कुछ शहर महज एक बेहद हौलनाक हादसे की वजह से रहती सभ्यता तक ‘मौत का शहर’ कहलाते हैं और कभी न भरने वाले जख्म उसके कोने-अंतरों में स्थायी जगह बनाकर सदा रिसते रहते हैं. हरियाणा, पंजाब और राजस्थान की सीमाओं के ऐन बीच पड़ने वाला जिला सिरसा का कस्बानुमा शहर डबवाली ऐसा ही है. आज से ठीक 24 साल पहले यहां ऐसा भयावह अग्निकांड हुआ था, जिसकी दूसरी कोई मिसाल देश-दुनिया में नहीं मिलती.

इस अग्निकांड में महज सात मिनट में 400 लोग ठौर जिंदा झुलस मरे थे. इनमें 258 बच्चे और 143 महिलाएं थीं. मृतकों की कुल तादाद 442 थी और घायलों की 150. कई परिवार एक साथ जिंदगी से सदा के लिए नाता तोड़ गए थे. मौत की यह बरसात 23 दिसंबर 1995 की दोपहर एक बज कर 40 मिनट पर शुरू हुई थी और सात मिनट में इतनी जिंदगियां स्वाहा करते हुए 1.47 पर बंद हुई थी. डबवाली अग्निकांड की भयावहता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि देश में सबसे ज्यादा चर्चित उपहार सिनेमा की आग में 59 लोगों की मृत्यु हुई थी.

जिस शहर की एक फीसदी आबादी सिर्फ सात मिनट में तबाह हो गई हो उसकी लगभग हर गली के किसी न किसी घर में इसके निशान तो होंगे ही. जिनका अपना या दूर का कोई मरा, या जो गंभीर जख्मी होकर जिंदा होने के नाम पर जिंदा हैं, वे उस अग्निदिन के बारे में बात करने से परहेज करते हैं. उस खौफनाक हादसे को याद करते ही वे मानसिक तौर पर असंतुलित हो जाते हैं और फिर संभलने में काफी समय लगता है. इसकी पुष्टि डबवाली अग्नि पीड़ितों के बीच सक्रिय रहकर काम करते रहे मनोचिकित्सक डॉक्टर विक्रम दहिया भी करते हैं. बावजूद इसके कुछ लोगों से बहाने से बात होती है. धीरे-धीरे वे अपनी मूल पीड़ा और दरपेश दिक्कतों की अंधेरी कोठरियों में हमें ले जाते हैं.

उमेश अग्रवाल डबवाली अग्निकांड के सरकारी तौर पर घोषित 90 प्रतिशत विकलांग हैं. हादसे के वक्त वे नौवीं जमात के छात्र थे. शेष शरीर के साथ-साथ उनके दोनों हाथ भी पूरी तरह झुलस गए थे. बुनियादी जानकारी के बावजूद वे कंप्यूटर नहीं चला सकते. यहां तक कि किसी को पानी तक नहीं पिला सकते. मिले मुआवजे से कब तक गुजारा होगा? भारत सरकार की आयुष्मान सरीखी योजनाओं का लाभ इसलिए नहीं ले सकते कि जले हाथों के फिंगरप्रिंट नहीं आते, जो नियमानुसार जरूरी हैं. इसके लिए वे प्रधानमंत्री और हरियाणा के मुख्यमंत्री सहित पक्ष-विपक्ष के कई बड़े नेताओं से कई बार मिल चुके हैं. लेकिन नागरिकता कानून से लेकर धारा 370 तक तो बदली जा सकती है पर सरकारी नौकरी देने के नियम–कायदे नहीं!

अग्निकांड के बाद राजीव मैरिज पैलेस

अग्निपीड़िता सुमन कौशल की भी यही व्यथा है. सरकारी निजाम उन्हें पूरी तरह विकलांग और वंचित तो मानता है लेकिन सरकारी नौकरी का हकदार नहीं. उमेश और सुमन सरीखे बहुतेरे युवा डबवाली में हैं, जो अग्निकांड का शिकार होने के समय बच्चे थे. अब आला तालीमयाफ्ता बेरोजगार हैं. 24 पढ़े-लिखे युवा ऐसे हैं जो सौ फीसदी अंगभंग का सरकारी सर्टिफिकेट लिए भटकते फिर रहे हैं लेकिन उन्हें नौकरियां नहीं मिल रहीं.

23 दिसंबर 95 की त्रासदी ने बच गये लोगों को कदम-कदम पर विकलांग और कुरूप होने का अमानवीय एहसास कराया है. इस पत्रकार की मुलाकात एक ऐसी महिला से हुई जिसका चेहरा लगभग पूरी तरह जल गया था और प्लास्टिक सर्जरी उसे सामान्य की सीमा तक भी नहीं ला सकी थी. उन्होंने बताया कि बसों में सफर करते हैं तो जले चेहरों के कारण दूसरी सवारी पास तक नहीं बैठती या नहीं बैठने देती. घृणा का भाव आहत करता है. यह नंगा सामाजिक सच है जिसकी क्रूरता अकथनीय है.

