झारखंड में विधानसभा चुनाव जारी है. पांच चरणों में हो रहा यह चुनाव 20 दिसंबर को संपन्न होगा. लेकिन, राजधानी रांची से एक घंटे की दूरी पर खूंटी जिले में बसे आदिवासी गांवों में इस सवाल पर बहस हो रही है कि क्या पत्थलगड़ी आंदोलन के तहत इस चुनाव का बहिष्कार किया जाए.

खूंटी में पत्थलगड़ी आंदोलन की शुरुआत 2017 में हुई थी. इसके तहत गांवों में जमीन में एक पत्थर गाड़कर उस पर भारतीय संविधान के प्रावधान लिखे जाने लगे. इनमें संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत आदिवासी इलाकों को मिली विशेष स्वायत्तता का जिक्र होता है.

झारखंड पुलिस ने आदिवासियों के इस अभियान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी. इसके तहत हजारों लोगों पर मामले दर्ज किए गए. सत्याग्रह की सहयोगी वेबसाइट स्क्रोल.इन ने पुलिस द्वारा दर्ज 19 प्राथमिकियों (एफआईआर) की पड़ताल की. ये एफआईआर खूंटी जिले में जून 2017 और जुलाई 2018 के बीच में दाखिल की गई थीं. इनमें 11200 से भी ज्यादा लोगों को आरोपित बनाया गया है. इन लोगों पर शांति-व्यवस्था भंग करने संबंधी कई आरोप हैं.

19 एफआईआर में से 14 ऐसी हैं जिनमें 10 हजार से भी ज्यादा लोगों को आरोपित बनाया गया है. इनमें बाकी दूसरे आरोपों के अलावा इन लोगों पर आईपीसी की धारा 124ए के तहत राजद्रोह का आरोप भी लगाया गया है. अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही इस धारा के तहत सरकार के खिलाफ असंतोष भड़काने या इसकी कोशिश करने वाले को उम्र कैद तक का प्रावधान है.

जिन 10 हजार आदिवासियों पर राजद्रोह का आरोप है वे खूंटी की आबादी का करीब दो फीसदी हिस्सा हैं. हालांकि वास्तव में ऐसे लोगों का आंकड़ा ज्यादा हो सकता है क्योंकि यह माना जाता है कि पत्थलगड़ी समर्थकों पर 19 से भी ज्यादा एफआईआर दर्ज हुई हैं.

जिन 19 एफआईआर की हमने पड़ताल की उनमें 132 लोगों की पहचान नाम के साथ की गई है. इनमें से कइयों का नाम कई एफआईआर में है. 43 आरोपित ऐसे हैं जो गांव के मुखिया हैं. बाकी अज्ञात हैं और इस बात से खूंटी में भय का माहौल है क्योंकि ग्रामीणों को लगता है कि भविष्य में पुलिस उनमें से किसी को भी उठा सकती है.

खूंटी से झारखंड के इतिहास की दो सबसे मशहूर शख्सियतों का नाता जुड़ता है. इनमें पहला नाम बिरसा मुंडा का है जिन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आदिवासियों की ऐतिहासिक बगावत का नेतृत्व किया था. साल 1900 में सिर्फ 25 साल की उम्र में उनका निधन हो गया था. दूसरी शख्सियत हैं जयपाल सिंह मुंडा – करिश्माई हॉकी खिलाड़ी जिन्होंने 1928 के ओलंपिक खेलों में भारतीय टीम की अगुवाई की थी और स्वर्ण पदक जीता था. जयपाल सिंह मुंडा बाद में संविधान सभा की सबसे प्रभावी आवाजों में से एक रहे.

लेकिन सात दशक बाद आज आदिवासी कह रहे हैं कि जिस संविधान ने उन्हें अपनी जमीन की सुरक्षा का हक दिया है, उसका हवाला देने के लिए उन्हें परेशान किया जा रहा है.

इस रिपोर्ट के लिए हमने जिन आदिवासियों से बात की उनमें 10 ऐसे थे जिन पर या तो आरोप लगे हैं या फिर उन्हें गिरफ्तार किया या जेल भेजा जा चुका है. इनमें से कइयों के रिश्तेदारों को भी पुलिस की कार्रवाई झेलनी पड़ी है जिसके नतीजे में एक शख्स की जान तक गई है.

बिरसा मुंडा: हम लोग तो नकली बिरसा हैं, असली नहीं.

सुप्रिया शर्मा: आप को कब पता चला कि आप पर राजद्रोह का आरोप लगा है?

बिरसा मुंडा: हो गया एक साल, सुनते थे कि गांव के मुंडा लोगों पर एफआईआर हुआ है, फिर किसी ने कहा कि उसमें मेरा नाम भी है.

