक्षण से और भी चौंकाने वाला यह तथ्य सामने आया कि जिस देश का समाज जितना अधिक खुशहाल, उदारवादी और सुशिक्षित है, वहां महिला-उत्पीड़न का अनुपात भी उतना ही अधिक है!

यूरोपीय संघ के देशों में स्वीडन. डेनमार्क, नीदरलैंड (हॉलैंड) और फ़िनलैंड इन तीनों कसौटियों के अलावा भ्रष्टाचार-मुक्त सुशासन में भी सबसे अग्रणी माने जाते हैं. भारत में लोग कहेंगे कि यही तो ‘रामराज’ है! लेकिन, सच्चाई यह है कि इन देशों की 70 प्रतिशत से अधिक महिलाओं ने इस सर्वे में कहा कि 15 साल की उम्र के बाद कभी न कभी हिंसा और यौन-उत्पीड़न से उनका सामना हो ही गया.

यूरोपीय संघ का सबसे उदार और ‘रामराज’ जैसा सबसे कल्याणकारी देश कहलाने वाला स्वीडन, महिलाओं के साथ हिंसा की 81 प्रतिशत शिकायतों के साथ इस मामले में पहले नंबर पर रहा. उसके बाद के स्थानों पर 70 प्रतिशत से अधिक शिकायतों के साथ क्रमशः डेनमार्क, फ्रांस, नीदरलैंड और फ़िनलैंड रहे. दूसरी ओर, यूरोप के सबसे ग़रीब, भ्रष्ट और कुशासित देशों में गिने जाने वाले बुल्गारिया को मात्र 24 प्रतिशत शिकायतों के साथ, महिलाओं के उत्पीड़न के मामले में सबसे अंतिम स्थान मिला.

सबसे भ्रष्ट बुल्गारिया में सबसे कम हिंसा

यानी, सबसे भ्रष्ट और टुटपुंजिया बुल्गारिया में महिलाओं के साथ सबसे कम हिंसा होती है! जो भारतीय और विदेशी हल्ला मचाते हैं कि भारत में ग़रीबी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, धार्मिक रूढ़ियों और कुशासन के कारण महिलाओं की सुरक्षा अत्यंत शोचनीय है, उन्हें पता नहीं है कि ‘सात समुंदर पार’ के यूरोप या पश्चिमी जगत के लकदक करते चमकीले मुखौटों के पीछे का असली चेहरा कैसा है.

यह एक अविश्वसनीय विरोधाभास है, पर यूरोपीय घरों में यही हो रहा है! ऊंचा जीवनस्तर बनाये रखने की आत्ममुग्ध आपाधापी, आत्मसुख पर केंद्रित बीमार मानसिकता, मीडिया से लेकर सिनेमा, कला और साहित्य तक में व्याप्त चौमुखी कामुकता इनका एवं ऐसे ही कुछ और कारकों का सम्मिलित परिणाम है कि पश्चिमी मानव संवेदनाशून्य होता जा रहा है. परपीड़ा से सुख पाता है. यहां तक कि सड़क पर किसी दुर्घटना के समय सहाता देने के बदले लोग उग्र तमाशबीन बन जाते हैं. स्मार्टफोन से घायलों की तस्वीरें लेने की धुन में पुलिस या एम्बुलेंस वालों से हाथापायी तक करते हैं. दुर्घटना पीड़ितों में यदि महिलाएं भी हुयीं, तब तो कहना ही क्या!

अपने ही लोग महिलाओं के सबसे बड़े दुश्मन

जो कुछ आज यूरोप-अमेरिका में हो रहा है, वही कल-परसों भारत जैसे पूर्वी दुनिया के देशों में भी होता है. ‘यूरोपीय सुरक्षा और सहयोग संगठन’ (ऑर्गनाइज़ेशन फॉर सिक्यूरिटी एन्ड कोऑपरेशन इन यूरोप) ने 25 नवंबर 12016 को महिलाओं के साथ हिंसा के वैश्विक परिदृश्य का एक विश्लेषण प्रकाशित किया. ‘’महिलाओं के साथ हिंसा के विरुद्ध लड़ाई’’ (कॉम्बैटिंग वॉयलंस अगेन्स्ट विमेन) नाम के इस विश्लेषण में कहा गया है कि 2012 में दुनिया भर में 46,600 महिलाओं एंव युवा लड़कियों को उनके अपने ही पति, वर्तमान या पुराने प्रेमी या अपने ही परिवार के ही किसी सदस्य ने मार डाला. एक-तिहाई महिलाओं ने कहा कि उन्हें कम से कम एक बार शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार बनना पड़ा. केवल 11 प्रतिशत महिलाओं ने पुलिस के पास शिकायत करने की हिम्मत जुटाई.

