जलवायु परिवर्तन की रोकथाम के लिए इस समय स्पेन की राजधानी माद्रिद (मैड्रिड) में संयुक्त राष्ट्र का जो सम्मेलन चल रहा है, उसमें मंगलवार 10 दिसंबर को एक ऐसी रिपोर्ट पेश की गयी, जिससे भारत को भारी राहत मिल सकती है. भारत में इन दिनों जगह-जगह जो धुंध और कुहरा छाया हुआ है, प्रदूषित हवा में सांस लेना जिस प्रकार दूभर हो गया है, इस रिपोर्ट से इस सब में तो कोई कमी नहीं आयेगी. किंतु जो लोग यह मान बैठे हैं कि भारत में जलवायु परिर्तन की रोकथाम के लिए कुछ नहीं हो रहा है, उन्हें यह जानकर आश्चर्य होगा कि भारत ने इस मामले में अच्छे-अच्छों को पीछे छोड़ दिया है.

पश्चिमी जगत की तीन प्रमुख जलवायुरक्षक संस्थाओं जर्मनवॉच, क्लाइमेट ऐक्शन नेटवर्क (सीएएन) और न्यू क्लाइमेट इन्स्टीट्यूट (एनसीआई) ने माद्रिद सम्मेलन को सौंपी गयी अपनी इस साझी रिपोर्ट में लिखा है कि उन्होंने सबसे अधिक प्रदूषक गैसें उत्सर्जित करने वाले विश्व के 57 देशों के कार्यों और भावी योजनाओं का अध्ययन किया. उनमें से केवल 31 देश ऐसे निकले, जहां उत्सर्जन की मात्रा घटी है. बाक़ी 26 देशों में उत्सर्जन घटने की जगह और बढ़ा है. यही 56 देश और 28 देशों वाला यूरोपीय संघ, ऊर्जा से जुड़ी 90 प्रतिशत तापमानवर्धक गैसों के उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार हैं.

पेरिस समझौते के रास्ते पर एक भी देश नहीं

तीनों संस्थाओं के साझे जलवायुरक्षा सूचकांक (क्लाइमेट चेंज पर्फ़ार्मन्स इन्डेक्स/CCIP) के अनुसार, अध्ययन के लिए चुने गये सभी 57 देशों में से एक भी देश ऐसा नहीं मिला, जो पूरी तरह 2015 के पेरिस समझौते वाले रास्ते पर चल रहा हो. इसीलिए उनकी रैंकिंग सूची में पहले तीन स्थानों पर किसी देश का नाम नहीं है. पहले तीन स्थान ख़ाली हैं.

सूची में 75.77 अंकों के साथ स्वीडन चौथे नंबर पर, 71.14 अंकों के साथ डेनमार्क पांचवें नबंर पर, 70.63 अंकों के साथ मोरक्को छठें नंबर पर 69.80 अंकों के साथ ब्रिटेन सातवें नंबर पर, 66.22 अंकों के साथ लिथुआनिया आठवें नंबर पर, 66.02 अंकों के साथ भारत नौवें नंबर पर और 63.25 अंकों के साथ फ़िनलैंड दसवें नंबर पर है. इस बार पांचवें नबंर पर आने वाला डेनमार्क पिछले वर्ष 15वें नंबर पर था और पिछले वर्ष 16वें नंबर पर रहा यूरोपीय संघ इस बार लुढ़ककर 22वें नंबर पर पहुंच गया है.

अमेरिका सबसे पीछे

यह सूची तापमानवर्धक गैसों के उत्सर्जन (40 प्रतिशत अंक), नवीकरणीय ऊर्जा के प्रयासों (20 प्रतिशत अंक) , उर्जा के विवेकसम्मत इस्तेमाल (20 प्रतिशत अंक) और देशों की जलवायु नीति (20 प्रतिशत अंक) जैसे चार वर्गों वाली कसौटी तथा उनका परिचय देने वाले 14 अलग-अलग सूचकों के आधार पर तैयार की गयी है. इस सूची में अंतिम पांच स्थान क्रमशः ईरान, दक्षिण कोरिया, ताइवान, सऊदी अरब और अमेरिका को मिले हैं. इनमें भी अमेरिका सबसे पीछे, यानी 60वें नंबर पर है. रूस, तुर्की, जापान, ऑस्ट्रेलिया या कैनडा जैसे देश भी इसमें बहुत निचले स्थानों पर हैं. इसका अर्थ यही है कि इन देशों में जलवायुरक्षा को अभी भी गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है. पाकिस्तान का इस सूची में नाम ही नहीं है और चीन भी भारत से बहुत पीछे 30वें नंबर पर है.

