राजनीतिक खबरें अक्सर आर्थिक खबरों को ढक लेती हैं, लेकिन फिर भी आर्थिक मसले अपनी जगह पर बने तो रहते ही हैं. चालू वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर 4.5 फीसद पर पहुंचने के साथ कुछ और भी ऐसी खबरें आईं जो आर्थिक मंदी के इस दौर में चिंता बढ़ाने वाली हैं. राज्यों से आई ये खबरें भारत के सबसे बड़े आर्थिक सुधार कहे गए जीएसटी को लेकर हैं. कई राज्यों ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार पिछले कई महीनों से उन्हें जीएसटी की क्षतिपूर्ति का भुगतान नहीं कर रही है. कुछ राज्यों ने तो इस भुगतान में देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जाने की भी धमकी दी है. यह चिंता की बात है. इस समय तो केंद्र और राज्यों को मिलकर काम करना चाहिए था ताकि मंदी से बाहर निकलने के लिए हरसंभव प्रयास किये जा सकें.

केंद्र-राज्य के बीच तनातनी की असल वजहों को अगर देखा जाए तो ये राजनीतिक भी हैं और आर्थिक भी. और दोनों एक-दूसरे से संबंधित हैं. पहले आर्थिक वजहों की बात करते हैं. केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इस मामले में सिर्फ इतना कहती हैं कि ‘जीएसटी संग्रह कम रहने से राज्यों को क्षतिपूर्ति के भुगतान में देरी हो रही है.’ वे खुलकर यह नहीं कहतीं कि जीएसटी संग्रह में कमी का कारण आर्थिक सुस्ती है. जाहिर सी बात है कि अगर कारोबार में कमी आएगी तो सरकार को मिलने वाले करों - जिनमें जीएसटी भी शामिल है - में भी कमी आनी ही है. इस वजह से केंद्र सरकार अपना वह वादा पूरा नहीं कर पा रही है जो उसने इस कर सुधार को लागू करते समय देश के सभी राज्यों से किया था.

जीएसटी लागू करते समय यह सहमति बनी थी कि राज्य सरकारें सेल्स टैक्स जैसे अपने बहुत से कर लगाने के अधिकार जीएसटी काउंसिल को सौंप देंगी और इस वजह से उनको जो भी नुकसान होगा, उसकी भरपाई केंद्र सरकार करेगी. ऐसा पांच साल तक किया जाना था. इसके लिए बाकायदा जीएसटी क्षतिपूर्ति कोष की स्थापना भी की गई थी.

जीएसटी लागू होने के बाद काफी समय तक यह व्यवस्था ठीक चली. लेकिन आर्थिक सुस्ती के बाद इसमें थोड़ा ठहराव आने लगा. राज्यों के वित्त मंत्रियों का कहना है कि धीरे-धीरे यह पैसा मिलने में देरी होने लगी और यह दो-दो, तीन-तीन महीने के अंतराल पर मिलने लगा. हाल ही में जीएसटी क्षतिपूर्ति को लेकर गैर भाजपा शासित राज्यों के वित्त मंत्रियों ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाकात की थी. पंजाब के वित्त मंत्री मनप्रीत बादल ने इस दौरान मीडिया को बताया था कि इस मद में उनके राज्य का करीब 4100 करोड़ रूपया केंद्र सरकार पर बकाया है.

जीएसटी की क्षतिपूर्ति का मसला राज्यों की अर्थव्यवस्था को किस कदर प्रभावित कर रहा है, इसे पंजाब के ही उदाहरण से समझा जा सकता है. पंजाब में कई सरकारी विभागों के कर्मचारियों को पिछले एक-दो महीने का वेतन नहीं मिला है. इसको लेकर राज्य सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. पंजाब टेक्निकल बोर्ड के कर्मचारियों ने तो राज्य के वित्त मंत्री को भिखारी दिखाते हुए उनके पोस्टर तक छपवा दिये थे.