2012 तक रूस, सान सल्वादोर और दक्षिण अफ्रीका में प्रति एक लाख महिलाओं में से छह की मौत शारीरिक या यौनहिंसा से हुआ करती थी. मध्य अमेरिकी देश होंड्यूरास में यह अनुपात प्रति एक लाख पर 15 मौतें था. पश्चिमी यूरोप के ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस इत्यादि देशों की महिलाओं के बीच इस प्रकार की मौतों का मिलाजुला औसत प्रति एक लाख महिलाओं पर 0.4 था, जो इस बीच निश्चित रूप से बढ़ गया होना चाहिये.

यूरोपीय संघ का सांख्यिकी कार्यालय ‘यूरोस्टाट’ भी समय-समय पर ऐसे आंकड़े प्रकाशित करता है. पर उसके बारे में शिकायत सुनने में आयी है कि महिलाओं की जान-बूझकर की गयी हत्याओं के डेनमार्क, ग्रीस (यूनान), लक्सेमबुर्ग, लातविया, माल्टा और पोलैंड की पुलिस के आंकड़े उतने विश्वसनीय नहीं होते, जितने उदाहरण के लिए ब्रिटेन या फ्रांस के होते हैं. दूसरे शब्दों में, यूरोपीय देशों की पुलिस और सरकारें बदनामी से बचने के लिए आंकड़ों में हेरफेर के द्वारा सच्चाइयों को छिपाने की कोशिशें भी करती हैं.

जर्मनी में सौ में से केवल एक बलात्कारी को सज़ा

जर्मनी के एक जाने-माने अपराधशास्त्री क्रिस्टियान प्फांइफ़र ने जर्मनी में 2014 से 2016 के बीच हुए बलात्कारों और पुलिस को मिली शिकाय़तों के आधार पर हाल ही में प्रकाशित अपनी पुस्तक में लिखा है, ‘’बलात्कार की शिकार हुई सौ महिलाओं में से केवल एक के बलात्कारी को ही सज़ा मिलती है. इसका मुख्य कारण यह है कि 85 प्रतिशत महिलाएं पुलिस के पास शिकायत दर्ज करवातीं ही नहीं. जो 15 प्रतिशत दर्ज करवाती हैं, उनके आधार पर केवल 7.5 प्रतिशत दोषियों को ही कोई सज़ा मिलती है.’’ एक सच्चाई यह भी है कि बलात्कारियों के लिए जैसी कठोर सज़ाओं का प्रावधान भारत में है, वैसा यूरोप के देशों में कहीं नहीं है.

मानवाधिकार संस्था एम्नेस्टी इंटरनैशनल ने यूरोप के 31 देशों में छानबीन करने पर पाया कि उनमें से केवल आठ में ऐसे का़नून हैं, जो सेक्स के लिए सहमति के स्वरूप की व्याख्या करते हैं. जर्मनी, आयरलैंड, ब्रिटेन, बेल्जियम, साइप्रस, आइसलैंड, लक्सेम्बुर्ग और स्वीडन में सेक्स तब बलात्कार कहलाता है, जब किसी एक के ‘नहीं’ कहने पर भी शारीरिक संबंध बनता है. बाक़ी देशों में सेक्स को तभी बलात्कार माना जाता है, जब वह हिंसा, धमकी या ज़ोर-ज़बर्दस्ती के बल पर होता है. एम्नेस्टी के अनुसार, यूरोप में अधिकांश लोग यही मानते हैं कि ‘’उस स्थिति को बलात्कार नहीं कह सकते, जब दूसरा पक्ष (महिलाएं) नशे में हो, बहुत कम कपड़े पहने हो या हाथ-पैर चलाकर विरोध न करे.’’