सुप्रिया शर्मा: इस से पहले आपने कभी देशद्रोह या राजद्रोह के बारे में सुना था?

बिरसा मुंडा: नहीं, कभी नहीं

सिर्फ बिरसा मुंडा का नाम ही एक सदी पुराने उस आंदोलन की याद नहीं दिलाता. पत्थलगड़ी आंदोलन की शुरुआत ही महान बिरसा मुंडा की विरासत पर संकट की चिंताओं से हुई थी. बिरसा मुंडा की मौत के बाद उनकी अगुवाई में चली बगावत ने अंग्रेज शासकों को चिंता में डाल दिया था. इसका नतीजा यह हुआ कि 1908 में छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी एक्ट) वजूद में आया. इसका मकसद था आदिवासियों की जमीन पर उनके हक की सुरक्षा. लेकिन एक सदी बाद 2016 में राज्य की भाजपा सरकार ने इस कानून के प्रावधानों को ढीला करने का फैसला किया और यही पत्थलगड़ी की वजह बन गया. कैसे? यह एक युवक ने हमें बताया और संयोग देखिए कि उसका नाम भी बिरसा मुंडा ही है.

बिरसा मुंडा जूनियर: अक्टूबर-2016 में हम लोग सीएनटी एक्ट (छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम) में बदलाव के विरोध में एक रैली में हिस्सा लेने रांची जा रहे थे. लेकिन हमें वहां नहीं जाने दिया गया. पुलिस ने डंडे चलाए, फायरिंग की, फिर पता चला कि एक आदिवासी मारा गया. तब हमने निर्णय लिया कि यदि एक लोकतांत्रिक देश में हम अपने अधिकार के लिए रैली नहीं निकाल सकते तो हम अपने गांव में ही पत्थलगड़ी कर के बताएंगे कि पांचवी अनुसूची में हमारे अधिकार आते हैं… हम जबरदस्ती नहीं कर रहे थे, अपने अधिकार को समझने लगे, पत्थलगड़ी करते गए.

9 मार्च, 2017 को भंडरा गांव में गाड़ा गया पत्थर

तीन मार्च 2017 को खूंटी का भंडरा ऐसा पहला गांव बना जिसने एक पत्थर गाड़ा. हरे रंग में रंगे हुए इस पत्थर पर भारतीय संविधान के शब्द दर्ज थे. पास के छमडीह गांव के मंगल मुंडा और भंडरा के मकी टूटी ने हमें इस बारे में बताया.

मंगल मुंडा: हम अखबार में पढ़ रहे थे कि सरकार सीएनटी एक्ट में संशोधन कर रही है ताकि बड़ी कंपनियों को जमीन दी जा सके. यहां से 12 किलोमीटर दूर, चुकरु के पास नई राजधानी ग्रेटर रांची के लिए जमीन का अधिग्रहण हो रहा था.

मकी टूटी: मनमर्जी से, बिना ग्राम सभा से पूछे.

मंगल मुंडा: पत्थर गाड़ना तो हम लोगों का पूर्वजों से परंपरा है. ये तो अपना रीति दस्तूर है. जब जमीन अधिग्रहण की बात चलने लगी तो हम लोग संविधान की बात पर आ गए. ये चर्चा हो गई कि संविधान से तो देश चलता है और संविधान में ये लिखा है कि हम लोग की अनुसूचित जनजाति क्षेत्र में ग्राम सभा ही रूढ़ि प्रथा है, इस रूढ़ि प्रथा को विधि का बल प्राप्त है. हम लोगों ने सोचा कि जब जन्म से मरण तक पत्थर का इस्तेमाल करते हैं इसलिए संविधान में जो लिखा है उसको भी पत्थर से ही दर्शाएंगे.

भंडरा गांव के लोग बताते हैं कि उन्हें संविधान की पांचवीं अनुसूची के बारे में ज्यादा पता नहीं था. लेकिन 2012 से उनमें से कुछ ने उन बैठकों में हिस्सा लेना शुरू किया जो जिला मुख्यालयों में शहरी आदिवासी बुद्धिजीवी आयोजित करते थे. इन्हीं बैठकों में उन्हें इस बारे में ज्यादा जानकारी मिली. शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया में मैनेजर विजय कुजुर की अगुवाई में इन बुद्धिजीवियों ने आदिवासी महासभा को पुनर्जीवित किया. यह वही संगठन है जिसकी स्थापना जयपाल सिंह मुंडा ने 1938 में की थी. पुलिस की एफआईआर में इन लोगों को पत्थलगड़ी आंदोलन का मास्टरमाइंड कहा गया है.

