राजनीति को संभावनाओं का खेल कहा जाता है. लेकिन फिर भी कुछ ऐसी संभावनाएं होती हैं जिनके बारे में यह लगता है कि ऐसा होना बेहद मुश्किल है. कट्टर हिंदुत्व की पहचान रखने वाली शिवसेना और धर्मनिरपेक्षता की बात करने वाली कांग्रेस के बारे में यह सोचना तक मुश्किल था कि ये दोनों भी मिलकर कभी सरकार चलाएंगे.

किसी खास मुद्दे पर इस तरह की धुर विरोधी पार्टियों का साथ आना कई बार हुआ है. उदाहरण के तौर पर आपातकाल के वक्त शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने ही उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का साथ दिया था. ऐसे ही राष्ट्रपति चुनावों को लेकर कुछ मौके ऐसे आए, जब शिवसेना ने अपनी सहयोगी भारतीय जनता पार्टी से अलग लाइन लेते हुए कांग्रेस के उम्मीदवार का समर्थन किया.

लेकिन महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद जिस तरह से शिव सेना, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी एक साथ आ गए वह एकाध मुद्दे को लेकर थोड़ी देर के लिए साथ आ जाने से बहुत बड़ी बात है. भारतीय राजनीति में जब कांग्रेस एक वक्त पर बहुत मजबूत थी तब उसे रोकने के लिए विभिन्न राजनीतिक दल वैचारिक दूरियों के बावजूद इसी तरह से एक साथ आकर सरकार बनाया करते थे. आज कांग्रेस की जगह भाजपा ने ले ली है.

लेकिन जिस तरह का गठबंधन महाराष्ट्र में बना क्या उस तरह का कोई गठबंधन राष्ट्रीय स्तर पर भी संभव है? इस बारे में देश की राजनीति को लंबे समय से देखने-समझने वाले लोगों से बात करने पर दोनों तरह की बातें आ रही हैं. कुछ लोग ऐसे हैं जो ऐसी किसी संभावना को सिरे से खारिज कर रहे हैं. वहीं कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें लगता है कि जिस तरह की भूमिका महाराष्ट्र में शरद पवार ने निभाई और उन्हें कांग्रेस की ओर से जिस तरह की छूट दी गई, अगर उसी तरह की पहल वे राष्ट्रीय स्तर पर करते हैं तो वहां भी भाजपा के खिलाफ गंठबंधन खड़ा किया जा सकता है.

कांग्रेस के नेताओं से बात करने पर पता चलता है कि उसके अधिकांश नेता इस बात में यकीन करने वालों में से हैं. इस बारे में पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘जिस तरह की राजनीतिक परिस्थितियां अभी हैं, उसमें गठबंधन का मूल लक्ष्य भाजपा को रोकने का होना चाहिए. अगर गठबंधन बनने के पहले से ही सफलता की स्थिति में नेतृत्व हासिल करने के लिए संघर्ष होगा तो यह गठबंधन चल नहीं पाएगा. आज भाजपा के पास जितना मजबूत प्रचार तंत्र है, उसकी मदद से वह ऐसे किसी भी गठबंधन को लोगों की नजर में बदनाम कर देगी और यह साबित कर देगी कि वहां तो प्रधानमंत्री पद के कई उम्मीदवार हैं.’

वे आगे कहते हैं, ‘कोई भी ऐसा गठबंधन तब चलेगा जब कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की ओर से पहले ही अपने सहयोगियों को बता दिया जाए कि पहला लक्ष्य भाजपा को रोकना है और इस गठबंधन को सफलता मिलने के बाद नेतृत्व के मसले को आपस में सहमति बनाकर सुलझाया जाएगा. कांग्रेस को यह स्पष्ट संकेत देना होगा कि वह इसके नेतृत्व पर कब्जा नहीं जमाना चाहती है. इसके लिए जरूरी होगा कि शरद पवार जैसे नेता संयोजन के काम में लगें. महाराष्ट्र में जिस तरह से उन्होंने एक असंभव सा दिखने वाला गठबंधन तैयार किया है, उस वजह से उनके प्रति राजनीतिक वर्ग में एक बार फिर से सम्मान और भरोसे का माहौल बना है. मुद्दों के मसले पर भी भाजपा विरोधी सभी दलों को आपस में सहमति बनानी होगी. क्योंकि जाहिर है कि विभिन्न दल एक साथ आएंगे तो कुछ मौकों पर उनमें असहमति भी होगी. ऐसे मौकों पर मुद्दे ही इन दलों को आपस में बांधकर रख पाएंगे.’

