बुधवार को नागरिकता संशोधन विधेयक पर जब राज्यसभा में चर्चा चल रही थी उस समय दिल्ली में मौजूद पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थी टीवी और रेडियो से चिपके हुए थे. कुछ फोन पर भी खबरों को देख रहे थे. नागरिकता संशोधन विधेयक भारत को आशियाना बनाने की उनकी इच्छा पर मुहर लगाने वाला था. राज्यसभा में जैसे ही यह विधेयक पारित हुआ दिल्ली के ‘मजनू का टीला’ इलाके में वर्षों से रह रहे पाकिस्तानी हिंदुओं की बस्ती में दीवाली मनाई जाने लगी. रात भर मजनू के टीला इलाके में ‘भारत माता की जय’ और ‘जय हिंद’ के नारे लगते रहे. बड़े बुजुर्गों ने एक-दूसरे को बधाई दी और मिठाइयां बांटी. नागरिकता संशोधन विधेयक लोकसभा में पहले ही पारित हो चुका है.

यहां रहने वाले एक परिवार ने तो संसद से विधेयक पारित होने के बाद अपनी बेटी का नाम ही ‘नागरिकता’ रख दिया है. बेटी की दादी मीरा दास ने पीटीआई को बताया कि उनकी पोती का जन्म सोमवार को हुआ था और परिवार के लिए नागरिकता संशोधन विधेयक की अहमियत को देखते हुए उन्होंने बच्ची का नाम नागरिकता रखा है.

मीरा के मुताबिक उन्होंने इस विधेयक के संसद द्वारा पारित किये जाने के लिए मन्नत भी मांगी थी और उपवास भी रखा था. वे पाकिस्तान से भारत आने के बारे में बताते हुए कहती हैं, ‘सुरक्षित पनाहगाह की तलाश में हम आठ साल पहले भारत आए थे. यह हमारा एकमात्र घर है, लेकिन नागरिकता नहीं मिलने की वजह से हम दुखी थे. अब हम भी गर्व से कह सकते हैं कि हम भारतीय हैं और पंछी की तरह आजादी से उड़ सकते हैं.’

नागरिकता संशोधन विधेयक में 31 दिसंबर 2014 तक पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत आए गैर मुस्लिमों को आसानी से नागरिकता देने का प्रावधान है. यानी मीरा दास जैसे हजारों लोगों को अब भारत में अवैध शरणार्थी नहीं माना जाएगा. इनमें से करीब 750 पाकिस्तानी हिंदू दिल्ली के मजनू का टीला इलाके में टेंटों और टिन की चादरों से बनी छत के नीचे गुजर-बसर कर रहे हैं. पाकिस्तान में तरह-तरह की परेशानियां होने की वजह से ये लोग शरण की आस में वहां से भारत आए थे. दिल्ली में कई पाकिस्तानी हिंदू यहां के रोहिणी इलाके के सेक्टर नौ और ग्यारह, आदर्श नगर और सिग्नेचर ब्रिज के आसपास भी रहते हैं.

42 वर्षीय सोना दास 2011 की एक सर्द रात में धार्मिक यात्रा के नाम पर 15 दिनों के लिए अपनी पत्नी और नौ बच्चों के साथ भारत आए थे. तब उन्हें नहीं पता था कि उनके और उनके परिवार का भविष्य क्या होगा. ‘हम चूल्हे पर खाना पकाते हैं और सोलर एनर्जी से चार्ज होने वाली बैटरी की मदद से घर में रोशनी करते हैं. केवल दो या तीन घरों में ही टेलीविजन है. नगर निगम ने पानी की व्यवस्था की है, लेकिन सीवर की सुविधा नहीं है. सरकार हमारी नहीं सुनती क्योंकि हमारे पास मतदान का अधिकार नहीं है.’

आठ साल में सोना दास ने अपनी मांगों को लेकर कई बार प्रदर्शन किये और उन्हें कई बार अदालत का मुंह भी देखना पड़ा. अब नागरिकता संशोधन विधेयक पास होने के बाद उन्हें उम्मीद है कि उनकी जिंदगी में थोड़ी स्थिरता आएगी.