लेकिन भंडरा गांव के लोग दावा करते हैं कि पत्थर गाड़कर उस पर संविधान के अंश – जिसे वे संविधान की पत्थलगड़ी कहते हैं - लिखने का आइडिया उनका था, न कि उनके नेताओं का.

सुंबर टूटी: हमने सोचा कि बोर्ड तो गिर सकता है, मिट सकता है, लेकिन पत्थर हमेशा-हमेशा के लिए रहेगा… ये बातें हम ही लोग ने लिखा, ऊपर वालों से पूछा, वकील लोगों से पूछा, ऐसा लिखने पर ठीक है कि नहीं है… उन लोगों ने कहा ठीक है.

सवाल उठता है कि इन पत्थरों पर क्या लिखा होता है? भंडरा में गड़े पत्थर पर संविधान का चार अनुच्छेदों का जिक्र कुछ इस तरह से है.

  • भारत का संविधान अनुच्छेद 13(3)(क) के तहत रूढ़ि या प्रथा ही विधि का बल है,यानी संविधान की शक्ति है.
  • अनुच्छेद 19(5) के तहत पांचवीं अनुसूचित जिलों या क्षेत्रों में कोई भी बाहरी गैर रूढ़ि प्रथा व्यक्तियों का स्वतंत्र रूप से भ्रमण करना, निवास करना, बस जाना, घूमना-फिरना वर्जित करता है.
  • भारत का संविधान अनुच्छेद 19(6) के तहत कोई भी बाहरी व्यक्तियों को पांचवीं अनुसूचित क्षेत्रों में व्यवसाय, कारोबार, रोजगार पर प्रतिबंध है.
  • पांचवीं अनुसूचित क्षेत्रों में भारत का संविधान अनुच्छेद 244(1) भाग (ख) पारा (5x1) के तहत संसद या विधानमंडल का कोई भी सामान्य कानून लागू नहीं है.

ये वाक्य संविधान के प्रावधानों की हूबहू नकल नहीं हैं. लेकिन इनसे इसकी एक झलक मिलती है कि खूंटी का आदिवासी समाज इन्हें किस तरह से समझता है.

उदाहरण के लिए अनुच्छेद 19(5) अनुसूचित जनजाति के इलाके में बाहरी लोगों के जाने पर सीधे रोक नहीं लगाता. इसके बजाय यह राज्यों को ऐसे इलाकों में आवाजाही, घर बनाने और कारोबार जैसी गतिविधियों को प्रतिबंधित करने के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है. इसका मकसद किसी भी अनुसूचित जनजाति के हितों की सुरक्षा है.

इसी तरह अनुच्छेद 244 (1) किसी राज्य के राज्यपाल को आदिवासी सुझाव परिषद से परामर्श के बाद यह अधिसूचना जारी करने का अधिकार देता है कि संसद और विधानसभा से पारित कोई कानून किसी अनुसूचित जनजाति वाले इलाके में लागू नहीं होगा. खूंटी के आदिवासियों ने इसकी व्याख्या इस तरह से समझी है कि आम कानून भी उनके इलाके में तभी लागू हो सकते हैं जब राज्यपाल इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दे.

यहां यह याद रखना जरूरी है कि कई अदालती फैसले यह कह चुके हैं कि संविधान की पांचवीं अनुसूची का मकसद आदिवासी समुदायों की संस्कृति और स्वायत्तता का संरक्षण करना है.

कई लोग मानते हैं कि झारखंड सरकार ने पत्थलगड़ी आंदोलन को बहुत संकीर्ण नजरिये से देखा. यह आंदोलन फैलने लगा तो सरकार ने आदिवासियों के साथ बातचीत करने के बजाय उनके खिलाफ मामले दर्ज करने शुरू कर दिए. एफआईआर के पहले सिलसिले का ताल्लुक 22 जून 2017 से जुड़ता है. उस दिन कांकी गांव में पुलिस और आदिवासियों के बीच टकराव हुआ था. यह गांव भंडरा से ज्यादा दूर नहीं है.

मकी टूटी: गांव के लोगों ने सुरक्षा के लिए बांस का छतरी बनाया था, मचान बनाया था. पुलिस वाले आये, सवाल पूछने लगे, चले गये. फिर शाम को सात बजे आये. वहां तीन बुढ़ल (बुजुर्ग) बैठे थे, वहां आकर उन्हें तीन थप्पड़ मारा. उसी में चापकल का खोपड़ी टंगा हुआ है (गांव की घंटी) कुछ लोगों ने उसी को बजा दिया, सब लोग जमा हो गए. उसके बाद पुलिस से पूछा गया कि आप क्यूं मारे, बिना पूछे, बिना बोले, चलिए आपस में बात करेंगे. लड़ाई तो नहीं करेंगे. रात में ग्राम सभा नहीं होता है. सुबह ग्राम सभा करेंगे.

