करीब 20 साल कैसेट, सीडी और फिर डीवीडी बेचकर रोज़ी-रोटी कमाने वाले 40 साल के, मुश्ताक़ अहमद शेख, ने हाल ही में अपना काम बदलकर क्रॉकरी बेचना शुरू कर दिया था. इसकी वजह थी इंटरनेट और मोबाइल. इनके रहते आज मनोरंजन के लिए किसी और चीज की जरूरत ही खत्म हो गई है.

लेकिन पिछले लगभग डेढ़ महीने से शेख फिर से वही चीज़ें बेचने लगे हैं. क्योंकि कश्मीर घाटी में पिछले लगभग चार महीनों से इंटरनेट बंद है और लोग फिर से अपने मनोरंजन के लिए सीडी, डीवीडी या पेनड्राइव जैसी चीजों का उपयोग करने लगे हैं.

आजकल के दौर में इंटरनेट बंद होने की वजह से होने वाले नुकसान इतने हैं कि शायद ही गिनाए जा सकते हों. लेकिन ऐसा होने के कुछ छोटे-छोटे फायदे भी हैं. ये फायदे व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक तीनों तरह के हैं.

इन चीजों के बारे में बात करने से पहले यह जान लेते हैं कि कश्मीर घाटी में इंटरनेट होने के बारे में कुछ बात कर लेते हैं.

बीती पांच अगस्त को अनुच्छेद 370, जो भारत के संविधान में जम्मू-कश्मीर को एक विशेष स्थिति देता था, हटाये जाने से एक दिन पहले सरकार ने कश्मीर में संचार के सारे माध्यम बंद कर दिये थे.

जैसे-जैसे हालात ठीक होते गए सरकार ने भी संचार के माध्यम वापिस बहाल कर दिये. पहले लैंड्लाइन फोन और अब पोस्ट-पेड मोबाइल फोन. लेकिन इंटरनेट यहां अभी तक बंद है और उसे बहाल किये जाने के कोई आसार अभी नज़र भी नहीं आ रहे हैं. ज़ाहिर है अब इंटरनेट बंद हुआ है तो इंटरनेट से जुड़ी हर चीज़, फिर चाहे वो फिल्में हों या गेम, सब बंद हो गए हैं.

ऐसे में मुश्ताक़ अहमद शेख जैसे लोगों को एक मौका दिखा जिसका वे फाइदा उठा रहे हैं. कुछ समय तक क्रॉकरी बेचने के बाद अब वे फिर से, अनंतनाग के बस स्टैंड में स्थित अपनी पुरानी जगह पर, सीडी और डीवीडी बेचने लगे हैं.

शेख की मानें तो उनका काम ठीक-ठाक चल रहा है. ‘कुछ साल पहले तक में एक दिन में 18 से 20 हज़ार रुपये की बिक्री कर लेता था. फिर ऐसा टाइम आया कि कई-कई दिन बोहनी तक नहीं होती थी.’ शेख सत्याग्रह को बताते हैं कि जब उन्होंने यह काम छोड़ा तब उनके पास एक-दो लाख का माल पड़ा हुआ था. ‘पिछले एक दो महीने में मैंने वो सारा माल बेच दिया है और नया माल लाके भी बेच रहा हूं. ज़्यादा नहीं तो 3-4 हज़ार की बिक्री हो जाती है एक दिन में आजकल’ शेख कहते हैं.

यह पूछने पर कि कश्मीर घाटी में इंटरनेट जल्दी चलना चाहिए या नहीं, शेख मुस्करा कर कहते हैं, ‘मैं यह माल खतम कर लूं तो चल जाये फिर.’

शेख की ही तरह फिल्मों से पैसे कमाने वाले कई और लोग हैं कश्मीर में जो लोगों की पेनड्राइव या हार्डडिस्क में फिल्में, सीरीज़ या गाने भर-भर के पैसे कमा रहे हैं.

ऐसे ही श्रीनगर के रामबाग इलाक़े में स्थित एक कम्प्यूटर प्रिंटिंग और फोटो कॉपी की दुकान चलाने वाले, मुदस्सिर अहमद, से सत्याग्रह ने बात की. मुदस्सिर कहते हैं कि इस वक्त उनकी तो मानो लॉटरी ही निकल पड़ी है.

‘अपनी पांच साल की दूकानदारी में मैंने कभी इतने पैसे नहीं कमाए हैं’ मुदस्सिर सत्याग्रह को बताते हैं.

मुदस्सिर और उनके जैसे कई अन्य लोग कुछ दिन के लिए दिल्ली या किसी और शहर जाके फिल्में, सिरीज़ और नए गाने डाउनलोड करके ले आते हैं और फिर उन्हें कश्मीर में मनचाहे दामों पर लोगों को बेचते हैं.

‘फायदा यह है कि एक बार डाउनलोड करके आप एक ही फिल्म या सिरीज़ हजारों बार बेच सकते हैं और बिलकुल ऐसा ही हो रहा है’ मुदस्सिर कहते हैं.

एयर टिकिट्स बेचने वाले ट्रैवल एजेंट्स भी इंटरनेट बंद होने का ठीक-ठाक लाभ उठा रहे हैं. इनमें से कुछ लोगों ने दिल्ली या अन्य जगहों पर अपने लोग बिठा रखे हैं जो फोन के जरिये टिकिट्स बुक कराते हैं.

उनके ग्राहकों को पता ही नहीं चलता कि टिकिट की कीमत सही है या ज्यादा, क्योंकि मालूम करने का कोई जरिया ही नहीं है.