वहीं भाजपा के खेमे में बात की जाए तो इस खेमे के नेताओं को लगता है कि ऐसा कोई गठबंधन बन ही नहीं सकता. पार्टी के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी इस बारे में कहते हैं, ‘महाराष्ट्र में एक बेमेल गठबंधन बना है. यह गठबंधन कब तक चलेगा, कहा नहीं जा सकता है. जो दल एक साथ आकर सरकार चला रहे हैं, उनमें वैचारिक समानता नहीं है. कर्नाटक में कांग्रेस और जनता दल सेकुलर में वैचारिक समानता के बावजूद सरकार नहीं चल पाई तो ऐसे में महाराष्ट्र में तो सरकार कभी भी गिर सकती है. शरद पवार की अपनी एक भूमिका है लेकिन कब तक उनकी बात शिवसेना और कांग्रेस सुनते रहेंगे, यह भी देखने वाली बात होगी.’

राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी किसी संभावना के बारे में वे कहते हैं, ‘मेरा अपना मानना है कि छह महीने से लेकर साल भर तक सभी विपक्षी दल महाराष्ट्र के प्रयोग को देखेंगे. जल्दबाजी में ऐसा कोई गठबंधन राष्ट्रीय स्तर पर तैयार करने की कोशिश नहीं होगी. अगर महाराष्ट्र में यह गठबंधन साल भर चल गया और कोई बड़े मतभेद नहीं हुए तो फिर राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी कोई कोशिश हो सकती है. लेकिन यहां इस बात का भी ध्यान रखना जरूरी है कि महाराष्ट्र में तो शरद पवार की जो राजनीतिक हैसियत है, उसमें उनकी बात हर कोई सुनता है. लेकिन क्या राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस उन्हें इतनी छूट देगी. अगर कांग्रेस उन्हें छूट देती भी है तो क्या विभिन्न राजनीतिक दलों के लोग उनकी बातों को उसी तरह से सुनेंगे जिस तरह से महाराष्ट्र के विभिन्न दलों ने सुना. मुझे लगता है कि विपक्ष में अलग-अलग क्षेत्रीय नेताओं की अलग-अलग आकांक्षाएं हैं और इस वजह से ऐसे किसी गठबंधन की संभावना राष्ट्रीय स्तर पर नहीं है.’

हालांकि एनसीपी के एक पदाधिकारी इस सिलसिले में एक दिलचस्प बात कहते हैं. उनके मुताबिक ‘शरद पवार इस तरह के गठबंधन को तैयार करने में एक प्रमुख भूमिका इसलिए भी निभा सकते हैं क्योंकि उन्होंने पहले ही यह साफ कर दिया है कि वे अब खुद कोई चुनाव नही लड़ने वाले. ऐसा हालत में दूसरे राजनीतिक दलों के लिए उनसे डील करना काफी आसान हो जाएगा.’

अगर राजनीति में कांग्रेस और शिवसेना एक साथ आ सकते हैं तो शरद पवार अपनी बात से बाद में पीछे नहीं हटेंगे, यह कह पाना भी आसान नहीं है. राष्ट्रीय स्तर पर महाराष्ट्र जैसे गठबंधन की संभावनाओं के बारे में ऐसी कई विरोधाभासी बातों को देखते हुए फिलहाल तो भाजपा खेमे की इस बात में दम लगता है कि ऐसी कोई संभावना बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि आने वाले समय में महाराष्ट्र का प्रयोग कितना सफल रहता है. और दूसरे खेमे की यह कि इसकी कोशिशों के लिए फिलहाल शरद पवार ही सबसे उपयुक्त व्यक्ति लगते हैं. जानकारों के मुताबिक इसकी एक वजह यह भी है कि उन्होंने अपने ऊपर लटकती ईडी जैसी केंद्रीय संस्थाओं की तलवार के बाद भी महाराष्ट्र में जो किया है उसने विपक्ष में थोड़ा सा ही सही पर विश्वास और उत्साह का संचार करने का काम किया है.