बीते हफ्ते अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अफगानिस्तान पहुंचकर एक बड़ी घोषणा कर दी. उन्होंने तालिबान के साथ एक बार फिर शांति वार्ता शुरू करने का ऐलान किया. अफगानिस्तान के ‘बगराम एयर फील्ड’ में अपने सैनिकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, ‘हमारी बातचीत फिर शुरू हो रही है. तालिबान समझौता करना चाहता है और हम उनसे मिलने वाले हैं. जब हम संघर्ष विराम चाहते थे, वे संघर्ष विराम नहीं चाहते थे. अब वे संघर्ष विराम चाहते हैं. हमें बड़ी सफलता मिली है, मुझे लगता है कि अब बातचीत सफल हो पाएगी.’

इस दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि आज अगर तालिबान झुका है और संघर्ष विराम पर तैयार हुआ है तो यह उनके उस कूटनीतिक कदम का नतीजा है जिसके तहत बीते सितम्बर में उन्होंने तालिबान से अचानक बातचीत रद्द कर दी थी.

अमेरिकी राष्ट्रपति की घोषणा के कुछ ही घंटे बाद तालिबान की ओर से बातचीत को लेकर एक बयान आया. इसमें तालिबान ने ट्रंप के बयान पर हैरानी जाहिर करते हुए कहा कि बातचीत को लेकर उसका रुख बिल्कुल भी नहीं बदला है. तालिबान के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने वाशिंगटन पोस्ट से कहा, ‘हम बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन नई बातचीत को लेकर हमारा नजरिया वही है, जो पिछली (बातचीत) के टूटने पर था.’

बीते सितम्बर में अमेरिका और तालिबान के बीच बातचीत संघर्ष विराम के मसले पर ही टूटी थी. तालिबान संघर्ष विराम के लिए तैयार नहीं था. उसका कहना था कि जब सभी अमेरिकी सैनिक तालिबान से चले जाएंगे उसके बाद ही वह अफगानिस्तान की सरकार से इस पर बातचीत करेगा.

डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा बातचीत शुरू करने की घोषणा के बाद अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी के प्रवक्ता सादिक सिद्दीकी ने मीडिया से बातचीत में कहा, ‘डोनाल्ड ट्रंप की संक्षिप्त यात्रा महत्वपूर्ण थी, लेकिन अभी हमें देखना होगा कि शांति वार्ता की शर्तों में कुछ बदलाव हुआ है या नहीं....अभी इस मसले पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगा.’

डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों ने भी वाशिंगटन पोस्ट से बातचीत में तालिबान के संघर्ष विराम पर तैयार हो जाने जैसी कोई जानकारी नहीं दी. एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना था, ‘जैसा कि राष्ट्रपति ने कहा, हम तालिबान से फिर बातचीत शुरू करने जा रहे हैं, हमारा सबसे ज्यादा ध्यान हिंसा कम करने पर रहेगा.....यदि (शुरुआत में) सहमति बनती है तो दोनों पक्ष बातचीत को आगे बढ़ाएंगे और शांति समझौते पर हस्ताक्षर की दिशा में आगे बढ़ेंगे.’

तालिबान, अफगान सरकार और अमेरिकी राष्ट्रपति प्रशासन के अधिकारियों की इन बातों से साफ़ है कि डोनाल्ड ट्रंप ने अपने संबोधन में जो भी कहा उसमें बातचीत शुरू करने की घोषणा के अलावा सब झूठ था.

अमेरिका और तालिबान के बीच बातचीत की जानकारी रखने वाले एक अधिकारी अमेरिकी मीडिया से बातचीत में कहते हैं, ‘तालिबान ने युद्ध विराम का पूरी ताकत से विरोध किया है क्योंकि इससे उसे सबसे ज्यादा लाभ हो रहा है... उसके पास झुकने की कोई वजह नहीं है. विशेष रूप से ऐसे समय में जब अमेरिका की मोलभाव करने की क्षमता पूरी तरह खत्म हो चुकी है.’ इस अधिकारी के मुताबिक जब तालिबान युद्ध के मैदान पर लगातार जीत रहा है, अफगानिस्तान के 50 फीसदी से ज्यादा हिस्से पर उसका कब्जा हो चुका है और ट्रंप का प्रमुख एजेंडा किसी भी तरह अपनी सेना को वापस बुलाना है तो फिर वह संघर्ष विराम की पेशकश क्यों करेगा?

विश्लेषक मानते हैं कि अगर डोनाल्ड ट्रंप थोड़ा धीरज और समझदारी दिखाते तो इस मसले को बेहतर ढंग से डील कर सकते थे. इन लोगों के मुताबिक जिस तरह से पहले बातचीत तोड़ी गयी और फिर दोबारा शुरू की जा रही है, उससे अमेरिका का पक्ष कमजोर हो गया है और मोलभाव करने की ताकत तालिबान के हाथ में आ गयी है.

लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ऐसा कर क्यों रहे हैं? क्यों वे किसी भी कीमत पर तालिबान से बातचीत करना और उसका डंका पीटना चाहते हैं. अमेरिकी जानकारों की मानें तो इसकी वजह यह है कि उन्होंने पिछले राष्ट्रपति चुनाव में वादा किया था कि वे अगले चार सालों में अमेरिकी फ़ौज को अफगानिस्तान से वापस निकाल लेंगे. अमेरिका में अगले साल ही फिर राष्ट्रपति चुनाव है जिसमें डोनाल्ड ट्रंप फिर से मैदान में हैं. ऐसे में उन पर इस चुनाव से पहले ही अपना वादा पूरा करने का दबाव है. ट्रंप चाहते हैं कि तालिबान से जल्द समझौता हो जिससे वे अमेरिका की फ़ौज को अफगानिस्तान से वापस बुला पाएं.

बातचीत के अलावा डोनाल्ड ट्रंप के पास जो विकल्प बचते हैं उनमें पहला यह है कि अमेरिका तालिबान के खिलाफ और ज्यादा ताकत से लड़े. लेकिन इससे ट्रंप के आगे और ज्यादा परेशानियां खड़ी हो जाएंगी. जानकार कहते हैं कि अब अगर अमेरिका और ज्यादा ताकत से तालिबान से लड़ता है तो वह अपनी सेना को एक अंतहीन युद्ध की ओर धकेल देगा. ऐसा इसलिए होगा क्योंकि जब तालिबान का कब्जा अफगानिस्तान के केवल 15 फीसदी हिस्से पर ही था और एक लाख से ज्यादा अमेरिकी सैनिक वहां तैनात थे, तब भी अमेरिका इस संगठन को वहां से नहीं हटा सका. ऐसे में यह काम करना कितना मुश्किल है, समझा जा सकता है.

जंग जारी रखने से डोनाल्ड ट्रंप के सामने एक मुसीबत यह भी होगी कि जब युद्ध में अमेरिकी सैनिक मारे जायेंगे तो इसका ठीकरा उनके ही सर पर फोड़ा जाएगा. जाहिर है कि इसका खामियाजा उन्हें अगले चुनाव में उठाना पड़ेगा.

डोनाल्ड ट्रंप के पास एक और विकल्प तालिबान से बिना समझौता किए ही अमेरिकी फौज को वापस बुलाने का भी है. लेकिन उस स्थिति में भी अमेरिका के आगे और ज्यादा परेशानियां खड़ी हो जाएंगी. इससे दुनिया भर में उसकी साख को भारी नुकसान होगा. अफगान सरकार अमेरिका के समर्थन से चल रही है, ऐसे में उसे इस तरह से बीच मंझधार में छोड़ने के बाद आगे कोई भी देश अमेरिका पर भरोसा नहीं करेगा.

अमेरिकी विदेश मंत्रालय के कई पूर्व अधिकारियों का मानना है कि बिना समझौते के अमेरिका के अफगानिस्तान से निकलने के बाद वहां गृहयुद्ध छिड़ना स्वाभाविक है. तालिबान अब इतना ताकतवर हो चुका है कि अमेरिका के जाने के बाद, वह वर्तमान अफगान सरकार को हटाकर चंद दिनों में ही अफगानिस्तान पर अपना कब्जा जमा लेगा. इसका नतीजा यह होगा अफगानिस्तान फिर अमेरिका सहित पूरी दुनिया के लिए बड़ा खतरा बन जाएगा. क्योंकि तब इसे अलकायदा जैसे संगठनों की शरणस्थली बनने से कोई नहीं रोक सकेगा.

अफगानिस्तान मामलों के जानकार कहते हैं कि यह स्थिति वैसी ही होगी जैसी 2001 के पहले थी, तब तालिबान ने अफगानिस्तान में अपनी सरकार बना ली थी और अलकायदा जैसे संगठनों के लिए यह देश स्वर्ग बन गया था. उस समय अमेरिका को ही 11 सितंबर के आतंकी हमले के रूप में इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी. इन जानकारों के मुताबिक अफगानिस्तान में दोबारा ऐसी स्थिति न बने इसीलिए अमेरिका 18 सालों से वहां लड़ रहा है. अब अगर डोनाल्ड ट्रंप वहां से अपनी सेना को बिना किसी समझौते के बुला लेते हैं तो पूरी दुनिया पर इसके असर को समझना मुश्किल नहीं है.

यानी साफ है कि वर्तमान परस्थितियां ऐसी हैं जिनमें अमेरिका अफगानिस्तान में न तो लड़कर और न ही पीछे हटकर कुछ हासिल कर सकेगा. अब उसके पास केवल और केवल तालिबान से बातचीत करने का विकल्प ही बचता है. लेकिन डोनाल्ड ट्रंप जिस तरह से यह रहे हैं वह अमेरिका के सामने नई मुसीबतें खड़ी कर रहा है.