केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नागरिकता संशोधन विधेयक को मंजूरी दे दी है. मोदी सरकार ने संसद के शीतकालीन सत्र की कार्यसूची में इस विधेयक को शामिल किया है. नागरिकता संशोधन विधेयक के कानून बनने के बाद अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्म के मानने वाले अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को 12 साल की बजाय महज छह साल भारत में गुजारने और बिना उचित दस्तावेजों के भी भारतीय नागरिकता मिल सकेगी.

इससे पहले कल, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार को असम के छात्र संगठनों और नागरिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों के साथ नागरिकता संशोधन विधेयक पर बैठकें की थीं. असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल भी इनमें हिस्सा लेने वालों में शामिल थे. पीटीआई के मुताबिक प्रभावशाली ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन समेत इन संगठनों ने गृहमंत्री के सामने इस विधेयक पर अपनी चिंता रखी.

अमित शाह ने नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ पूर्वोत्तर में जबर्दस्त विरोध के बाद ये बैठकें बुलायी थीं. बड़ी संख्या में पूर्वोत्तर के लोगों और कुछ संगठनों ने इस विधेयक का विरोध किया है. उनके मुताबिक यह 1985 की असम संधि के प्रावधानों को निष्प्रभावी बना देगा जिसमें उन सभी घुसपैठियों को बाहर निकालने की बात कही गयी है जो 24 मार्च, 1971 के बाद आये, भले ही उनका धर्म कुछ भी क्यों न हो.

पिछले सप्ताह पूर्वोत्तर के 12 गैर भाजपा सांसदों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से प्रस्तावित विधेयक के दायरे से पूर्वोत्तर को बाहर रखने की अपील की थी. उन्होंने कहा था कि यदि यह प्रभाव में आ गया तो इस क्षेत्र की आदिवासी जनसंख्या पर विस्थापन का संकट मंडराने लगेगा.