नागरिकता संशोधन विधेयक का भारत के कई हिस्सों में बड़ा विरोध हो रहा है, लेकिन इस वक्त पाकिस्तानी हिंदुओं को शरण देने वाले ‘मजनू के टीला’ जैसे इलाकों का माहौल ही अलग है. खिड़कियों से झांकती महिलाएं और घुमावदार सड़कों पर दौड़ते बच्चे और नागरिकता की आस में पूरी जिंदगी बिता चुके कई बुजुर्ग तमाम परेशानियों के बावजूद आज उत्साह में नजर आते हैं. इनमें से कई मंदिरों में जाकर प्रार्थना कर रहे हैं तो कई मीडिया को देखते ही या वैसे ही ‘जय हिंद’ और ‘जय श्रीराम’ के नारे लगा रहे हैं. इनमें से ज्यादातर लोग इस बात पर चर्चा भी कर रहे हैं कि नागरिकता संशोधन विधेयक पारित होने और उनके भारत का नागरिक बन जाने के बाद उनकी जिंदगी में क्या बदलाव आएगा.

‘यहां के गैर सरकारी संगठन बहुत दयालु हैं. वे हमें मूलभूत स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराते हैं. कुछ लोग हैं, जो हमारे मुद्दे को भी उठाते हैं’ 2013 में 484 पाकिस्तानी हिंदुओं के साथ भारत आए धर्मवीर बागड़ी कहते हैं, ‘अब अगर हमें नागरिकता मिल गई तो हमारी मुश्किलों के दिन खत्म हो जाएंगे.’

पाकिस्तानी हिन्दुओं के लिए गर्म कपड़े और मिठाईयां लेकर मजनू का टीला में आए दंपति भूपिंदर सरीन (45) और रीमा सरीन (43) उन दिनों को याद करते हैं, जब वे आठ साल पहले दिसंबर की कंपकपाती सर्दी में सोना दास के परिवार और अन्य पाकिस्तानी हिंदुओं से मिले थे.

भूपिंदर सरीन कहते हैं, ‘दिसंबर की रात थी, बारिश हो रही थी और इन लोगों के पास कोई ठिकाना नहीं था. ये लोग पेड़ के नीचे कांप रहे थे. तभी वहां पर गुजरने के दौरान मेरी नजर उन पर पड़ी. मैंने अपने दोस्तों को बुलाया और इनके लिए अलाव और खाने की व्यवस्था की. जो प्यार के रिश्ते की शुरुआत उस रात हुई, वह दिनोंदिन मजबूत होती चली गई.’

गत वर्षों में भूपिंदर ने यमुना किनारे रह रहे हिंदुओं की जरूरतों के बारे में विभिन्न मंत्रालयों, राजनेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और गैर सरकारी संगठनों को पत्र भी लिखे.

रीमा सरीन बताती हैं कि ‘कई बार कुछ गैर सरकारी संगठन, विश्वविद्यालयों के छात्र, सेवानिवृत्त शिक्षक और अस्पतालकर्मी सामने आए और इन लोगों की जिंदगी थोड़ी बेहतर बनाने के लिए हमारी मदद की.’

दिल्ली स्थित ‘नया पथ नामक’ एक गैर सरकारी संगठन से जुड़े संजय गुप्ता पीटीआई से बातचीत में कहते हैं, ‘मेरे संगठन ने पाकिस्तान से आए हिंदुओं के आधार कार्ड का आवेदन करने, उन्हें वीजा दिलाने, और उनका बैंक खाता खोलने के साथ-साथ कई कानूनी मामलों में भी उनकी मदद की है.’

‘मजनू के टीला’ इलाके में रह रहीं 26 वर्षीय पाकिस्तानी शरणार्थी रजनी बागड़ी भी अपने जैसे बाकी लोगों की तरह नागरिकता संशोधन विधेयक के पारित होने पर बेहद ख़ुश हैं. वे कहती हैं, ‘अब हमें भारतीय मतदाता पहचान पत्र मिलेगा, जो हमारे भारतीय नागरिक होने का सबूत होगा...अब हम भी वैसे ही होंगे जैसे अन्य भारतीय हैं. अब सरकारी योजनाओं का लाभ हमें भी मिलेगा... हमें नागरिकता मिलेगी तो राजनीतिक पार्टियां और सरकार हम पर भी ध्यान देंगी.’