जानकारों के मुताबिक, पंजाब में सरकारी कर्मचारियों के मासिक वेतन का बिल करीब 2000 करोड़ रूपये महीने का है. ऐसे में अगर उसे जीएसटी क्षतिपूर्ति का करीब चार हजार करोड़ रुपया मिल जाए तो कर्मचारियों को दो महीने का वेतन आराम से दिया जा सकता है. पंजाब के अधिकारियों का कहना है कि कि अगर राज्य को जीएसटी क्षतिपूर्ति का पैसा समय पर मिलने लगे तो वह वेतन के मोर्च पर निश्चिंत हो सकता है.

पंजाब तो सिर्फ एक उदाहरण है. आर्थिक मोर्च पर कमोबेश सभी राज्य सरकारों की ऐसी ही स्थिति है. केरल के वित्त मंत्री थॉमस इसाक ने भी जीएसटी की बकाया रकम को लेकर कड़ा रूख अख्तियार किया हुआ है. उनका कहना है कि जीएसटी के तहत राज्यों ने अपने टैक्स लगाने के अधिकार केंद्र सरकार को सौंपे और अब जीएसटी क्षतिपूर्ति न देकर केंद्र संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन कर रहा है. उन्होंने अपने इस मुद्दे को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने तक की बात कही है.

यह तो जीएसटी को लेकर केंद्र और राज्य संबंधों में तनाव की आर्थिक वजह है. लेकिन, इस तनाव की पृष्ठभूमि में देश में हुए राजनीतिक बदलाव भी हैं. जब 2017 में जीएसटी लागू हुआ था तो देश के करीब 71 फीसदी हिस्से पर भाजपा या उसकी गठबंधन सरकारें थीं. ऐसे में जीएसटी काउंसिल में या अन्य मुद्दों पर मोदी सरकार आराम से अपनी बात मनवा लेती थी. लेकिन, पिछले एक-दो सालों में धीरे-धीरे कई राज्यों की सत्ता भाजपा के हाथ से निकलती गई. इनमें राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे बड़े राज्य शामिल हैं. हाल ही में महाराष्ट्र के भी इन राज्यों से जुड़ने के बाद अब देश के राजनीतिक नक्शे पर भाजपा का हिस्सा करीब 40 फीसदी ही रह गया है. केंद्र और राज्य में अलग-अलग दलों की सरकारों में वैसे भी तनातनी चलती रहती है. लेकिन फिलहाल देश की अर्थव्यवस्था में बढ़ती सुस्ती ने इनके बीच तनाव को बढ़ा दिया है और आने वाले वक्त में यह और बढ़ने ही वाला है.

आज विपक्ष द्वारा शासित कुछ राज्यों की सरकारें यह आरोप लगा रही हैं कि जिन राज्यों में गैर भाजपा सरकारें हैं उनके साथ मोदी सरकार आर्थिक मोर्च पर भेदभाव कर रही है. जैसे दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया ने जीएसटी क्षतिपूर्ति के बारे में कहा कि केंद्र राज्यों को उनके पैसे नहीं दे रहा है जबकि जीएसटी क्षतिपूर्ति कोष में करीब पचास हजार करोड़ रुपये रखा है. यानी मनीष सिसौदिया का इशारों में कहना था कि गैर भाजपा सरकारों को मोदी सरकार जान-बूझकर पैसे नहीं दे रही है.

अभी तो जीएसटी क्षतिपूर्ति को लेकर केंद्र और गैर भाजपा शासित राज्यों के बीच बयानबाजी तेज हुई है. लेकिन, आने वाले समय में राजस्व के एक और मोर्चे पर राज्यों की परेशानी बढ़ने वाली हैं. केंद्र सरकार जीएसटी के अलावा भी कर संग्रह का एक हिस्सा राज्यों को देता है. चूंकि आर्थिक सुस्ती के कारण सभी करों की वसूली कम हुई है इसलिए अब उसका भी घटना तय है. इसके अलावा कॉरपोरेट टैक्स के रूप में केंद्र सरकार ने 2.1 लाख करोड़ रूपये माफ किए हैं, जिसके कारण राजस्व के मोर्चे पर केंद्र सरकार पहले से ही दबाव में है. यह दबाव आखिरकार राज्यों की अर्थव्यवस्था में भी दिखेगा जिससे उनकी मुश्किलें बढ़ेंगी.

