इस बार अचानक, लगभग भागकर, एक क़ानूनी सिलसिले में, पेरिस जाना पड़ा. पेरिस जितना हमने जाना-घूमा-भटका, उसका अधिकांश रज़ा साहब के साथ या उनके उकसावे पर. अब पेरिस एक छूटा शहर है: रज़ा साहब ने तो साठ बरस वहां बिताने के बाद अपने जीवन के अन्तिम साढ़े पांच बरस स्वदेश में बिताने के लिए छोड़ा: उनका छोड़ा शहर, अब हमारे लिए छूटा शहर है. वह सुन्दर है, उसमें प्राचीनता और आधुनिकता का अपूर्व संगम है- वह लगातार चलता शहर है. दिल्ली के मुक़ाबले छोटा है. वह अब छूटा, सूना शहर है.

हम नात्रे दाम के पास एक छोटे से पर सुरम्य और सुघर होटल में रूके. पहले ही दिन दीख पड़ा नात्रे दाम का पिछला जला हुआ हिस्सा जिसकी मरम्मत का काम चल रहा है. शायद दो बरस और लगेंगे. सुबह करीब साढ़े नौ बजे हमने पा ली शेक्सपीयर एण्ड कम्पनी नाम की पुरानी पुस्तकों की दूकान जो दस बजे खुलनेवाली थी. दस बजे वहां ख़ासी भीड़ थी. दूकान अब और बड़ी हो गयी है पर उसकी बाहरी धजा वैसी है जैसी दशकों पहले पहली बार देखी थी. पुस्तकों की संख्या बढ़ गयी है और कविता का खण्ड ख़ासा बड़ा है. संसार की अनेक भाषाओं की कविता और कवियों के पुस्तकाकार रूप सजे रहते हैं. इधर कई पुराने आधुनिकों जैसे यीट्स, ईलियट, ऑडेन आदि के कई पुराने संग्रह और संचयन, नये और पुराने दोनों ही, अनेक नयनाभिराम संस्करणों में निकले हैं.

दोपहर को, क़ानूनी कार्रवाई ख़त्म होने के बाद, पैदल सेन नदी का एक पुल पार कर लूव्र संग्रहालय के बग़ल से गुज़रते हुए हम रू दि रिवोली पहुंच गये जिस पर आगे चलकर एक पुरानी पुस्तकों की दूकान गालियानी है. वहां अंग्रेज़ी पुस्तकों का हिस्सा कुछ और बढ़ गया है. उसमें कई भाषाओं जैसे फ्रेंच, जर्मन, रूसी, जापानी, चीनी, नावजियन आदि भाषाओं के साहित्य के अंग्रेज़ी अनुवाद की पुस्तकें व्यवस्थित ढंग से एक अलग खण्ड में करीने से लगी हैं. वहां अंग्रेज़ी में विचार, दर्शन, अध्यात्म, समाजशास्त्र, राजनीति, जीवनी, वर्तमान समय आदि पर पुस्तकों की संख्या भी बहुत है, यात्रा वृत्तान्त, आत्मकथाओं आदि के अलावा.

इस बार ध्यान गया कि स जर्मेद प्रे पर एक बड़ी दूकान सिर्फ़ इतिहास और समाजशास्त्र की पुस्तकों की है. एक सड़क का नाम दांते पर, एक का अनातोले फ्रांस पर भी है. अपने अनेक लेखकों, कलाकारों, विचारकों आदि के नाम पर पेरिस में सड़कें, चौराहे, चौक, रेलवे स्टेशन आदि हैं. उसके बाद अपने देश में, लगभग हर दिन, हर दिन बुद्धिजीवी शब्द को गाली में बदले जाना, लेखकों-कलाकारों को हाशिये पर अवांछित भीड़ की तरह ढकेले जाना, विद्वत्ता और बुद्धि का, ज्ञान और विज्ञान का दैनिक लांछन, वह भी सत्ता और शक्ति के उच्च स्तरों से लेकर गली-मुहल्लों के लुच्चे-लफंगों द्वारा किया जानेवाला अपमान बहुत त्रस्त करता है. एक विशालकाय, पर दृष्टि, विचार और सहानुभूति में टुच्चा और संकीर्ण समाज बनकर हम इस क़दर बेशर्मी से इतरा क्यों रहे हैं यह समझ में आना मुश्किल है.

