अर्थव्यवस्था को लेकर बुरी खबरें जारी हैं. भारत के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय ट्विन बैलेंस शीट (टीबीएस) की दूसरी लहर का सामना कर रही है जिसके चलते इसमें असाधारण सुस्ती आ गई है. अपने एक नए शोध पत्र में उन्होंने लिखा है, ‘साफ है कि यह कोई साधारण स्थिति नहीं है. यह भारत का ग्रेट स्लोडाउन है जिसमें अर्थव्यवस्था आईसीयू की तरफ जाती दिख रही है.’

अरविंद सुब्रमण्यम ने 2014 में भी टीबीएस की समस्या की तरफ ध्यान खींचा था. यह समस्या तब पैदा होती है जब निजी कंपनियों द्वारा लिया गया विशाल कर्ज एनपीए में तब्दील होने लगता है. तब अरविंद सुब्रमण्यम मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार थे. उन्होंने लिखा है कि टीबीएस-1 नाम का संकट तब पैदा हुआ जब बैंकों ने 2004 से 2011 तक स्टील, ऊर्जा और बुनियादी ढांचे से जुड़ी कंपनियों को कर्ज दिए और यह पैसा डूब गया.

अरविंद सुब्रमण्यम के मुताबिक टीबीएस-2 का लेना-देना मुख्य तौर पर नोटबंदी के बाद वाले दौर से है. उनका कहना है कि इस दौर में बैंकों में खूब पैसा जमा हुआ जिन्होंने इसका एक बड़ा हिस्सा गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) को उधार दिया. इन कंपनियों ने आगे यह पैसा रियल एस्टेट सेक्टर में लगाया. 2017-18 तक रियल एस्टेट से जुड़ी जो पांच लाख करोड़ रु की रकम बकाया थी उसमें लगभग आधा वही पैसा था जो एनबीएफसी ने इस सेक्टर को दिया था.

अरविंद सुब्रमण्यम का कहना है कि सितंबर 2018 में जब आईएलएंडएफएस के ढहने की खबर आई तो यह सिर्फ इसलिए अहम नहीं थी कि 90 हजार करोड़ रु से ज्यादा का कर्ज डूब रहा है. उनके मुताबिक यह खबर इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण थी कि अब बाजार पूरे एनबीएफसी सेक्टर की तरफ से चौकन्ना हो गया.

इसके बाद जो पता चला वह और भी ज्यादा चिंता जगाने वाला था. पता चला कि बहुत से एनबीएफसी ऐसे हैं जिन्होंने हाल में अपना ज्यादातर पैसा रियल एस्टेट में ही लगाया है. अरविंद सुब्रमण्यम के मुताबिक यह बहुत खतरनाक स्थिति है क्योंकि फिलहाल जो आंकड़े हैं वे बताते हैं कि भारत के शीर्ष आठ शहरों में ऐसे मकानों या फ्लैट्स का आंकड़ा 10 लाख है जिनका कोई खरीदार नहीं है. इनकी कीमत मोटा-मोटी आठ लाख करोड़ रु बैठती है. यानी आगे खाई साफ दिख रही है.