भारत के आर्थिक जगत के पास इस समय बहुत सुर्खियां हैं. आर्थिक मंदी, लगातार गिरती विकास दर वगैरह, वगैरह. लेकिन, पिछले दिनों उद्योगपति राहुल बजाज की कही बातों ने कुछ ऐसी सुर्खियां बटोरीं कि अर्थव्यवस्था पर होने वाले विमर्शों की धारा उसी तरफ मुड़ गई. विपक्ष को बैठे-बिठाये एक जोरदार मुद्दा मिल गया और मीडिया-सोशल मीडिया पर इसको लेकर जोरदार बहस चली.

मुंबई में हुए एक आर्थिक समाचार पत्र के कार्यक्रम के सवाल-जवाब सेशन में राहुल बजाज ने जो कुछ कहा उसका मोटा-मोटा मतलब यह था कि लोग (खासकर कॉरपोरेट्स) सरकार की आलोचना करने से डरते हैं क्योंकि मौजूदा भाजपा सरकार इसे लेकर बहुत सकारात्मक नहीं है. इसी बहाने उन्होंने प्रज्ञा ठाकुर को टिकट दिए जाने, उन्हें डिफेंस कमेटी में लिए जाने और उनके बयान पर कार्रवाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति किए जाने की बात भी उठाई. हालांकि, राहुल बजाज ने यह भी कहा कि आप अच्छा काम कर रहे हैं, लेकिन आलोचना सुनने के बारे में आपका रवैया सकारात्मक नहीं है. शायद उनका ध्यान नीतियों की आलोचना से ज्यादा सरकार की कार्यप्रणाली की ओर था.

मॉब लिंचिंग, प्रज्ञा ठाकुर और आलोचना को लेकर सरकार के रवैये से संबंधित जो सवाल उन्होंने उठाए उनमें से कोई विशुद्द रूप से आर्थिक मसले से संबंधित नहीं था. राहुल बजाज द्वारा उठाई गईं ज्यादातर बातों का स्वरूप सामाजिक-राजनीतिक था. लेकिन, चूंकि मसला कॉरपोरेट जगत के एक दिग्गज की तरफ से देश के गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में उठाया गया था तो चर्चा अर्थ जगत, सरकार की कार्यप्रणाली, उद्योग जगत और सरकार के बीच संबंधों को लेकर केंद्रित हो गई. राहुल बजाज के बयान पर चर्चा थमी भी नहीं थी कि बायोकॉन की चेयरमैन किरण मजूमदार शॉ ने भी कहा कि सरकार को सिर्फ समर्थकों के बजाय सभी की बात सुननी चाहिए. उन्होंने कहा कि सरकार को सुझावों का स्वागत करना चाहिए और हमेशा अलोचना को सरकार विरोधी या राष्ट्र विरोधी नहीं बताना चाहिए.

राहुल बजाज और किरण मजूमदार शॉ पहले भी कई बार सरकार की कई बातों से असहमति जाहिर कर चुके हैं. लेकिन इस बार अपनी बातों को उन्होंने ज्यादा स्पष्टता से कहा तो वह दूर तलक पहुंची. सवाल उठता है कि कहीं दबे-छुपे स्वर में और कहीं खुले स्वर में कॉरपोरेट जगत मोदी सरकार के प्रति अपना असंतोष क्यों जता रहा है? राहुल बजाज के बाद उद्योगपति हर्ष गोयनका ने भी इसी मसले पर एक कविता ट्वीट की. कविता कुछ यूं थी - राजा बोला रात है/ रानी बोली रात है/ मंत्री बोला रात है/ संतरी बोला रात है/ यह सुबह-सुबह की बात है. हालांकि बाद में उन्होंने इस ट्वीट को डिलीट कर दिया. यह बातें इसलिए भी मौजूं हैं क्योंकि अभी हाल ही में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी अपने लेख में इस बात का जिक्र किया था कि कॉरपोरेट जगत के कई लोगों ने उनसे डर के माहौल की बात कही है.

