1-निर्भया मामले के दोषियों को जल्द सजा दिए जाने की खबरें आ रही हैं. जिस तरह फांसी की सजा विरले ही किसी को मिलती है उसी तरह फांसी के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला फंदा भी पूरे देश में केवल एक ही जगह बनता है. बीबीसी हिंदी पर नीरज प्रियदर्शी की रिपोर्ट

फांसी के फंदे बिहार की बक्सर जेल में ही क्यों बनाए जाते हैं?

2- समूचा पूर्वोत्तर नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में उबल रहा है. विपक्ष इस कानून को भारत की आत्मा पर हमला बता रहा है तो सरकार इस आरोप को खारिज कर रही है. द प्रिंट हिंदी पर अपने इस लेख में योगेंद्र यादव मानते हैं कि इस कानून के साथ गंगा एकदम से उल्टी बह निकली है.

नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध भारत की आत्मा को बचाने की असली लड़ाई है

3-देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में शुमार जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय इन दिनों युद्ध का मैदान बने हुए हैं. दोनों विश्वविद्यालयों के छात्र और शिक्षक अपने-अपने कुलपतियों के खिलाफ सड़क पर हैं. द वायर हिंदी पर अपने इस लेख में अरुण कुमार का मानना है कि स्वायत्तता के नाम पर इन कुलपतियों को असीमित अधिकार मिलते हैं, लेकिन इन अधिकारों से विश्वविद्यालयों को बेहतर बनाने के बजाय वे उन्हें बर्बाद करने में लगे हैं.

जेएनयू और डीयू के कुलपति अपने विश्वविद्यालयों की जड़ खोदने में क्यों लगे हैं?

4-दिल्ली में एक फैक्ट्री में आग लगने से पिछले दिनों 43 मजदूरों की मौत हो गई. बताया जा रहा है कि यह फैक्ट्री अवैध तरीके से चल रही थी. इसके बाद एक बार फिर से ऐसी फैक्ट्रियों और उनमें सुरक्षा इंतजामों पर रस्मी बहस चल पड़ी है. न्यूजलॉन्ड्री पर इस हादसे के अलग-अलग पहलुओं को टटोलती बसंत कुमार की रिपोर्ट.

‘जब तक पत्रकारों का आना बंद नहीं होगा तब तक यहां हालात नहीं बदलेंगे’

5-पश्चिम में अमेरिका के कैलिफोर्निया से लेकर पूर्व में ऑस्ट्रेलिया के सिडनी तक जंगलों की आग सुर्खियों में है. बीते दिनों खबर आई कि सिडनी में इसके चलते इस कदर धुआं छा गया है कि वायु गुणवत्ता दिल्ली से भी बदतर हो गई है. डाउन टू अर्थ पर पर अपने इस लेख में स्टीफन पाइन मानते हैं कि दुनिया के कई हिस्सों में हुई आग की बड़ी घटनाओं के लिए हम ही दोषी हैं, लेकिन हम अब भी इस समस्या का समाधान नहीं ढूंढ़ रहे हैं.

अग्नि युग में प्रवेश कर रही है पृथ्वी, इन वजहों से बढ़ा खतरा