उधर, पुलिस का पक्ष थोड़ा अलग है. 25 जून 2017 को जो एफआईआर दर्ज हुई है उसमें कहा गया है कि पुलिस की एक टीम यह शिकायत मिलने के बाद कांकी गई थी कि कुछ असामाजिक तत्वों ने सड़क जाम कर दी है और वे रेत-बजरी ले जा रहे ट्रकों और अफीम की खेती करने वाले किसानों से लेवी वसूल रहे हैं. एफआईआर के मुताबिक उसी शाम को पुलिस की एक बड़ी टीम गांव में गई और सड़क खोलने के लिए बांस के ढांचे को गिरा दिया गया. पुलिस के मुताबिक इसी दौरान गांव वालों ने उस पर लाठी और पारंपरिक हथियारों के साथ हमला कर दिया.

एफआईआर के मुताबिक इसी दौरान गांव में पत्थलगड़ी आंदोलन के नेता आए और उन्होंने 500 से ऊपर की भीड़ को भड़काना शुरू कर दिया. रात के साढ़े आठ बजे तक रांची से एक हथियारबंद टुकड़ी के साथ अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक वहां पहुंचे. लेकिन आदिवासियों ने पुलिस टीम को 12 घंटे तक बंधक बनाए रखा.

हालांकि गांव वालों ऐसे किसी हमले की बात से इनकार करते हैं. उनका सवाल है कि वे एक पूरी की पूरी पुलिस टुकड़ी को कैसे बंधक बनाकर रख सकते हैं.

मकी टूटी: सुबह बात किए. जितना साहब लोग आया वो बोला कि ठीक है, आज से हम लोग भी केस नहीं करेंगे, आप लोग भी केस मत करना. वो चला गया. दो दिन बाद वो लोग एफआईआर डाल दिया, बोल रहे हैं कि हम लोग को बंधक बनाया, जबकि हम बात करने लाया.

इस घटना के बाद 24 जून 2017 को एक और एफआईआर दर्ज की गई थी. इसमें पत्थलगड़ी आंदोलन के नेताओं पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने अनुसूचित इलाकों के नाम पर भोले-भाले लोगों को भड़काया. एफआईआर में लिखा गया है, ‘वे दर्जनों गांवों में पत्थर के स्लैब लगा रहे हैं और संविधान की गलत व्याख्या बता रहे हैं ताकि भोले-भाले लोग भड़ककर प्रशासन के काम में बाधा डालें. इससे इलाके की शांति भंग हो रही है और कानून-व्यवस्था की समस्या भी पैदा हो रही है.’

सुंबर टूटी: सरकार बोल रही है कि हमने संविधान की गलत व्याख्या की है. ‘भाई गलत व्याख्या है तो सही व्याख्या क्या है’ हम पूछे साहब लोगों से तो कोई बोले नहीं.

भंडरा के लोगों के लिए ये एफआईआर किसी झटके से कम नहीं थीं. दरअसल इन लोगों को अपने काम के संवैधानिक रूप से सही होने पर इतना यकीन था कि उन्होंने मार्च 2017 में अपने गांव में होने वाले पत्थलगड़ी समारोह के लिए संबंधित ब्लॉक के अधिकारियों को भी पहले ही सूचना दे दी थी.

गांव वाले दावा करते हैं कि स्थानीय थाने के एसएचओ भी इस समारोह में मौजूद थे, लेकिन उसी साल जून में उन्होंने ही गांव वालों के खिलाफ शिकायत कर दी जिसका नतीजा एफआईआर के रूप में सामने आया.

शुरूआत की दो एफआईआरों में से किसी में भी राजद्रोह का आरोप नहीं है. लेकिन भंडरा और आसपास के गांवों के कुछ लोगों, जिनमें सुंबर सिंह टूटी और मंगल मुंडा भी शामिल हैं, को इनके बाद गिरफ्तार कर लिया गया. अभी यह साफ नहीं है कि एफआईआर में राजद्रोह का आरोप बाद में जोड़ा गया या फिर इन लोगों को किसी दूसरे मामले में गिरफ्तार किया गया.

2018 में इन दोनों ने 10 महीने जेल में बिताए. पहले खूंटी और फिर यहां से 170 किलोमीटर दूर बोकारो जेल में. फिलहाल वे जमानत पर हैं.

मंगल मुंडा (बाएं) और सुंबर सिंह टूटी

मंगल मुंडा: हम लोग को समझ नहीं आ रहा है कि हम कौन सा गलत काम किया कि हम पर देशद्रोह लग गया है. देशद्रोह क्या होता है, हम को वो भी नहीं मालूम.