आर्थिक जानकारों के मुताबिक यह सब ऐसे वक्त पर हो रहा है जो अर्थव्यवस्था के लिए काफी महत्वपूर्ण है. जीएसटी को लेकर सरकार को इसी समय बड़े बदलावों के बारे में सोचना था, लेकिन, मौजूदा हालात से लग ऐसा रहा है कि 17-18 दिसंबर को होने वाली जीएसटी काउंसिल की बैठक में काफी हंगामा होना है. जीएसटी में 18 फीसदी योगदान करने वाले महाराष्ट्र के भी भाजपा के हाथ से निकल जाने के बाद यह तय है कि काउंसिल में मुद्दों को लेकर टकराव बढ़ेगा ही. तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश की सरकारें केंद्र सरकार पर फिलहाल बहुत आक्रामक नहीं हैं, लेकिन जीएसटी क्षतिपूर्ति के मसले पर उन्होंने भी अपनी नाखुशी जताई है.

इस तरह की खबरें भी आ रही हैं कि जीएसटी काउंसिल की इस बैठक में जीएसटी के स्लैब में बदलाव किया जा सकता है. माना जा रहा है कि सरकार जीएसटी के बेस स्लैब को पांच से सीधे दस फीसदी कर सकती है. सूत्रों का यह भी कहना है कि बेस स्लैब को सीधा दो गुना करने के साथ 243 आइटमों को जीएसटी के 18 फीसद स्लैब में डाला जा सकता है. लेकिन, छत्तीसगढ़ ने जीएसटी दरों में बढोत्तरी पर अपनी असहमति जाहिर की है. उसका कहना है कि इससे राज्यों के बजाय केंद्र सरकार को फायदा मिलता है. जीएसटी दरों में बढोत्तरी पर छत्तीसगढ़ सरकार की असहमति अपनी जगह है लेकिन यह तो तय है कि इससे बढ़ने वाली महंगाई की मार आखिरकार जनता पर ही पड़ेगी.

महंगाई के मोर्चे पर और भी बातें हैं. लगातार घटते राजस्व के कारण राज्य उन चीजों पर सेस या उसके जैसा अन्य टैक्स आयद कर सकते हैं जो जीएसटी के दायरे से बाहर हैं. इसमें पेट्रोलियम पदार्थ सबसे ऊपर हैं. यानी आने वाले समय में कई राज्यों में डीजल-पेट्रोल महंगा हो सकता है जो परोक्ष-अपरोक्ष रूप से महंगाई बढाएगा. इसके अलावा जिन राज्यों में चुनाव हैं, वहां की राज्य सरकारें तमाम घोषणाएं करेंगी और अपना कर्ज बढाएंगी. लेकिन चुनाव के बाद वहां बिजली और जीएसटी के दायरे से बाहर की चीजों ( जैसे रजिस्ट्रेशन फीस, स्टांप ड्यूटी) की दरें बढाई जा सकती हैं. इनसे भी महंगाई में इजाफा ही होगा.

देश इस वक्त मंदी के दुष्चक्र में फंसा है. इससे निपटने के लिए राज्यों और केंद्र के सामूहिक प्रयास की जरूरत है. फिलहाल तो केंद्र और राज्यों के संबंध तनातनी की ओर जा रहे हैं. उम्मीद ही कर सकते हैं कि आर्थिक मसलों पर दोनों पक्ष साथ काम करने की जरूरत समझेंगे और ये विवाद एक सीमा से आगे नहीं जाएंगे.