टूटता-छूटता

भारतीय समाज अपनी भारतीयता और सामाजिकता दोनों में टूटता और उनसे दूर टूटता समाज बनता जा रहा है. हालांकि देश का ज़्यादातर समाज इस टूट-फूट में शामिल नहीं है, भले निरुपाय सा देख भर रहा है. अगर यही अबाध चलता रहा और बढ़ता रहा तो फिर इसे भारतीय और समाज दोनों कहना असम्भव हो जायेगा. इस सभ्यता की जो अन्तर्भूत ऊर्जा है, वह इस समय इतनी अव्यक्त-अप्रगट है कि कई बार सन्देह होता है कि वह बची भी है या नहीं. अगर बची है तो उसे दबाने और निश्शेष करने के सुनियोजित और विराट् प्रयत्न कम नहीं हो रहे हैं. वह सदियों से अपराजेय और अदम्य रही है: अब भी वैसी ही है यह मानने का मन तो बहुत है, पर जितनी तेज़ी से विघटन हो रहा है उसके चलते यह विश्वास करना दिन ब दिन कठिन से कठिनतर होता जाता है.

ऐसे अभागे और अभिशप्त समय में साहित्य, कलाओं, ज्ञान आदि का अपना धर्म प्रतिरोध कर ही पूरा हो सकता है: ऐसे सजग-सुविचारित और अथक प्रतिरोध से ही भारतीयता की बुनियादी अवधारणा का पुनर्वास हो सकता है. सौभाग्य से, ऐसा प्रतिरोध कम नहीं है. वह इधर बढ़ता भी जा रहा है. पर अभी तक उसका आयतन, जो परिस्थिति है उसके अनुपात में, पर्याप्त नहीं कहा जा सकता. यह उम्मीद करना चाहिये कि अपनी स्वाभाविक गतिशीलता और ऊर्जा से, अपनी इन दिनों ज़रूरी हो गयी स्फूर्ति से वह आगे बढ़ेगा-फैलेगा. यह तो स्पष्ट है कि ऐसे प्रतिरोध को, आसानी से या अनदेखे विकसित नहीं होने दिया जायेगा. हम जिस निगरानी के भयावह युग में पूरे संसार में हैं उसमें कुछ भी अलक्षित नहीं जा पायेगा. प्रतिरोध का बहुत अवरोध होगा यह तो ज़ाहिर है और उसे इस अवरोध को भी अपनी शक्ति का संबल या स्रोत बनाना होगा.

ऐसे समय में किसी भी सृजनकर्मी को तिहरी ज़िम्मेदारी निभाना पड़ती है अगर उसे अपने सर्जनात्मक, नैतिक और नागरिक कर्तव्य निष्ठा और विश्वास के साथ निभाने हों: पहली तो यह कि वह अपनी भाषा और अपने माध्यम की सघनता, उत्कटता, मानवीयता, अन्तःकरण, साहस, कल्पनाशीलता और नवाचार को संघर्षपूर्वक पोसे-बचाये-बढ़ाये. दूसरी यह कि वह अपने माध्यम को उसकी पूरी जटिलता और सूक्ष्मता में जीवित रखे और उसे अभद्र, असभ्य, सतही, संकीर्ण, मतान्ध-धर्मान्ध-विचारान्ध होने से आग्रहपूर्वक बचाये और मुक्त और स्वाभिमानी रखे. तीसरी यह कि वह अन्याय-अत्याचार-हिंसा-हत्या आदि की बढ़ती मानसिकता और लोकप्रियता का ज़ाहिर नागरिक प्रतिरोध करे और उन शक्तियों के पक्ष में दीखे जो हमारे समय और समाज में स्वतन्त्रता-बराबरी-न्याय बढ़ाना-बचाना चाहती है. ऐसे समय में तटस्थता, चुप्पी आदि सभी घातक और ग़ैरसर्जनात्मक काम होंगे: सर्जनात्मक, वैचारिक और नागरिक कायरता और भयाक्रान्ति के अक्षम्य उदाहरण या संस्करण.

सवाल यह भी है कि कोई नहीं क्या आप स्वयं पर अन्तःकरण और मानवीयता, सृजन और साहस की ओर से निगरानी रख रहे हैं?