हमने मंगल मुंडा से पूछा कि क्या किसी पुलिस अधिकारी या फिर मजिस्ट्रेट ने उन्हें यह नहीं बताया. उनका कहना था कि उन्हें किसी मजिस्ट्रेट के सामने पेश ही नहीं किया गया.

पुलिस ने भंडरा के विकास टूटी और बालगोबिंद टिर्की के घर कुर्की-जब्ती की कार्रवाई भी की. इनके परिवार वालों के मुताबिक इसके लिए बुलडोजर बुलाए गए. आज इन दोनों के मकान पूरी तरह से ध्वस्त हैं. हमने इस सिलसिले में झारखंड पुलिस को आठ सवालों की एक सूची भेजी थी. इसमें यह सवाल भी शामिल था कि इतनी भारी-भरकम कार्रवाई की जरूरत क्यों पड़ी. हमसे फोन पर हुई बातचीत में खूंटी के पुलिस अधीक्षक आशुतोष शेखर ने इतना ही कहा कि विधानसभा चुनाव खत्म होने तक वे हमारे सवालों के जवाब नहीं दे सकते.

जेसीबी द्वारा ध्वस्त किया गया बालगोविंद टिर्की का घर

जैसे-जैसे पत्थलगड़ी अभियान खूंटी ज़िले के तीन ब्लॉकों - खूंटी, मुर्हू और अर्की - में फैलता गया पुलिस भी नये मामले दर्ज करती गई. यहां पर इनमें से कुछ मामलों में दर्ज एफआईआर के अंश दिए गए हैं:

एफ़आईआर नंबर 17/18, 2 फ़रवरी 2018, खूंटी पुलिस स्टेशन

... इलाक़े के ग्राम प्रधान अशोक चिह्न के साथ लोगों को राष्ट्रीय उत्सवों जैसे कि गणतंत्र दिवस और 15 अगस्त और लोकसभा राज्यसभा विधानसभा और पंचायत चुनावों में भाग न लेने का आदेश दे रहे हैं. हिंदू समुदाय को महाराजा रावण और महिषासुर के पुतले न जलाने के और उन्हें राक्षस न कहने के आदेश भी दिए गए हैं.

एफ़आईआर नंबर 11/18, 9 फ़रवरी 2018, मुर्हू पुलिस स्टेशन

... जब सरकारी कर्मचारी और अधिकारी गांवों में अपनी ड्यूटी करने के लिए जाते हैं तो ग्राम प्रधान उनसे असंवैधानिक सवाल पूछते हैं. इस तरह से ऊपर दिये गये आदिवासी संगठन उन कामों को करने के आरोपित हैं जो लोकतंत्र विरोधी, सरकार विरोधी, देश विरोधी और संविधान की आत्मा के ख़िलाफ़ में हैं और जिनसे समाज में वैमनस्य पैदा हो रहा है.

एफ़आईआर नंबर 33/18, 3 मार्च 2018, खूंटी पुलिस स्टेशन

पत्थलगड़ी आंदोलन के स्वघोषित नेता गांव-गांव जाकर लोगों से सरकार की विकास योजनाओं का विरोध करने, बच्चों को स्कूल जाने से रोकने, पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों को गांव में प्रवेश करने से रोकने और सरकारी सब्सिडी न लेने के लिए उकसा रहे हैं. और वे देश और लोकतांत्रिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ भड़काऊ भाषण भी दे रहे हैं.

(एक बड़ी सार्वजनिक सभा में) पत्थलगड़ी के नेताओं ने सरकार, प्रशासन, रामायण, गीता और महाभारत के ख़िलाफ़ भड़काऊ भाषण दिए और ये दावा भी किया कि धरती का एक इंच भी हिस्सा सरकार का नहीं है और इस देश के असली मालिक आदिवासी हैं. इसलिए केंद्र और राज्य की सरकारें अवैध हैं.

पत्थलगड़ी की परंपरा मुंडा आदिवासियों की एक प्राचीन परंपरा है जिसका इस्तेमाल 90 के दशक में गांव वालों को अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायतों का विस्तार अधिनियम के बारे में जानकारी देने के लिए भी किया गया था. लेकिन सरकारी योजनाओं को ख़ारिज करने और चुनावों का बहिष्कार करने तथा आदिवासियों के लिए एक अलग राज्य की बात करते हुए कुछ प्रतीकों का इस्तेमाल गुजरात के सती पति संप्रदाय से प्रेरित है.

