यह आम बात है कि कविता पर जो लिखा-बोला जाता है उसमें अकसर भाषा पर कोई गंभीर विचार नहीं होता. अगर संयोग से भाषा पर एकाध टिप्पणी कर भी दी गयी तो वह अकसर चलताऊ क़िस्म की होती है. यह तब जब कविता भाषा में लिखी जाती है और भाषा में ही पढ़ी-सुनी-गुनी जाती है. भाषा के बाहर कविता का कोई अस्तित्व नहीं होता, हो सकता. यह सीधी सी सचाई कविता पर लिखने-बोलने न जानते हों यह ममुकिन नहीं है. फिर भी, अगर भाषा आलोचनात्मक नोटिस या विश्लेषण का हिस्सा नहीं बनती तो इसका कुछ कारण होगा. इस समय भाषा के साथ, रोज़ ही राजनीति-धर्म-मीडिया-बाज़ार के अनूठे गठबंधन में जो अनाचार और लगातार विकृतीकरण हो रहा है उसके सन्दर्भ में भाषा पर विचार तो एक तरह का रेडिकल धर्म हो सकता है.

भाषा का दुर्लक्ष्य पिछले लगभग चालीस वर्ष का एक तरह से स्थायीभाव रहा है. सारी चर्चा कविता को उसके विषय में घटाकर होती रही है. लगभग सारा विमर्श विषयवादी विमर्श रहा है. स्वयं अपने विषय से कविता कैसे कोई वक्र सम्बन्ध या तनाव भाषा से बनाती है इस पर ध्यान ही नहीं जाता. ऐसा कर पाने के लिए कविता को धीरज और जतन से, उसकी भाषा में गुंथी अन्तर्ध्वनियों को सुनने के लिए कुछ कोशिश ज़रूरी होती है. ऐसा करने से हमारी अधिकांश आलोचना बचती है, स्वयं लेखक भी जब वे किसी कृति या कृतिकार के बारे में कुछ लिख-बोल रहे हों. यह सोचकर कलेश भले होता हो लेकिन सचाई यही है कि हमारी आलोचना बुरी तरह से सपाटबयानी और सरलदिमाग़ी है. विषय पर संकेन्द्रण इस सपाटबयानी को और सरल-दिमाग़ी को आसान बना देता है. यह साफ़ देखा जा सकता है कि इस समय बहुत सारा रचनात्मक साहित्य सपाटबयानी पर टिका है, ज़्यादातर आलोचना भी सपाटबयानी का ही अच्छा-बुरा संस्करण या उदाहरण बन गयी है.

आलोचना की एक पुरानी आदत यह भी है कि वह कविता में जो नहीं है उसके आधार पर जांच-परख करने की ओर प्रवृत्त होती है. कविता में जो है उसे कई बार तो पूरी तरह से नज़रन्दाज़ कर दिया जाता है. कुछ बने-बनाये प्रायः अपरिभाषित पद इस सिलसिले में बहुत लोकप्रिय हैं. निजता-सामाजिकता का द्वैत, राजनीति, विचार, जनचेतना, सामाजिक यथार्थ आदि. अकसर इन पदों के आधार पर ठीक या सटीक बैठनेवाले कवि मिल ही जाते हैं. फिर उन्हें प्रतिमान बनाकर लागू कर दिया जाता है. इस प्रसंग में भाषा का ज़िक्र कभी-कभार ज़रूर होता है पर अकसर यह कहते हुए कि विचारणीय कवि की भाषा जनभाषा से कितनी दूर है. जनपक्षधरता नाम का एक गोल-मटोल पद भी विषयवादिता की आक्रान्ति में खूब इस्तेमाल होता है. यह पक्षधरता, फिर, भाषा के व्यवहार से नहीं, विषय से तय होती है. इस सबका एकदुष्परिणाम यह है कि अनेक कवि भी विषयवादी हो गये हैं, कवि ही अपनी कविता में भाषा को कम महत्व और ध्यान देने लगे हैं.

बीहड़ में हरियाली

इस समय हिंदी में आलोचना की जो हालत है उसे एक सूखता बीहड़ ही कहा जा सकता है जिसमें कहीं-कहीं और जब-तब हरियाली की कुछ जगहें नज़र आती हैं. ऐसी ही एक जगह है दार्शनिक और रसिक मुकुन्द लाठ की रज़ा पुस्तकमाला में राजकमल से प्रकाशित संचयिता ‘भावन’. साढ़े पांच सौ से अधिक पृष्ठों की इस पुस्तक में पुराने साहित्य, आधुनिक साहित्य और कलाओं को लेकर बिना हिंदी आलोचना की प्रचलित भाषा, पदावली और प्रत्ययों से प्रभावित हुए मुकुन्द जी ने आलोचनात्मक विचार और रसास्वादन की अपनी अनूठी भाषा विकसित की है.

वाक्पति के बारे में लिखते हुए मुकुन्द जी कहते हैं, ‘देवताओं के साथ ऐसी चुहल भरी छेड़छाड़ वाक्पति के आगे-पीछे के कई संस्कृत कवियों में भी मिलती है. पुराना कोई सुभाषित संग्रह उठाकर देखिये, नमूने के बाद नमूना मिल जायेगा. देवताओं के प्रति जिस मनोभाव का ये छंद परिचय देते हैं उस पर विशेष विचार नहीं किया गया है. पर भाव भक्ति का तो नहीं ही है. भाव में परिहास का फुरफुराता सा उछाल है जो देवताओं को देवत्व के स्वर्गलोक से उतारकर धरती पर ला खड़ा करता है. एकदम से ‘इहलोक’ का जीव बना देता है, वह भी निहायत ‘याराने’ के साथ. बड़ी अतिपरिचित ‘लौकिकता’ के साथ.’