जहां शेख और मुदस्सिर जैसे लोगों के फायदे आर्थिक हैं वहीं सैंकड़ों अन्य लोग हैं जो इंटरनेट बंद रहने का व्यक्तिगत लाभ कुछ दूसरी तरह से उठा रहे हैं.

जैसे 25 साल के उमर नबी. श्रीनगर के बाहर पंपोर नगर के रहने वाले उमर को पिछले एक साल से पबजी मोबाइल गेम की लत लग गयी थी. लत भी ऐसी कि हर दिन कम से कम 10 घंटे इसे खेलना लाज़िमी हो गया था और हजारों रुपये वे इस गेम पर खर्च कर चुके थे.

‘मुझे लगता था कि में इस गेम के बिना अब रह नहीं पाऊंगा. हर नया अपडेट, हर नया गैजेट और हर नया मोबाइल फोन जिस पर पबजी अच्छी चलता था, सबसे पहले मेरे पास होता था’ उमर ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं.

उमर नबी ने पिछले चार महीने से एक बार भी यह गेम नहीं खेला है और वे अब दूसरे कामों में अपना समय व्यतीत कर रहे हैं.

‘मैंने मुर्गियां पाल ली हैं. पहले जो समय में गेम खेलने में बिताता था अब वो समय में अपनी पालतू मुर्गियों के साथ बिता लेता हूं. जेहन पर से मानों एक बोझ हट गया है और मेरी सेहत भी बेहतर हो गयी है’ उमर मुस्कुराते हुए कहते हैं.

कश्मीर घाटी में पबजी से छुटकारा पाने वाले अकेले उमर नहीं बल्कि हजारों लोग हैं. इसके चलते न केवल वे बल्कि उनके घर वाले भी बहुत खुश हैं.

देश-दुनिया के बाकी हिस्सों की तरह कश्मीर घाटी में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं थी जिनको सोशल मीडिया की लत थी. ये लोग अपने फोन को अपने हाथों से ज़्यादा देर तक नीचे नहीं रख पाते थे. उनकी भी यह लत फिलहाल तो छूट गयी है.

‘मुझे लगता है यह इंटरनेट बंद होने का एक पारिवारिक फाइदा है’ श्रीनगर के रहने वाले मुहम्मद यूसुफ कहते हैं. यूसुफ के मुताबिक पहले उनकी 17 साल की बेटी पूरा का पूरा दिन या तो फेसबुक या इंस्टाग्राम पर बिता देती थी.

‘न उसे खाने का होश होता था न पीने का और बात करो तो पांच बार दोहरानी पड़ती थी’ यूसुफ कहते हैं, ‘में खुश हूं कि फोन वापिस फोन बन गया है, जिसपर बात करके उसको फिर परे रख दिया जाता है.’

सत्यग्रह ने दर्जनों ऐसे माता-पिताओं से बीते हफ्ते बात की. इनमें से ज्यादातर यह मानते हैं कि इंटरनेट बंद होने के नुकसान ज़्यादा हैं, लेकिन वे इसके बंद होने के फायदों से भी इनकार नही करते हैं.

‘घर के पांच सदस्य हाथ में फोन लेकर एक साथ बैठते तो थे लेकिन पहले एक-दूसरे से बात नहीं कर पाते थे. मुझे तो लगता है कि मैंने अपने बच्चों से सालों में इतनी बातें की होंगी जितनी पिछले चार महीनों में की हैं’ दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले में रहने वाले, अब्दुल ख़ालिक़ कहते हैं.

व्यक्तिगत, पारिवारिक और आर्थिक फाइदों से परे इंटरनेट बंद रहने का एक सामाजिक फाइदा भी है और वह है अफवाहों पर लगाम लगना. इसमें कोई शक नहीं है कि अफवाहों का बाज़ार बीते कई सालों से विश्व भर में सोशल मीडिया की वजह से ही गरम रहा है. और कश्मीर जैसी संवेदनशील जगह पर सोशल मीडिया पर फैली अफवाहें आग में घी का काम करती आई हैं.

कुछ साल पहले की ही बात है जब कश्मीर में पोलियो के टीकों को लेकर यह अफवाह उडी थी कि वे खराब हैं जिससे बच्चों को खतरा हो सकता है. उस समय लगभग पूरा कश्मीर अस्पतालों में उमड़ पड़ा था और एक अफरा-तफरी का माहौल पैदा हो गया था.

यह उन अफवाहों से परे थी जो कश्मीर में आम तौर पर उड़ती रहती हैं.

लेकिन जब से इंटरनेट बंद रहा है अफवाहों का बाज़ार लगता ज़रूर है लेकिन बहुत ठंडा रहता है.

‘आजकल यहां लोगों को सही खबरें भी कई-कई दिनों के बाद पता चल रही हैं तो अफवाहें कैसे उड़ेंगी. सोशल मीडिया बंद है तो ज़ाहिर है अफवाहें नहीं उड़ रही हैं’ एक वरिष्ठ पत्रकार सत्याग्रह से बात करते हुए कहते हैं.

यह सब फायदे होने का हरगिज़ यह मतलब नहीं है कि कश्मीर के लोगों को इंटरनेट की सुविधा से वंचित रखा जाये. आजकल के दौर में इंटरनेट बंद होने का मतलब शायद वही लोग समझ पाते हैं जिनके साथ ऐसा होता है.

डॉक्टर, पत्रकार, टीचर, छात्र, मरीज, बड़े, बूढ़े, जवान - ऐसा कोई नहीं है जिसको इंटरनेट बंद होने से दिक्कत नहीं होती है.