खूंटी जिले के एक गांव में लगाया गया पत्थर

पुलिस की कार्रवाई के बाद भी झारखंड के कई ज़िलों में पत्थलगड़ी अभियान चलता रहा. यहां तक कि यह पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ के कुछ आदिवासी इलाकों में भी फैल गया. यहां पर गिरफ़्तार हुए आदिवासियों में एक भूतपूर्व आईएएस अफसर भी शामिल था.

लोगों से बातचीत और थोड़ा शोध के बाद पता चलता है कि पत्थलगड़ी के ज़्यादातर नेता शहरी मध्यवर्ग से आने वाले पढ़े-लिखे लोग हैं. इनमें से कई लोग सरकारी नौकरियों में भी थे. झारखंड सरकार का कहना है कि यह आंदोलन माओवादी, ईसाई मिशनरी और अफ़ीम उगाने वाले चला रहे हैं.

खूंटी ज़िले के घाघरा गांव का रहने वाला एक युवा हमें यह बताता है कि वह इस आंदोलन से क्यों जुड़ा:

नवयुवक: सरकार हमारी जमीन लेती है और बदले में योजना देती है जिसकी हमको जरूरत नहीं. ‘हमारे गांव, हमारा राज’ का मतलब जो भी काम हों लोगों के द्वारा ही हों, लेकिन उस तरह से नहीं होता. जो कोई भी सरकारी योजना स्कीम आती है, सरकार की मन-मर्जी से आती है, गांव वालों को जिम्मेदारी नहीं मिलती. हम लोग ठेकेदार को जानते भी नहीं.

वह बताता है कि गांव वालों ने पत्थलगड़ी अभियान काफ़ी सोच-विचार करने के बाद शुरू किया था.

नवयुवक: संविधान की पत्थलगड़ी जब शुरु हुआ तो भंडरा तरफ से शुरु हुआ था. हम लोग उस वक्त सच्चाई की बात सुनने के लिए जाते थे. हम लोग इतना जांच-पड़ताल किए, एक साल जानकारी लेने में ही बिता दिया. हम लोग जांच करना चाह रहे थे कि जो सरकार बोल रही है कि संविधान की गलत व्याख्या, भाई गलत व्याख्या हो रहा है तो सही व्याख्या क्या है. सरकार खुद बता नहीं रही है तो हम लोग उसी में मानने लग गए कि सही है.

इस युवा के मुताबिक बैठकों में शामिल होने से उसे काफ़ी कुछ जानने का मौका मिला.

नवयुवक: मुंदरी में हमने सुना था अबुआ डिसुम, अबुआ राज (हमारी जमीन, हमारा शासन - एक नारा जो बिरसा मुंडा ने 19वीं सदी में दिया था) लेकिन किसी ने नहीं बताया कि संविधान में तीन हिस्सा है. एक सामान्य क्षेत्र के लिए, एक ट्राइबल पांचवी और छठवी अनुसूची क्षेत्र के लिए, तीसरा धारा 370 जम्मू और कश्मीर के लिए. पत्थलगड़ी करके सरकार को हम याद दिलाना चाहते थे. हम नए कानून की मांग नहीं कर रहे थे, सिर्फ पुराना कानून लागू हो, ये बोल रहे थे.

इस युवा ने हमसे अपनी पहचान छुपाने को कहा क्योंकि उसे डर था कि ऐसा न करने पर उसके ख़िलाफ़ भी एफ़आईआर दर्ज की जा सकती है. उसके मुताबिक़ घाघरा गांव के लोगों को इस मामले में इसलिए भी सावधान रहना है क्योंकि वहां 26 जून 2018 को हुआ पत्थलगड़ी समारोह एक बड़े फ़साद की वजह बन गया था. यह समारोह उसके कुछ ही दिन बाद हुआ था जब पुलिस ने पत्थलगड़ी आंदोलन के कुछ नेताओं के ख़िलाफ़ बलात्कार का मामला दर्ज किया था.

जिस वक़्त लोग इस समारोह में हिस्सा लेने के लिए घाघरा में इकट्ठा थे ठीक उसी वक़्त पुलिस वहां पत्थलगड़ी आंदोलन के नेताओं को खोजने के लिए आ गयी. गांव वालों का आरोप है कि पुलिस ने उन्हें लाठियों से मारा और उनके कुछ लोगों को गिरफ़्तार कर लिया. इसके बाद गुस्से में गांव वालों ने स्थानीय विधायक के घर पर तैनात तीन पुलिस वालों को पकड़ लिया. यह झगड़ा अगली सुबह तक चला.

इस मामले की एफ़आईआर में, जिसे 27 जून 2018 को लिखा गया था, पुलिस वालों का कहना है कि जब गांव वालों ने उनकी प्रार्थनाओं को नहीं सुना तो उन्हें मजबूरी में लाठीचार्ज करना पड़ा. उधर गांव वालों का कहना है कि पुलिस ने न केवल वहां मौजूद लोगों को लाठियों से मारा बल्कि कुछ लोगों को घरों से बाहर खींच-खींचकर भी पीटा आ गया.