ईसाई धर्माधिकारी भी यौनदुराचारी

यूरोप, अमेरिका जैसे पश्चिमी देश ईसाई धर्मी हैं. इन सभी देशों के ऐसे कई बड़े-बड़े ईसाई धर्माधिकारी भी, जो रात-दिन दया, क्षमा और सदाचार के उपदेश देते रहते हैं, यौनदुराचार के लिए स्वयं बदनाम हैं. पोप अपने बिशपों और कार्डिनलों से परेशान हैं. और बच्चों के साथ उनके यौनदुराचारों के आये दिन किस्सों से खीझकर पश्चिमी यूरोप के कैथलिक और प्रोटेस्टैंट ईसाई बड़ी संख्या में चर्च से दूर भाग रहे हैं. भक्तजनों के नदारद रहने से चर्च बिकने लगे हैं. ऐसे भी समाचार हैं कि मुस्लिम संस्थाएं उन्हें खरीद कर मस्जिदों में बदल रही हैं.

यूरोप में अक्सर कहा जाता है, मनुष्य सहित समग्र प्राणिजगत को चलाने वाली दो ही मूल शक्तियां हैं भूख और कामवासना. इन पर संपूर्ण विजय संभव नहीं है. यह एक नितांत सुखभ्रांति है कि सरकारें, क़ानून-क़ायदे, अदालतें या जया बच्चन का सड़कछाप समाजवादी लिंच-न्याय भारत में एक ऐसी हिंसा का अंत कर देगा, जिसका सदियों-हज़ारों साल से दुनिया में कभी भी, कहीं भी और कोई भी अंत नहीं कर पाया, और न कर पायेगा.

मी-टूके कारण एक नई मुसीबत

आज स्थिति यह है कि अमेरिका की जिन महिलाओं ने ट्विटर पर ‘मी-टू’ अभियान छेड़ कर छेड़-छाड़ी पुरुषों को बेनकाब करना चाहा, उनके कारण महिलाओं को नयी नौकरिया मिलना दूभर हो गया है. अमेरिका में ह्यूस्टन विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर लीन ऐटवॉटर ने विभिन्न क्षेत्रों के 450 पुरुषों और महिलाओं के साथ अपने एक ऑनलाइन मतसर्वेक्षण में पाया कि कम से कम आधे पुरुष भयभीत हैं कि महिलाओं की ओर से उन पर ग़लत या अनुचित आरोप लग सकते हैं. उनमें से एक-चौथाई ने कहा कि वे इसी डर से अब किसी महिला को नौकरी पर नहीं रखना चाहते.

अधिकतर पुरुषों ने यह भी कहा कि वे महिला कर्मचारियों के सामने आने से बचते हैं. उनके साथ अकेले होने की नौबत नहीं आने देते. न ही किसी कामकाज़ी यात्रा के समय किसी महिला सहकर्मी को साथ ले जाते हैं. ऐटवॉटर का कहना है कि ‘मी-टू’ अभियान अपने पैरों पर आप आप कुल्हाड़ी मारने जैसा बन गया है. दो वर्षों से चल रहे इस अभियान ने अमेरिका में क़रीब 200 नामी-गरामी लोगों की ख्याति मटियामेट ज़रूर कर दी, पर कोई सज़ा उनमें से अब तक केवल छह पुरुषों को ही सुनायी गयी है. दूसरी ओर, किसी नौकरी के लिए तमाम महिलाओं के आवेदनों का अब प्रायः रद्दी की टोकरी में ही अंत होने लगा है.

महिलाएं और पुरुष एक-दूसरे के पूरक भी हैं और प्रतिस्पर्धी भी. जब वे प्रतिस्पर्धी बन जाते हैं, तब लड़ाई तू डाल-डाल, तो मैं पात-पात की हो जाती है. इतिहास गवाह है कि अब तक की ज्यादातर ऐसी लड़ाइयों में पुरुषों का पलड़ा ही भारी रहा है. इसलिए महिलाओं को बेहद सावधान रहने की जरूरत है.