अगर, फिलहाल की बातों को छोड़ दिया जाए तो परंपरागत तौर पर भाजपा को व्यवसाय और उद्योग जगत के लिहाज से अच्छी पार्टी माना जाता है. बहुत सारे आर्थिक विश्लेषक आज भी मानते हैं कि एनडीए की वाजपेयी सरकार के दौरान देश में सबसे तेजी से आर्थिक सुधार के कार्यक्रम लागू हुए. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद कॉरपोरेट जगत से हमेशा उनके लिए सराहना के स्वर ही उठे. बिजनेस जगत के ज्यादातर लोगों का मानना था कि मोदी तेजी से फैसले लेने वाले प्रधानमंत्री हैं और वे यूपीए-2 की सरकार के दौरान नीतियों में आ गई पंगुता को दूर करेंगे.

पहले कार्यकाल की शुरुआत में मोदी ने इस उम्मीद को कुछ जगाया भी. इनकम टैक्स से लेकर, अन्य कर सुधारों के बारे में इस तरह की बातें की गईं कि कारोबार जगत को एक उम्मीद जगी. प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि वे ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ में विश्वास रखते हैं. इस बात का विश्लेषण इस रूप में निकाला गया कि शायद मोदी सरकार कारोबार को बेहतर माहौल देने और कम से कम हस्तक्षेप में विश्वास में रखती है.

कॉरपोरेट जगत के प्रति मोदी सरकार के नर्म रवैये को लेकर कुछ ऐसी धारणा बनी कि विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने मोदी सरकार को ‘सूट-बूट की सरकार’ कहना शुरु कर दिया. लेकिन, कॉरपोरेट जगत पर मोदी सरकार का जादू बरकरार रहा. यहां तक कि 2016 में नोटबंदी के फैसले की भी कई उद्योगपतियों ने सराहना ही की. कुछ आपत्तियां भी उठीं तो नोटबंदी के क्रियान्यवन को लेकर बाकी इसे अवधारणा के तौर पर ठीक ही बताया गया.

नोटबंदी और जीएसटी मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में दो बड़े आर्थिक फैसले थे. इस बात में कोई शक नहीं है कि दोनों बड़ी राजनीतिक इच्छाशक्ति से लिए गए थे. लेकिन ऐसे बड़े फैसलों से पहले जो विचार-विमर्श होना चाहिए था, उसकी शायद जरूरत नहीं समझी गई. नोटबंदी और जीएसटी लागू होने के बाद ही पूरे देश में लघु और मध्यम उद्योगों की कमर टूटनी शुरु हो गई, जिसकी गिरफ्त में अर्थव्यवस्था आज भी है. अर्थव्यवस्था में गिरावट के संकेत मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के तीन साल बाद ही दिखने शुरु हो गए थे, लेकिन सरकार यह मानने को तैयार नहीं थी.

आर्थिक जानकार मानते हैं कि जीएसटी और नोटबंदी का अर्थव्यवस्था पर क्या फर्क पड़ा, यह अलग बात हो सकती है, लेकिन इन फैसलों के लेने में एक राजनीतिक आत्मविश्वास तो था ही. लेकिन, मोदी सरकार ऐसा ही आत्मविश्वास बाकी आर्थिक मोर्चों पर दिखा रही थी ऐसा भी नहीं था. मसलन, पहली मोदी सरकार में आरबीआई के गवर्नर के तौर पर रघुराम राजन के कार्यकाल विस्तार के लिए प्रधानमंत्री मोदी और तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली दोनों राजी थे, लेकिन फिर संघ की स्वदेशी लॉबी के दबाव में उन्हें जाने दिया गया. बाद में सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रमण्यम, मोदी सरकार द्वारा नीति आयोग के उपाध्यक्ष बनाए गए अरविंद पनगढ़िया और आरबीआई के नये गवर्नर उर्जित पटेल ने भी अपनी राह पकड़ ली. इस दौरान राजनीतिक-सामाजिक मसलों पर मुखर मोदी सरकार आर्थिक चुनौतियों से लगातार मुंह चुरा रही थी. जब नोटबंदी के नुकसान सामने आने लगे तो उसने बहुत आक्रामक तरीके से इसे डिजिटल और साफ-सुथरे कारोबार से जोड़ दिया.

