हाल ही में कर्नाटक में हुए विधानसभा उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी को जबरदस्त बढ़त मिलने के बावजूद मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा की मुश्किलें घटती नहीं दिख रही हैं. यह उपचुनाव कांग्रेस और जेडीएस के उन 15 विधायकों की सीटों पर हुआ था जिन्हें बीती जुलाई भाजपा से जुड़ने की वजह से अयोग्य घोषित कर दिया गया था. इन्हीं विधायकों की बग़ावत के चलते कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस के गठबंधन वाली एचडी कुमारस्वामी सरकार गिर गई थी. इसके बाद प्रदेश की सत्ता बीएस येदियुरप्पा के नेतृत्व में भाजपा के हाथ में आ गई थी.

चूंकि कर्नाटक में बहुमत के लिए भाजपा को छह और विधायकों की जरूरत थी इसलिए उपचुनाव के नतीजों के बाद मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद जताई गई थी. लेकिन हाल-फिलहाल ऐसा होता नहीं दिख रहा है.

इसका एक बड़ा कारण कांग्रेस-जेडीएस के पूर्व विधायकों की महत्वाकांक्षाएं हैं. दरअसल अपने मंत्रिमंडल के गठन के वक़्त येदियुरप्पा ने अधिकतम 34 में से सिर्फ़ 17 मंत्री ही बनाए और बाकी 17 मंत्रालयों को खाली रखा ताकि भाजपा से जुड़ने वाले कांग्रेस के 14 और जेडीएस के तीन विधायकों को भी मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सके. लेकिन इनमें से दो सीटों का मामला अदालत में होने की वजह से 15 सीटों पर ही उपचुनाव हुआ. इन पर सिर्फ़ ग्यारह बाग़ी विधायक ही जीत हासिल करने में कामयाब रहे.

जानकारी के अनुसार अब ये सभी विधायक एकजुट होकर अपने खेमे के न सिर्फ़ जीत चुके बल्कि हारने वाले विधायकों को भी मंत्री बनाने की मांग पर अड़े हैं. साथ ही इनमें से कई गृह, स्वास्थ्य एवं परिवार और लोक निर्माण जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों के साथ-साथ उपमुख्यमंत्री के पद पर भी अपना दावा कर रहे हैं. विश्लेषकों की मानें तो इसी बात ने येदियुरप्पा के लिए आगे कुआं पीछे खाई जैसी स्थिति पैदा कर दी है.

जानकारों के मुताबिक इन मांगों को पूरा करने के लिए येदियुरप्पा को कैबिनेट में बड़ा फेरबदल करना पड़ेगा. इसका सीधा मतलब है सरकार के कुछ मौजूदा मंत्रियों और उपेक्षित महसूस कर रहे भाजपा के कई वरिष्ठ विधायकों को नाराज़ करना. वहीं, कांग्रेस-जेडीएस से आए विधायकों को नज़रअंदाज करने पर कर्नाटक में एक बार फ़िर किसी बड़े सियासी फेरबदल की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है.

उपचुनाव जीत चुके कुछ विधायकों ने हाल ही में नेता प्रतिपक्ष सिद्धारमैया को अपना नेता घोषित कर इस संभावना से जुड़ी चर्चाओं को हवा दी है. अस्पताल में भर्ती सिद्धारमैया से मुलाकात के बाद इन विधायकों का कहना था कि ‘हमने घर भले ही बदल लिया है, लेकिन मन नहीं बदला है.’ उधर सिद्धारमैया भी बीते कुछ महीनों से कर्नाटक में कभी भी दोबारा चुनाव होने की बात दोहराकर अपने कार्यकर्ताओं को मुस्तैद रहने का संदेश देते रहे हैं.

इस बीच येदियुरप्पा ने दावा किया है कि उपचुनाव में हार चुके विधायकों को उनके मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया जाएगा. लेकिन इतने भर से स्थिति सुधरती नहीं दिख रही है. दरअसल कांग्रेस और जेडीएस के अलावा भाजपा के भी कई वरिष्ठ विधायक मंत्रीपद हासिल करने के लिए मुख्यमंत्री पर जबरदस्त दवाब बना रहे हैं.

मिली जानकारी के अनुसार बीते कुछ दिनों में दर्जन भर से ज्यादा विधायकों ने इस सिलसिले में येदियुरप्पा से मुलाकात की है. इनमें भाजपा के वरिष्ठ विधायक उमेश कट्टी और श्रीमंत पाटिल प्रमुख हैं. इसी तर्ज पर एक अन्य विधायक सोमशेखर रेड्डी के नेतृत्व में मुख्यमंत्री से मिलने गए रेड्डी समुदाय के छह विधायकों ने उनमें से किसी एक को मंत्री बनाने की अपील की है.