भारत पहली बार शुरू के दस देशों में

इस वैश्विक जलवायुरक्षा सूचकांक में भारत पहली बार शुरू के दस देशों की पांत में पहुंचा है. इसका कारण यह बताया गया है कि भारत में तापमानवर्धक गैसों का प्रतिव्यक्ति उत्सर्जन और ऊर्जा की खपत अन्य देशों की अपेक्षा अब भी काफ़ी कम है. साथ ही भारत सरकार ने जीवाश्म ईंधनों (तेल,गैस, कोयले) की खपत घटाने और पवन एवं सौर ऊर्जा की मात्रा 2030 तक तेज़ी से बढ़ाने की जिस तरह की महत्वाकांक्षी योजनाएं बनायी हैं, वैसा बहुत ही कम देशों में हो रहा है. ब्रिटेन एक ऐसा ही दूसरा उदाहरण है, इसलिए उसे सातवां स्थान मिला है.

जी-20 समूह के ब्रिटेन और भारत ही ऐसे दो देश हैं, जो सबसे अच्छी रैंकिंग वाले शुरू के दस देशों में स्थान पा सके हैं. इस समूह के आठ देशों को ‘सबसे बुरे’ वर्ग में जगह मिली है. दूसरी ओर जर्मनी है, जो पिछले वर्ष के 22वें स्थान से गिरकर इस बार 23वें स्थान पर पहुंच गया है. जलवायुरक्षा सूचकांक तैयार करने वाली संस्थाओं का कहना है कि ‘’जर्मनी कोयला जलाकर बिजली बनाने वाले अपने बिजलीघरों को 2038 तक बंद तो करने जा रहा है, जो सही दिशा है, पर परिवर्तनों की गति बहुत धीमी है.’

अनमना जर्मनी

इन संस्थाओं का मानना है कि जर्मनी बहुत अनमने ढंग से और छोटे-छोटे क़दम उठाते हुए आगे बढ़ रहा है. जर्मनी ही पर्यावरणवादी यूरोप की सबसे पुरानी, मुखर और प्रबल ग्रीन पार्टी का देश है. यह पार्टी चुनावों में बड़ी-बड़ी पार्टियों के छक्के छुड़ा रही है. तब भी जलवायुरक्षकों को जर्मनी से कहना पड़ रहा है कि उसे तापमानवर्धक गैसों का उत्सर्जन घटाने और पवन ऊर्जा संयंत्रों की संख्या बढ़ाने के प्रति थोड़ा और साहसिक एवं महत्वाकांक्षी होना चाहिये. मज़े की बात यह है कि जर्मन सरकार अपनी जनता को हमेशा यही आभास देती है कि उससे बड़ा जलवायुरक्षक तो यूरोप में कोई दूसरा है ही नहीं.

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा पेरिस समझौते को ठुकरा दिया जाना जलवायुरक्षा के प्रयासों के लिए एक बहुत बड़ा आघात अवश्य है. तब भी जलवायुरक्षा सूचकांक 2020 तैयार करने वाली संस्थाओं का कहना है कि कोयले की वैश्विक खपत घट रही है और नवीकरणीय स्रोतों वाली ऊर्जा का अनुपात लगातार बढ़ रहा है. माद्रिद में संयुक्त राष्ट्र के जलवायुरक्षा सम्मेलन के समानांतर इस सूचकांक और साथ की रिपोर्ट के प्रकाशन से आशा की जाती है कि सम्मेलन में भाग ले रहे देशों के नेता और अधिकारी तथ्यों के प्रकाश में साहसिक निर्णय लेने की तत्परता का परिचय देंगे.