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के खत्म होने के साथ-साथ आर्थिक संकट गहराने लगा. ऊपर से चुनावी मजबूरियां भी सामने आकर खड़ी हो गई थीं. कांग्रेस उस समय रफाल विवाद को तो हवा दे ही रही थी आर्थिक मोर्चे पर अपना समाजवादी रुख भी दिखा रही थी. मोदी सरकार पर उद्योगपतियों की मित्र सरकार होने का आरोप लगाते हुए उसने यूनिवर्सल बेसिक इनकम जैसी योजनाओं के वादे करने शुरु कर दिए. चुनाव में जा रही मोदी सरकार इसके चलते दबाव में आई और उसे अपने अंतरिम बजट में किसानों को नकद सहायता देने वाली पीएम-किसान योजना की घोषणा करनी पड़ी. इससे पहले कॉरपोरेट और अर्थ विशेषज्ञों में यह धारणा थी कि मोदी सरकार आर्थिक मोर्चे पर बहुत लोक-लुभावन घोषणायें नहीं करती हैं. लेकिन, पीएम-किसान ने इस धारणा को तोड़ा. लेकिन, फिर भी उस समय ग्रामीण क्षेत्रों में तेजी से घटती खपत के चलते पीएम-किसान पर बहुत सवाल नहीं उठे और कारोबार जगत ने भी इसे आर्थिक सुस्ती दूर करने के उपाय के तौर पर ही लिया.

अपने चुनावी वादे और आर्थिक संकट से निपटने के लिए अब सरकार को धन की जरूरत थी. इसके चलते उसे आरबीआई के सरप्लस से रकम लेने के लिए अच्छे-खासे विवाद को न्योता देना पड़ा. इससे रिजर्व बैंक की साख पर भी सवाल उठे. कुछ लोगों के मुताबिक तमाम अर्थशास्त्रियों का सरकार को छोड़ना और आरबीआई विवाद बताता है कि वह कहने में भले ही ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ की बात कर रही थी, लेकिन व्यवहार में इसके उलट थी.

आर्थिक जानकार मानते हैं कि पहले कार्यकाल में मोदी सरकार की सिर्फ छवि ही उद्योग जगत की हितैषी की थी, वह असल में आर्थिक सुधारों के प्रति उतनी प्रतिबद्ध नहीं थी. बल्कि ‘सूट-बूट की सरकार’ और ‘अंबानी-अडाणी’ जैसे जुमलों के बाद वह कुछ अतिरिक्त सतर्क ही हो गई थी. इन वजहों से मोदी सरकार ने अपनी छवि ईमानदार और ‘पुरानी गड़बड़ियों को दूर करने वाली सरकार’ की दिखानी शुरु कर दी. इसने आर्थिक सुधार के बजाय एक तरह के इंस्पेक्टर राज को जन्म देना शुरु कर दिया. नीरव मोदी और विजय माल्या के विदेश भाग जाने के बाद सरकार पर ऐसा दबाव बना कि उसने उद्योग जगत के हर तरह के कर्जों पर सख्ती शुरु कर दी.

यह तो मोदी सरकार के पहले कार्यकाल की बात थी. लेकिन दूसरे कार्यकाल में मोदी सरकार राष्ट्रवाद के रथ पर सवार होकर पहले से भी सशक्त बहुमत के साथ लौटी. प्रचंड बहुमत के साथ लौटी सरकार के सामने आर्थिक मंदी, ऑटो सेक्टर में लगातार गिरती बिक्री की खबरें आ रही थीं. चुनावी चिंतायें खत्म हो चुकी थीं, ऐसे में माना जा रहा था कि अब सरकार आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए सुधारों की सख्त सड़क को पकड़ेगी. उद्योग जगत उम्मीद कर रहा था कि सरकार अब खपत और निवेश बढ़ाने वाला ऐसा बजट पेश करेगी, जिससे कॉरपोरेट जगत की उम्मीदें परवान चढ़ेंगी. लेकिन, लगातार दूसरी बार शानदार बहुमत के साथ लौटी मोदी सरकार ने शायद मान लिया था कि यह जीत आर्थिक मोर्चे पर नरमी के बावजूद इसलिए मिली है क्योंकि उसने अपने सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों के साथ लोक-कल्याणकारी नीतियों का रास्ता पकड़ा है.