युवा क्षोभ

इस समय देश के कई हिस्सों, उसके कई विश्वविद्यालयों में युवा क्षोभ छात्र आन्दोलन के रूप में प्रगट हो रहा है. हमेशा की तरह प्रशासन और पुलिस क्षोभ के सार्वजनिक इज़हार से सख़्ती और कई बार ख़ासी बर्बरता से पेश आ रहे हैं. नये नागरिकता क़ानून और उसमें हाल ही में किये संशोधनों को लेकर व्यापक बेचैनी फैल रही है. संसद द्वारा बाक़ायदा पारित इस क़ानून का पालन न करने की कई राज्यों ने घोषणा की है. सत्तारूढ़ दल के कई गठबन्धी साथी इस क़ानून से असहमति व्यक्त कर रहे हैं. जो भी हो, एक व्यापक बेचैनी नागरिकता को लेकर फैल रही है. यह तब जब नागरिकता कोई ज्वलन्त मुद्दा नहीं है, बेरोज़गारी, ग़रीबी, गिरती अर्थव्यवस्था के रहते. अभी यह आकलन कठिन है कि भले बेचैनी नागरिकता को लेकर हो रही है, असल में वह ज़्यादा आर्थिक मन्दी, बढ़ते भय, घटते अवसरों आदि को लेकर भी है.

कम से कम स्वतन्त्रता पाने के बाद भारत के सामने, इस मुक़ाम पर, फिर यह मुद्दा है कि किस तरह का भारत हम बनाने जा रहे हैं. हमारे संविधान से स्वतंत्रता-समता-न्याय का जो नया सामाजिक धर्म भारत के लिए ज़रूरी माना था और जिस पर हम अब तक सफल-विफल चलते रहे हैं वह बना रहेगा या कि हाशिये पर डाल दिया जायेगा. उनके बारे में मुखालाप, पहले की ही तरह, रस्मी तौर पर, होता रहेगा लेकिन कार्यालाप में उनकी प्रासंगिकता कम होती जायेगी. इस समय ऐसा माहौल बन रहा है कि मानों नागरिकता ही नहीं स्वतंत्रता, समता और न्याय के हमारे मौलिक अधिकार हमें राज्य ने ही दिये हैं और वह अगर चाहे तो वापस ले सकता है, उनमें कटौती तो कर ही सकता है. यह विडम्बना भी अनदेखी नहीं जा सकती कि महात्मा गांधी के 150 वर्ष पूरे होने पर हम स्वराज के बजाय हिंदू राज स्थापित करने की मुखर और प्रायः उद्दण्ड चर्चा करने लगे हैं और सत्य व अहिंसा से जितनी दूर जाना संभव है उतनी दूर जाने की हम कोशिश कर रहे हैं. राजनीति का अन्य सामाजिक वृत्तियों जैसे धर्म, अभिव्यक्ति, ज्ञान, सृजन, मीडिया आदि पर ऐसा भयानक वर्चस्व पहले कभी नहीं था जैसा कि आज है. हमने समाज में रहना लगभग बन्द कर दिया है, अब हम सिर्फ़ राज में रहने लगे हैं.

युवा क्षोभ ज़रूर ही इन मुद्दों के बारे में सजग होगा. उसे निश्चय ही इसकी चिन्ता है कि इस बढ़ते राज में किस तरह की स्वतन्त्रता और अवसर, कैसा न्याय, कैसी बराबरी, कितनी मुक्ति, कितना ज्ञान आदि संभव होंगे. हम कितने खुले समाज होंगे जहां की नागरिकता सबके लिए समान होगी. संकट तो कई स्तरों पर है और युवाओं को बहुत सर्जनात्मक और अहिंसक रूप से यह सोचना और जताना होगा कि वे किस तरह के भारतीय समाज का सपना देखते हैं और किस तरह की भयावह सचाइयों से घिरे रहकर भी वे उस सपने को पूरा करने के लिए अनेक स्तरों पर सक्रिय रहने को तैयार हैं. विचार, दृष्टि, सक्रियता, संगठन आदि को व्यापक स्तर पर गूंथने का काम आसान नहीं है और कुछ फ़ौरी लक्ष्यों के लिए उसे हाशिये पर भी ढकेला जा सकता है. बहकने के प्रलोभन भी बहुत होंगे और उनके झांसे में आनेवालों की युवा संख्या कम नहीं होगी.