नवयुवक: इतना जबरदस्त मारा, दौड़ा-दौड़ाकर मारा.

गांव वालों का आरोप है के पुलिस ने वहां से भाग रहे आदिवासियों पर गोलियां भी चलाई जिससे छमडीह गांव के रहने वाले बिरसा मुंडा की मृत्यु हो गई. एक तस्वीर में बिरसा मुंडा पीठ के बल लेटा हुआ दिखाई देता है जिसके सर के पीछे से खून निकल रहा है. पुलिस का कहना है कि उसकी मृत्यु भगदड़ की वजह से हुई. लेकिन उसका भाई सनिका मुंडा इसे गलत बताता है.

सनिका मुंडा: रांची के अस्पताल में हमने महिला डॉक्टर को कहते सुना कि सर पे जो घाव था वो केवल गोली से ही हो सकता था. जब हम उसकी लाश घर लेकर आये तो हमने देखा कि कान के ऊपर बहुत बड़ा घाव था.

मोबाइल पर शेयर की जा रही बिरसा मुंडा की तस्वीर

काफी कोशिशों के बाद भी सनिका को बिरसा मुंडा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट अब तक नहीं मिली है. इस रिपोर्टर ने भी खूंटी पुलिस से रिपोर्ट की कॉपी मांगी थी लेकिन हमें भी उसे नहीं दिया गया.

घाघरा गांव में आदिवासियों के परंपरागत मुखिया करम सिंह मुंडा भी उन लोगों में से हैं जिन्हें कत्ल करने और राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया है. उनकी पत्नी बताती हैं कि उन्हें घागरा से करीब 145 किलोमीटर दूर हजारीबाग की जेल में ट्रांसफर कर दिया गया है. इसके चलते परिवार का उनसे मिलना और भी मुश्किल हो गया है.

घाघरा गांव में अपने घर के बाहर करम सिंह मुंडा की पत्नी

यहां एक ध्यान देने वाली बात यह है कि 19 एफआईआरों में दर्ज जिन 132 नामों की हमने जांच-पड़ताल की उनमें से 43 ग्राम प्रधान थे. भंडरा गांव के प्रधान बिरसा मुंडा का कहना है कि ऐसा पूरे गांव को डराने के लिए किया गया है.

भंडरा से करीब 20 किलोमीटर दूर केवड़ा गांव के प्रधान बैजनाथ पाहन आठ महीने जेल में रहने के बाद हाल ही में अपने घर वापस लौटे हैं. उनके गांव में पत्थलगड़ी होने से पहले ही पुलिस ने उनके ऊपर राजद्रोह का मामला दर्ज कर दिया था. पाहन के मुताबिक ऐसा पुलिस और गांव वालों के बीच तब हुई खींचतान की वजह से किया गया जब पुलिस ने गांव के स्कूल में अपना एक कैंप लगा लिया था.

गवर्नमेंट मिडिल स्कूल में स्थित पुलिस कैंप

बैजनाथ पाहन: कुछ महिला को छेड़-छाड़ किया बाजार से आते समय गाड़ी में. फिर, बुरहतु (पड़ोसी गांव) का एक आदमी था, पुलिस वालों ने बहुत सारी लकड़ी उसकी साइकिल पर लादकर कैंप तक पहुचाने के लिए बोला. गांव का आदमी बोला कि बड़ा लकड़ी है साइकिल में नहीं संभाल सकेगा, साइकिल खराब हो जाएगा. वो लोग नहीं माना. जबरदस्ती लाया. साइकिल का पिछला चक्का में बैंड हो गया. वो आदमी उस दिन नहीं बताया, बाद में नोटिस भेज दिया मेरे पास कि हमने हमारे गांव में पुलिस को कैंप लगाने क्यों दिया.

लेकिन बैजनाथ पाहन का कहना है कि पुलिस ने इस मामले में उससे कुछ पूछा ही नहीं था. इसलिए ग्राम सभा से बातचीत करने के बाद उसने पुलिस के पास जाकर इस मामले को उठाने का फैसला किया. पाहन के मुताबिक उस बैठक में काफी गर्मा-गर्मी हुई थी.

बैजनाथ पाहन: हल्ला हुआ, मारपीट नहीं हुआ. लेकिन पुलिस लिख दिया एफआईआर में कि डंडा, लाठी, हथियार साथ पुलिस स्टेशन लाया.