इस वजह से पहली पूर्णकालिक महिला वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का बजट समाजवादी दौर वाला ही था. इसमें सालाना पांच करोड़ से ज्यादा कमाने वालों पर सुपर रिच टैक्स आयद किया गया था. गिरती खपत के कारण उम्मीद की जा रही थी कि आयकर घटाया जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया गया. कॉरपोरेट जगत पर सख्ती का आलम यह था कि सीएसआर (कॉरोपोरेट सोशल रिस्पॉन्सबिलिटी) में अनियमितता पर आपराधिक कानून तक का प्रावधान कर दिया गया. सरकार बार-बार यह संदेश देने की कोशिश में लगी थी कि कारोबारी गड़बड़ियों को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और आयकर विभाग के कई दागी अधिकारियों को जबरिया रिटायर करने की खबरें भी प्रमुखता से छपीं. आदर्श रूप में यह कवायद सराहनीय ही थी, लेकिन व्यवहारिक रूप में इसने ऐसा संदेश दिया कि टैक्स-टेरर जैसी बातें सर उठाने लगीं.

कॉरपोरेट जगत ने आर्थिक मंदी के मोर्चे पर सरकार की बेरूखी और टैक्स जांचों को लेकर उसकी सख्ती पर दबे स्वर में एतराज करना शुरु किया. सीसीडी के मालिक वीजी सिद्धार्थ की आत्महत्या और उनके द्वारा छोड़े गए एक पत्र के बाद टैक्स टेरर की बातों को और भी बल मिलना शुरू हो गया. इशारों में ईडी, इनकम टैक्स और सेबी की अतिरिक्त सक्रियता की बातें कहीं जाने लगीं. अपने अफसरों और मंत्रियों के अति आक्रामक रूख के कारण भी मोदी सरकार की मुश्किलें बढ़ रही थीं. बायोकॉन की अध्यक्ष किरण मजूमदार शॉ ने कुछ समय पहले यह खुलासा भी किया था कि वीजी सिद्धार्थ की आत्महत्या के बाद टैक्स टेरर को लेकर उन्होंने जो ट्वीट किया था, उस पर उन्हें यह सलाह दी गई थी कि उन्हें ऐसी बातें बोलने से बचना चाहिए. किरण मजूमदार शॉ ने कहा कि यह सलाह के साथ-साथ एक चेतावनी भी थी.

आर्थिक जानकार कहते हैं कि यह महज एक उदाहरण है, लेकिन इससे उद्योग जगत की बेचैनी को समझा जा सकता है. ऊपर से लगातार सुस्त होता कारोबार उद्योग जगत की खीझ और बढ़ा रहा था. जैसे सरकार के पांच ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था बना देने की बात पर राहुल बजाज ने ही पहले कहा था कि न निवेश हो रहा है और न खपत बढ़ रही है तो पांच ट्रिलियन इकॉनमी क्या आसमान से टपकेगी. उद्योगपति आदि गोदरेज ने भी एक कार्यक्रम में शिकायती लहजे में कहा था, ‘कश्मीर और अन्य तमाम जटिल मसले पर तो सरकार तेजी से फैसले ले रही है, लेकिन आर्थिक मोर्च पर ऐसा नहीं है.’ टेलीकॉम सेक्टर में कंपनियों के पुराने बकाए पर अदालत के फैसले के बाद भी उथलपुथल मची और वोडाफोन के सीईओ ने भी भारत में कारोबार को मुश्किल बता दिया. लेकिन, सरकार की तरफ से चीजों को साफ करने के बजाय आक्रामक रूख ही रखा गया.