डबवाली अग्निकांड ने बड़े पैमाने पर लोगों को सदा के लिए मनोरोगी बना दिया है. किसी ने अपनी संतान खोई है तो कोई सात मिनट की उस आग में अनाथ हो गया. किसी की पत्नी चली गई तो किसी का पति. वे सात मिनट सैकड़ों लोगों के दिलों-दिमाग में 24 साल के बाद आज भी ठहरे हुए हैं. 442 लोग, जिनमें ज्यादातर मासूम बच्चे और महिलाएं थीं, तो जल मरे लेकिन वे सात मिनट हैं कि भस्म होने का नाम ही नहीं लेते.

डबवाली अग्निकांड राजीव मैरिज पैलेस में हुआ था. 23 दिसंबर 1995 को यहां डीएवी स्कूल का सालाना कार्यक्रम चल रहा था. हॉल बच्चों, अभिभावकों और मेहमानों से खचाखच भरा था. अचानक वहां आग लग गई और देखते ही देखते 400 लोग तिल-तिल झुलसकर राख हो गए. 42 ने अगले दिन दम तोड़ दिया. 150 से ज्यादा घायल हुए जो आठ बड़े मेडिकल कॉलेजों के लंबे इलाज के बाद भी दो से सौ प्रतिशत तक स्थायी रुप से विकलांग हैं. ये सरकारी आंकड़े हैं. गैरसरकारी अनुमान के अनुसार पीड़ितों की संख्या इससे ज्यादा है.

डबवाली अग्निकांड के मृतकों की याद में बना स्मारक

डबवाली फायर विक्टिम्स एसोसिएशन के प्रधान विनोद बंसल बताते हैं कि उस वक्त ‘दाह संस्कार के लिए श्मशान में जगह कम पड़ गई थी तो खेतों में अंतिम संस्कार किए गए. बमुश्किल मृतकों की शिनाख्त हो पाई. 23 दिसंबर 1995 के उस मंजर को डबवाली का कोई भी बाशिंदा न तो भूल सकता है और न याद रखना चाहता है. जिन्होंने उस भयावह अग्निकांड को भुगता या देखा, उनकी स्थिति आज भी विक्षिप्तों से कम नहीं. मुआवजे और मुनासिब सरकारी इलाज की लड़ाई हमने सुप्रीम कोर्ट तक लड़ी है. फिर भी पूरा इंसाफ नहीं मिला. हर सरकार और डीएवी प्रबंधन ने बेइंसाफी, बेरुखी दिखाई और निर्दयता से दांव-पेंच बरते. सरकारों ने कुछ मुआवजा दिया और घायलों का एम्स से लेकर पीजीआई तक इलाज करवाकर अपना पल्ला झाड़ लिया.’

अग्निकांड के बाद जो हुआ उसमें राजीव मैरिज पैलेस और दो बिजलीकर्मियों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 304 के तहत चला औपचारिक मुकदमा भी शामिल है. जिंदा बच्चों और लोगों की कब्रगाह मैरिज पैलेस अब एक स्मारक में तब्दील हो गया है. वहां मृतकों की तस्वीरें हैं और एक बड़ा पुस्तकालय. स्कूल ने नई इमारत बना ली, जहां हर साल 23 दिसंबर को हवन की रसम अदा की जाती है.

सरकारी तौर पर इस हादसे को शॉट सर्किट से हुआ बताया जाता है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज तेजप्रकाश गर्ग के जांच आयोग और छह महीने की सीबीआई जांच के निष्कर्ष यही हैं. अन्य कई विशेष जांच रिपोर्ट भी यही कहती हैं. लेकिन स्थानीय लोग इससे इत्तेफाक नहीं रखते. विनोद बंसल खुद अग्निकांड में घायल हुए थे. वे लगातार तीन बार यहां से पार्षद रह चुके हैं. ‘यकीनन यह कोई बड़ी साजिश थी जिस पर सरकार ने किसी नीति के कारण पर्दा डाला. सात मिनट में पूरे परिसर में आग फैलने का दूसरा कोई उदाहरण दुनिया भर में नहीं मिलता’ बंसल कहते हैं.

एक बड़ा सवाल डबवाली अग्निकांड आज भी यह खड़ा करता है कि इससे सबक क्या लिए गए? डबवाली अग्निकांड के बाद दिल्ली में उपहार सिनेमा अग्निकांड हुआ और यह सिलसिला अभी हाल ही में दिल्ली में हुए एक बड़े अग्निकांड तक जारी है. सो जवाब है कि डबवाली अग्निकांड से किसी ने कोई सबक नहीं लिया. क्या यह हमारे देश में ही है कि मासूम बच्चों, औरतों और बूढ़े-बुजुर्गों की दर्दनाक मौतें हमारे लिए सनसनीखेज खबरें तो होती हैं लेकिन कोई सबक नहीं! नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध की आग में जलने वाले देश को क्या सैकड़ों मासूमों की जान लेने वाली ऐसी आगों के बारे में सोचने की भी फुर्सत है?