निर्मल वर्मा के ‘कला के सत्य की धारणा’ पर विचार करते हुए वे कहते हैं, ‘कला को इतिहास-विज्ञान या समाज-विज्ञान की सामग्री नहीं बना देना चाहिये, यह तो समझ में आया, पर कला का अपना इतिहास जिसकी प्रधान सामग्री कला से ही जुटायी जाती है- इसका कला से कया सम्बन्ध है? आज इसे कला-बोध का- कला के अपने सत्य की संवेदना का- अन्तरंग सा माना जाता है.’

सबसे दिलचस्प पक्ष मुकुन्द जी के लेखन का यह है कि वह कई स्तरों पर एक साथ संवाद करता है. वे परम्परा से संवाद करनेवाले आधुनिक हैं. दूसरी ओर, उनकी शैली ऐसी है कि वे अपने पाठक को भी आसानी से संवाद में खींच लेते हैं. वे बात करते हुए लिखते हैं, उनकी विद्वता, और वह आम हिंदी आलोचकों की विद्वत्ता से कहीं गहरी और प्रामाणिक है, उनके विश्लेषण और विचारों की बढ़त में सहज भाव से बिना आक्रान्त किये या बोझ बने उनकी मदद करती है और हमें भी इस बात का अहसास कराती चलती है कि कई प्रश्न और वृत्तियां, जिन्हें हम सर्वथा नया मानते हैं, हमारी परम्परा में पहले भी रहे हैं और उन पर गहराई से विचार हुआ है. एक तरह से मुकुन्द जी की अलोचना वैचारिक स्मृति को सक्रिय करती है जो इधर तुरन्तापन के आतंक में बहुत शिथिल होती गयी है. नितान्त समसामयिकता मुकुन्द जी को आतंकित नहीं करती. वे हमारी आधुनिकता को हमारी परम्परा की निरन्तरता में अवस्थित करने का बेहद ज़रूरी काम करते रहे हैं और यह संचयिता उनके इस मूल्यवान् अवदान का एक विचारोत्तेजक दस्तावेज हैं.

तरुण सखा

रमेश दत्त दुबे मेरे तरुण सखा थे. हमने सागर में लगभग एक दशक साथ-साथ कविता, मित्रता और संवाद में बिताये थे. उनके परिवार का स्वतंत्रता संग्राम, समाजवाद और पत्रकारिता से जुड़ाव था. मेरे परिचितों में उनसे अधिक और कोई इतना बुंदेलखंडी नहीं था जितना, सहज भाव से, रमेश. उसके लोकजीवन में उनकी गहरी पैठ थी. उनकी कविता उसी सागर की कविता है: उसकी स्थानीयता, उसका धीरे-धीरे बदलता कस्बाई परिवेश, उसका बातूनीपन, उसका अकखड़ स्वाभाव आदि सब रमेश की कविता का उपजीव्य रहे हैं. इतने बरसों बाद, उनकी मृत्यु के भी कई बरसों बाद, उनकी कविता को सागर जैसे शहर में बुंदेलखंडी के ग़ायब होने पर शांत विलाप की तरह पढ़ा जा सकता है.

रमेशदत्त दुबे की दो पुस्तकें कवितासंग्रह ‘हडि्डयों से भी दूध उतर आता है’ और लोककवि ईसुरी के उनके अनुवाद और निबन्ध ‘कर लो प्रीत खुलासा गोरी’, रज़ा पुस्तकमाला के अन्तर्गत, वाणी प्रकाशन से आयी हैं. रमेश की चिन्ता सिर्फ़ एक अंचल के जर्जर होने भार की नहीं थी. यह अंचल उनके लिए मानवता का एक दुखद रूपक था. ऐसी पंक्तियां अपने समय के विघटन के प्रति सतर्क कवि ही लिख सकता था, ‘भेड़िया हर बार आया/खा गया सभी भेड़- कभी मेमना/खा गया तुम्हें जब–/तुमने सिर्फ़ तभी जाना-भेड़िया आया.’

रमेश उन सबको दर्ज़ करते हैं जो कहीं-न-कहीं जीवन को बचा रहे होते हैं. यह बिम्ब इतना मार्मिक है-

एक दिन ऐसा होगा

यह लीपेगी अपना आंगन तो

पूरी पृथ्वी लिप जायेगी

रमेश की कविता, अन्ततः, आंगन को लीपने की कविता है जिससे पूरी पृथ्वी, क्षण भर को, लिप जाती है.

ईसुरी की बुंदेली में लिखी फ़ागों को रमेश ने खड़ी बोली में पूरा लालित्य के साथ उतारा है. गोरी के बायें गाल का तिल/तिल के दाने से भी हलका/मानो चन्द्र पर जमी हो/एक बूंद यमुना के जल ही/ मानों/सफ़ेद गुलाब पर/बैठा हो भ्रमर/मानो/राधा के गौरे कपोल पर/श्याम ही बिराजे हों/मानो/प्रेमी की लगन की/दबी हुई ज्वाला की/एक चिनगारी/जा बैठी हो/गोरी के बायें कपोल पर.

प्रेम की निषठ स्थानीयता, सजल ऐन्द्रियता और कहन की सुषमा से भरपूर ईसुरी का यह खड़ी बोली में अवतार रीति और श्रृंगार की एक अटूट परम्परा का, एक तरह से, पुनर्वास है.