सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सूचना का अधिकार कानून (आरटीआई) का दुरुपयोग रोकने के लिए दिशानिर्देश बनाने की जरूरत है. अदालत ने यह बात केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) और राज्य सूचना आयोगों (एसआईसी) में खाली पड़े पद भरने को लेकर दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान की. प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे और न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति सूर्यकांत की पीठ ने कहा, ‘हम आरटीआई कानून के खिलाफ नहीं हैं लेकिन हमें लगता है कि इसके नियमन के लिए किसी प्रकार के दिशानिर्देश बनाना जरूरी है.’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘कुछ लोग आरटीआई दाखिल करने के विषय से किसी तरह संबंधित नहीं होते. यह कई बार आपराधिक धमकी की तरह होता है जिसे ब्लैकमेल भी कहा जा सकता है.’ आरटीआई के तहत आवेदकों की बाढ़ आने को ‘गंभीर समस्या’ करार देते हुए अदालत ने कहा कि वह इस कानून के खिलाफ नहीं है, लेकिन यह सुनिश्चित करने के लिए कोई प्रणाली बनानी होगी कि प्रभावित लोग या संबंधित लोग ही इस अधिकार का इस्तेमाल करें.
मुख्य न्यायाधीश ने बंबई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के तौर पर अपना अनुभव साझा किया. उन्होंने कहा कि एक बार एक अधिकारी ने उन्हें बताया कि आरटीआई के तहत सवालों की वजह से महाराष्ट्र में एक मंत्रालय में कामकाज ठप हो गया है. हालांकि आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने शीर्ष अदालत के कई फैसलों का जिक्र किया और कहा कि जनता को जानने का बुनियादी अधिकार है. उनका यह भी कहना था कि आरटीआई के तहत जानकारी मांगने में कोई सार्वजनिक या निजी हित होना जरूरी नहीं है.
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