निर्देशक: आशुतोष गोवारीकर
लेखक: चंद्रेशेखर धवलीकर, रंजीत बहादुर, आदित्य रावल, आशुतोष गोवारीकर
कलाकार: अर्जुन कपूर, कृति सेनॉन, संजय दत्त, मोहनीश बहल, ज़ीनत अमान, पद्मिनी कोल्हापुरी
रेटिंग: 3/5

शाहरुख खान की फिल्म बाज़ीगर ने हमें एक कालजयी लाइन दी है - ‘हारकर जीतने वाले को बाज़ीगर कहते है.’ ‘पानीपत’ इसी बात को ज़रा दूसरे अंदाज में दोहराती है और कहती है कि कहानी का हीरो हमेशा जीतने वाला ही नहीं होता है. पानीपत की तीसरी लड़ाई पर बनी यह फिल्म मराठों को जीतते हुए तो दिखा नहीं सकती थी. लेकिन इसकी भरपाई वह उनकी अविश्वसनीय बहादुरी को दिखाकर करती है. फिर भी इस बात के लिए ‘पानीपत’ की तारीफ की जानी चाहिए कि ऐसा करते हुए भी वह ज्यादातर समय ऐतिहासिक तथ्यों के आस-पास ही रहती है.

फिल्म की सबसे अच्छी बात यह है कि युद्ध से जुड़े तथ्यों के अलावा, इससे जुड़े कम ज़रूरी किस्सों और किरदारों की प्रमाणिकता पर भी वह ठीकठाक ध्यान देती है. उदाहरण के लिए यह नाना साहेब पेशवा की पत्नी गोपिका बाई द्वारा राजकाज में दी जाने वाली दखल और घरेलू पॉलिटिक्स को बगैर मिर्च-मसाला लगाए वह अपना हिस्सा बनाती है. इसी तरह इस युद्ध के बाद अहमद शाह अब्दाली के दोबारा भारत न लौटने की वजह वह सिर्फ मराठों की वीरता को ही नही बताती है. पानीपत इसके लिए अफगानिस्तान में बिगड़ी राजनीतिक परिस्थितियों की भी बात करती है. ऐतिहासिक तथ्यों के करीब लगने वाले ये सीक्वेंस फिल्म के ईमानदार होने का परिचय देते हैं.

पटकथा की और खासियतों पर गौर करें तो लड़ाई की मूलकथा तक पहुंचने के दौरान फिल्म पेशवाओं के आपसी मनभेदों की झलक भी दिखाती है और मराठा, राजपूत और अन्य भारतीय राजाओं की आपसी खींचतान का जिक्र भी करती है. ऐसा करके फिल्म एक तीर से दो निशाने लगाती है. पहला यह कि फिल्म तमाम रियासतों और उनसे जुड़ी घटनाओं का जिक्र कर खुद को प्रमाणिक बना लेती है. और दूसरा, बोनस की तरह देशभक्ति और एकता का सबक भी याद दिला देती है. ‘पानीपत’ की अच्छी बात यह है कि वक्त की मांग को समझते हुए यह कई मौकों पर इशारों-इशारों में यह ज़रूरी बात भी कहती है कि मुसलमान भले ही बाहर से आकर भारत में बसे हों लेकिन इस देश के अनोखा बनने, और बने रहने में उनका भी बड़ा योगदान है. इसके अलावा फिल्म ऐसी कई राजनीतिक सीखों को भी खुद में शामिल करती है, जिन्हें हमारे आज से जोड़कर देखा जा सकता है.

अभिनय की बात करें तो अर्जुन कपूर ने मराठा योद्धा के इस अवतार के लिए खूब मेहनत की है और यह स्क्रीन पर बखूबी नज़र भी आता है. फिल्म में वे जिस तरह से तलवार-भाला चलाते हुए दिखाई देते हैं, वह उन्हें दर्शनीय बना देता है. लेकिन संवाद बोलते हुए उनके अर्बन लहज़े का न छूट पाना, थोड़ा खटक जाता है. उनके अपोजिट नज़र आ रही कृति सैनॉन अपने छोटे से रोल में ही काफी बढ़िया अभिनय करके आपको चौंका देती हैं. उनका मराठी लहजा खास तौर पर ध्यान खींचता है जिसे उन्होंने मुंबई में ही जन्मे अर्जुन कपूर की तुलना में कहीं ज्यादा सहजता से अपनाया है. इनके अलावा, पद्मिनी कोल्हापुरी और ज़ीनत अमान को उनकी कैमियो भूमिकाओं में देखना भी अच्छा महसूस करवाता है.

फिल्म में अहमद शाह अब्दाली की भूमिका निभा रहे संजय दत्त अपने लुक्स से तो ‘पद्मावत’ के खिलजी की याद दिलाते हैं लेकिन अभिनय उससे एकदम अलग और प्रभावित करने वाला करते हैं. लेकिन उनके किरदार को खिलजी जितनी तवज्जो और स्क्रीन स्पेस नहीं मिलता है. यहां पर संजय दत्त के बढ़िया अभिनय के बाद भी, अब्दाली के बारे में जो एक बात और खटकती है, वह उसकी भाषा है. इस किरदार से जिस तरह की उर्दू बुलवाई गई है, उससे इसके अफगान होने का यकीन नहीं हो पाता है.

फिल्म के बाकी पक्षों की बात करें तो इसमें इस्तेमाल किए गए कम्पयूटर ग्राफिक्स थोड़ा आउटडेटेड लगते हैं और कई बार पैबंद की तरह नज़र आते हैं. युद्ध के भव्य दृश्यों में यह कमी उभरकर सामने आती है. साथ ही, इसका फिल्मांकन भी औसत दर्जे का ही कहा जाएगा जो वॉर फिल्म के लिहाज से एक बड़ी कमी कही जा सकती है. संगीत पर आएं तो अजय-अतुल का संगीत सुरीला तो है लेकिन यह फिल्म के मूड से पूरी तरह मेल नहीं खाता है. लेकिन इन खामियों के बावजूद आशुतोष गोवारीकर का सधा हुआ निर्देशन इसे एक ज़रूर देखी जाने वाली फिल्म बनाने में सफल हो जाता है.