संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग ने नागरिकता संशोधन कानून को लेकर चिंता जताई है. उसका कहना है कि यह कानून बुनियादी रूप से भेदभाव करने वाला है. मानवाधिकारों की स्थिति पर नजर रखने वाली उसकी संस्था यूएनएचसीआर ने एक बयान जारी किया है. इसमें कहा गया है, ‘हम इससे चिंतित हैं कि भारत के नए नागरिकता संशोधन कानून की प्रकृति मूल रूप से भेदभाव करने वाली है.’ बयान में आगे कहा गया है कि सताए गए समुदायों को सुरक्षा देने का मकसद स्वागत योग्य है, लेकिन इसमें पक्षपात नहीं होना चाहिए.

यूएनएचसीआर का कहना है कि सम्मान, सुरक्षा और मानवाधिकार हर शरणार्थी का हक है. संस्था के प्रवक्ता की ओर से जारी बयान में उम्मीद जताई गई है कि सुप्रीम कोर्ट नए कानून की समीक्षा करेगा और इस बात की सावधानी से समीक्षा करेगा कि यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों को लेकर भारत के दायित्वों के अनुरूप है या नहीं.

नागरिकता संशोधन कानून में अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान में धार्मिक प्रताड़ना के कारण 31 दिसंबर 2014 तक भारत आए हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान है. इन छह समुदायों के शरणार्थियों को पांच साल भारत में निवास करने के बाद भारतीय नागरिकता दी जाएगी. पहले इसके लिए 11 साल देश में बिताने की जरूरत थी. संसद से पारित होने के बाद इस कानून पर इसी हफ्ते राष्ट्रपति की मुहर लगी है.