पुलिस की एफआईआर इस मामले में काफी गंभीर आरोप लगाती है. इस एफआईआर को 13 मार्च 2018 को दर्ज किया गया था. इसमें पाहन के साथ 300 और लोगों को आरोपित बनाया गया है. इन सभी पर पुलिस स्टेशन पर कब्जा करने और पुलिस वालों के हथियार छीनने के आरोप हैं और इसे पत्थलगड़ी आंदोलन का ही एक हिस्सा बताया गया है.

इस मामले में पाहन के अलावा केवड़ा के एक और निवासी नेता नाग को भी गिरफ्तार किया गया था जो यहां से करीब 400 किलोमीटर दूर दुमका की जेल में कैद है.

बैजनाथ पाहन: वो मीटिंग तक में नहीं आता था. बहुत अनपढ़ आदमी है. हिंदी तक नहीं जानता. क्या नेतागिरी करेगा. लकड़ी बेचकर जिंदा रहता है.

नेता नाग का पुत्र पित्ता नाग हमें बताता है कि उसके पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि वह दुमका जाकर अपने पिता से मिल सके.

पुलिस की कार्रवाइयों के बाद अब इलाके में जिस तरह के डर का माहौल है उसमें पत्थलगड़ी अभियान थम सा गया है. लेकिन अब इसकी जगह एक दूसरी तरह के विरोध ने ले ली है. पूरे के पूरे गांव अब अपने आधार और राशन कार्डों का त्याग कर रहे हैं. कुछ गांव वाले इन्हें जला रहे हैं तो कुछ ने इन्हें डाक के जरिये राज्यपाल के पास भेज दिया है.

इसके अलावा इनमें से कई लोग चुनावों का बहिष्कार भी कर रहे हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में भी कई लोगों ने इसी वजह से अपना वोट नहीं डाला था.

कवरा गांव में अपने घर के बाहर नेता नाग के पुत्र पित्ता नाग

मंगल मुंडा: गांधीजी असहयोग कर रहे थे, हम भी वही कर रहे थे.

लेकिन यहां के कई लोगों का मानना है कि चुनावों के बहिष्कार का फायदा भाजपा को ही हुआ है. उसने पिछले लोकसभा चुनाव में खूंटी लोकसभा सीट को सिर्फ 1445 मतों से जीता था. स्थानीय लोगों का मानना है ऐसा उन कई लोगों के चुनाव का बहिष्कार करने की वजह से हुआ जो भाजपा के खिलाफ वोट देने वाले थे.

सुंबर टुटी: हम लोग लोकतंत्र के त्यौहार में भाग नहीं लिए थे. लेकिन हमें पूरा उम्मीद था कि बीजेपी नहीं जीतेगी. कांग्रेस ही जीतेगी. लेकिन पासा पलट गया. पता नहीं कैसे. हमने सोचा था कि कांग्रेस जीतेगी. हो सकता है कि वह हमारी बात करती.

सुप्रिया शर्मा: यहां पर कांग्रेस और दूसरी पार्टियों की सरकारें भी रह चुकी है. क्या वे सरकारें आदिवासियों के लिए ज्यादा सोचती थीं?

सुंबर टूटी: उसे (कांग्रेस को) भी हमारी ज्यादा चिंता नहीं थी. लेकिन वो लूटती कम थी. बीजेपी में ज्यादा लूटा जा रहा है. खराब व्यवहार किया जा रहा है. वो ऐसा नहीं करते थे कांग्रेस वाले लोग. हम लोग ही नहीं, आंगनबाड़ी की महिला कार्यकर्ता को पुरुष पुलिस द्वारा जानवर की तरह से मारा गया. कुछ लड़का लोग आरक्षण की मांग कर रहा था, उसे भी दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया.

भाजपा के खिलाफ काफी गुस्से और यह जानने के बावजूद कि इलेक्शन का बहिष्कार उसे ही फायदा पहुंचा सकता है, खूंटी में कई आदिवासी विधानसभा चुनाव का भी बहिष्कार करने के बारे में सोच रहे हैं.

घाघरा गांव का एक नवयुवक: अगर राज्यपाल नोटिस जारी करता है टीएसी (ट्राइबल एडवाइसरी कांउसिल) से पूछ कर, तभी चुनाव कानूनी है, नहीं तो गैरकानूनी है.

झारखंड विकास पार्टी के टिकट पर खूंटी से विधानसभा चुनाव लड़ने वाली आदिवासी कार्यकर्ता दयामणि बारला ऐसा करने को सही नहीं मानती हैं. और इसकी वजह सिर्फ यह नहीं है कि इससे भाजपा को फायदा पहुंचेगा.

दयामणि बारला: अगर जयपाल मुंडा चुनाव नहीं लड़ते और जीत के संविधान सभा नहीं जाते, तो क्या पांचवी अनुसूची होती?