लेकिन, हर तिमाही आर्थिक विकास की घटती दर और चालू वित्तीय वर्ष में विकास दर के पांच फीसद रहने के अनुमान की खबरों के चलते बहुत दिनों तक यह आक्रामकता बरकरार नहीं रही. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पहले तो बजट के प्रावधानों को लेकर सख्ती दिखाई, लेकिन बाद में चरणबद्ध तरीके से बजट के लगभग सारे सख्त प्रावधान वापस ले लिए. लेकिन, इससे न तो निवेश बढ़ता दिखा और न कारोबार जगत में ही बहुत खुशी दिखी. यहां तक कि क़ॉरपोरेट टैक्स में एक झटके में की गई बड़ी कटौती का भी कुछ असर नहीं दिखा और कंपनियों में ज्यादातर ने इससे अपनी बैलेंसशीट ही सुधारी. जबकि यह कॉरपोरेट जगत की बरसों पुरानी मांग थी.

उद्योग जगत की नाराजगी की बड़ी वजह यह थी कि कारोबारी सौदों को संदेह की निगाह से देखने और उनके राजनीतिक रंग ले लेने के कारण इंस्पेक्टर राज ने इस सरकार में नए सिरे से वापसी की. जानकार मानते हैं कि सरकार की ओर से भले ही ऐसा कुछ न कहा गया हों, लेकिन नौकरशाही मौके का फायदा उठाकर अपना दबदबा कायम कर ही लेती है.

मतलब कारोबार जगत में सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर एक बेचैनी पहले से ही थी और गाहे-बगाहे वह बाहर भी आ रही थी. सरकार इन आरोपों से भी घिरी कि वह केवल अपने समर्थक उद्योगपतियों को ही लाभ पहुंचा रही है. हालांकि, आर्थिक जानकारों का इस बारे में कहना है कि इस तरह की बातें हर सरकार के बारे में होती हैं और वह आंशिक तौर पर ही सच होती हैं. कुछ उद्योगपतियों को तरजीह मिलने से ज्यादा बड़ा सवाल यह है कि सरकार का पूरे उद्योग जगत के प्रति सामान्य रूख क्या है? जानकार मानते हैं कि मोदी सरकार के दूसरा कार्यकाल आर्थिक मंदी के साथ शुरु हुआ. लेकिन सरकार का रवैया ऐसा रहा, जिससे उद्योग जगत सामान्य तौर पर निराश हुआ. और अब यही निराशा उसके बयानों में झलकने लगी है.

जानकार मानते हैं कि इस निराशा का एक सिरा इस बात में छिपा है कि राहुल बजाज के बयान के बाद सरकार के मंत्रियों की प्रतिक्रिया किस तरह की रही. राहुल बजाज ने जो कहा उस दौरान गृहमंत्री अमित शाह वहां बैठे थे और उनकी प्रतिक्रिया काफी हद तक संयमित थी. अमित शाह ने कहा कि डर का कोई माहौल नहीं है और अगर आप ऐसा कह रहे हैं तो हम कोशिश करेंगे कि माहौल बेहतर हो.

लेकिन, इसके बाद भाजपा समर्थकों ने राहुल बजाज को ट्रोल करना शुरु कर दिया. यहां तक कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण तक ने ट्वीट करके कहा कि इस तरह अपनी निजी राय का प्रचार करना राष्ट्रहित में नहीं है. भाजपा सांसदों ने राहुल बजाज पर तंज किए कि उनकी मिलों पर किसानों का हजारों करोड़ों का बकाया है, ऐसे में वह डरेंगे तो हैं ही. जानकारों का मानना है कि सत्ताधारी राजनीतिक तंत्र में ऐसी आक्रामकता बहुतों को क्षुब्ध कर रही है और उनमें उद्योगपति भी शामिल हैं.

बजट के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले से देश के उद्योगपतियों को आशवस्त कर चुके हैं. तब उन्होंने कहा था कि कारोबारियों को शक की निगाह से नहीं देखा जाना चाहिए. शायद, इस समय फिर एक बार देश के उद्योगपतियों को ऐसे ही आश्वासन की जरूरत है.