कर्नाटक की राजनीति पर नज़र रखने वाले कई विश्लेषकों का यह भी मानना है कि कैबिनेट विस्तार के दौरान नए मंत्रियों की बजाय उपमुख्यमंत्रियों का चयन करना येदियुरप्पा के लिए कहीं ज्यादा बड़ी चुनौती साबित होगा. फिलहाल कर्नाटक में लक्ष्मण सवदी, सीएन अश्वथ नारायण और गोविंद कारजोल की शक्ल में तीन उपमुख्यमंत्री पहले से ही मौजूद हैं. इनके बाद भी भाजपा में उपमुख्यमंत्री बनने की ख़्वाहिश रखने वाले नेताओं की फेहरिस्त लगातार बढ़ती ही जा रही है. कांग्रेस-जेडीएस से आए विधायकों में से भी कुछ की नज़र इस पद पर लगातार बनी हुई है.

अभी इस पद के प्रमुख दावेदार नेताओं की बात करें तो इनमें कर्नाटक के मौजूदा ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री केएस ईश्वरप्पा और राजस्व मंत्री आर अशोक प्रमुख हैं. ये दोनों ही प्रदेश की पूर्ववती भाजपा सरकार में उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं. इनके अलावा कुछ जानकार सीटी रवि जैसे भाजपा के दिग्गज नेता को भी उपमुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल मानते हैं.

कर्नाटक के प्रभावशाली दलित नेता और स्वास्थ्य एवं परिवार मंत्री बी श्रीरामुलू भी ख़ुद को उपमुख्यमंत्री बनाने के लिए लगातार लॉबीइंग कर रहे हैं. पिछले साल हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा ने श्रीरामुलू को उपमुख्यमंत्री के तौर पर पेश किया था, लेकिन पार्टी की सरकार नहीं बन पाने से उनकी हसरत पूरी नहीं हो पाई. लेकिन सूबे में भाजपा की सरकार बनने के बाद भी श्रीरामुलू को उपमुख्यमंत्री नहीं बनाए जाने से उनके समर्थक भड़क गए और प्रदर्शन पर उतर आए. इस उपचुनाव के बाद से ही श्रीरामुलू पार्टी की राजनीतिक गतिविधियों से दूरी बनाए हुए हैं.

हाल ही में मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के राजनीतिक सचिव व विधायक एमपी रेणुकाचार्य ने भी उपमुख्यमंत्री सीएन अश्वथ नारायण को पद छोड़ने की चुनौती देकर पार्टी में अंदरखाने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था. वहीं भाजपा से जुड़े सूत्रों का कहना है कि पार्टी का एक बड़ा खेमा लक्ष्मण सवदी को उपमुख्यमंत्री बनाए जाने की वजह से नाराज़ है.

इस सब के बीच कर्नाटक भाजपा के जिन नेताओं को अपने उपमुख्यमंत्री बनने की संभावना कमतर नज़र आती है, उन्होंने इस पद की ज़रूरत पर ही सवालिया निशान खड़ा कर येदियुरप्पा की परेशानियों को कुछ कम किया है. जानकार बताते हैं कि ख़ुद येदियुरप्पा भी कर्नाटक में उपमुख्यमंत्री पद को बरक़रार रखने के पक्षधर नहीं है. पार्टी की अंदरूनी खींचतान को थामने के अलावा इसका एक कारण यह भी माना जा रहा है कि येदियुरप्पा पार्टी में नए शक्ति केंद्र बनते नहीं देखना चाहते.

इस पूरी राजनैतिक उठापटक के बीच कर्नाटक के भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नलिन कुमार कटील ने कहा है कि मंत्रिमंडल विस्तार से जुड़े फैसलों में वे या पार्टी का कोई भी नेता हस्तक्षेप नहीं करेगा. वहीं ख़बरों के अनुसार इस ऊहापोह से निपटने के लिए बीएस येदियुरप्पा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से मशवरा लेने दिल्ली जा सकते हैं. जानकारों का यह भी कहना है कि कर्नाटक में मंत्रिमंडल का विस्तार 15 जनवरी के बाद कभी भी हो सकता है. इतने समय तक कैबिनेट में विस्तार या फेरबदल को टालने के पीछे शुभ मुहुर्त न होने का हवाला दिया जा रहा है.

प्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार इस बारे में कहते हैं कि शुभ मुहुर्त का कोई और फायदा भले न हो, लेकिन तब तक येदियुरप्पा को निर्णय लेने का उचित समय ज़रूर मिल जाएगा. वहीं, प्रदेश भाजपा के एक वरिष्ठ सूत्र कर्नाटक के मौजूदा और संभावित राजनैतिक हालात के बारे में खुलकर बात करने से बचते हैं, लेकिन वे येदियुरप्पा के राजनैतिक इतिहास को याद करने के बहाने उनकी मुश्किल डगर का इशारा ज़रूर देते हैं. वे कहते हैं, ‘येदियुरप्पा अभी तक बतौर मुख्यमंत्री एक बार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए हैं, उन्हें 2007 में सात दिन, 2008 में करीब तीन साल और 2018 में सिर्फ़ दो दिनों में यह पद छोड़ना पड़ा था.’