1- पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने हाल में कहा कि भारत में निर्वाचित प्रतिनिधियों को देखें तो मतदाताओं की संख्या उनके अनुपात में बहुत ज़्यादा है. उनका कहना था कि लोकसभा की क्षमता के बारे में आख़िरी बार 1977 में संशोधन किया गया था जो 1971 में हुई जनगणना पर आधारित था और उस वक़्त देश की आबादी केवल 55 करोड़ थी. पूर्व राष्ट्रपति के मुताबिक उस वक़्त के मुकाबले अब आबादी दोगुने से ज़्यादा बढ़ गई है और इस कारण अब अब लोकसभा की सीटें बढ़ा कर 1000 करने और इसी के अनुपात से राज्यसभा की सीटें भी बढ़ाई जानी चाहिए. इस मुद्दे के अलग-अलग पहलुओं को टटोलती बीबीसी पर मानसी दाश की रिपोर्ट.

1000 सीटों वाली लोकसभा बनी तो क्या होगा फ़ायदा

2-नए नागरिकता विधेयक पर देश भर में विरोध प्रदर्शन जारी हैं. पूर्वोत्तर से लेकर उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में कई जगह इसका विरोध हिंसा में भी तब्दील हुआ है. न्यूजलॉन्ड्री पर रोहिण कुमार की यह रिपोर्ट इस सवाल की पड़ताल करने की कोशिश करती है कि एनआरसी का समर्थन करने वाले असम के मूलनिवासी नागरिकता कानून विधेयक का जमकर विरोध क्यों कर रहे हैं.

क्या नागरिकता संशोधन कानून ने भाजपा को उसके ही जाल में उलझा दिया है?

3-एफएसएसएआई यानी भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण का काम है देश में खाने के पदार्थों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना. इसके लिए उसने कुछ नियम बनाए हैं. लेकिन क्या इन नियमों का पालन हो रहा है? क्या हम पेप्सिको से लेकर हल्दीराम तक तमाम नामचीन कंपनियों के जो भी पैकेटबंद खाद्य पदार्थ खा रहे हैं, वे सुरक्षित हैं? डाइन टू अर्थ पर अमित खुराना और सोनल धींगरा की यह रिपोर्ट इन सवालों का जवाब देती है.

ये क्या खा रहे हैं आप?

4- हर 16 मिनट में भारत में कहीं न कहीं किसी महिला का बलात्कार होता है. यह भारत के लिए एक लैंगिक बीमारी की तरह है जो 21वीं सदी में लैंगिक विभाजन और लचर न्याय व्यवस्था के कारण बढ़ती जा रही है. डायचे वेले पर नेहल चौधरी की रिपोर्ट.

भारत में बलात्कार का संकट क्यों नहीं हल हो रहा

5- पाकिस्तान की एक अदालत ने पूर्व राष्ट्रपति और सेना के मुखिया रह चुके परवेज मुशर्रफ को देशद्रोह का दोषी ठहराते हुए उन्हें मौत की सजा सुनाई है. उसका यह तक कहना है कि अगर दुबई में रह रहे परवेज मुशर्रफ की मौत इस सजा से पहले हो जाए तो उनकी लाश इस्लामाबाद के डी चौक पर तीन दिन तक लटकाई जाए. क्या इस सजा का क्रियान्वयन हो पाएगा. द प्रिंट हिंदी पर आयशा सिद्दीका का लेख.

मुशर्रफ़ को सजा-ए-मौत: क्या पाकिस्तानी अदालतें अब बिल्कुल स्वतंत्र और दबावमुक्त हैं?