केंद्रीय मंत्रिमंडल ने लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण की अवधि को और 10 साल के लिए बढ़ाने संबंधी प्रस्ताव को बुधवार को मंजूरी दे दी है. इन श्रेणियों के लिए लोकसभा और विधानसभाओं में आरक्षण की अवधि 25 जनवरी 2020 को समाप्त होने वाली थी. सरकार आरक्षण की मियाद बढ़ाने के लिए इस सत्र में एक विधेयक लाएगी.

बैठक के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने संवाददाताओं को यह जानकारी दी. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में इस आशय के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई. इस विधेयक को मंजूरी के बाद लोकसभा और विधानसभाओं में आरक्षण की अवधि बढ़कर 25 जनवरी 2030 तक हो जायेगी.

एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने बताया कि विधायिका में एससी और एसटी के लिए आरक्षण संवैधानिक संशोधनों के जरिए किया जाता है जबकि इन श्रेणियों के लिए नौकरियों में इस तरह का आरक्षण देने का फैसला संबंधित राज्य सरकारें करती हैं.

सूत्रों ने बताया कि एंग्लो इंडियन समुदाय को अभी आरक्षण की इस व्यवस्था से बाहर रखा गया है. अगर बाद में जरूरत महसूस हुई तब इस पर फिर से विचार किया जायेगा. विधेयक में एंग्लो इंडियन समुदाय के प्रावधान के बारे में पूछे जाने पर जावड़ेकर ने हालांकि कोई स्पष्ट जवाब न देते हुए कहा कि विधेयक पेश होने के बाद इसका ब्यौरा मिल जायेगा. मंत्री ने बताया कि संसद में अनुसूचित जाति के 84 सदस्य और अनुसूचित जनजाति के 47 सदस्य हैं. भारत में विधानसभाओं में अनुसूचित जाति के 614 सदस्य और अनुसूचित जनजाति के 554 सदस्य हैं. शुरुआत में विधायिका में एससी-एसटी सदस्यों का आरक्षण दस वर्षों के लिए लागू किया गया था. बाद में इसे क्रमिक रूप से हर दस साल के लिए बढ़ाया जाता रहा है.