झारखंड विधानसभा चुनाव 2019 की मतगणना जारी है. ताजा रुझानों में कांग्रेस-जेएमएम-आरजेडी महागठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलता दिख रहा है. जहां इस गठबंधन को बहुमत से एक ज्यादा 45 सीटें मिलती दिख रही हैं, वहीँ सत्ताधारी पार्टी भाजपा के हाथ में 22 सीटें हाथ आती दिख रही हैं.

झारखंड के इस चुनाव में भाजपा अकेले मैदान में उतरी थी. राज्य में लम्बे समय से उसकी सहयोगी रही ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन पार्टी (आजसू) से उसका चुनाव पूर्व गठबंधन नहीं हो सका था. वहीं दूसरी ओर झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम), कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) एक छतरी के नीचे आने में कामयाब रहीं. माना जा रहा है कि अगर ये तीनों पार्टियां साथ नहीं आतीं तो भाजपा की बड़ी जीत निश्चित थी. और अगर आजसू उसके साथ होती तो भी इस चुनाव का पलड़ा उसकी तरफ झुक सकता था.

इसके अलावा यह भी माना जा रहा है कि बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा (जेवीएम) जो भाजपा से ही निकली है वह अगर भाजपा या महागठबंधन, दोनों में से किसी के भी साथ होती भाजपा को ही फायदा पहुंचाती. इसकी वजह यह है कि उसका और भाजपा का वोटबैंक एक ही है जो महागठबंधन से मिल जाने पर शायद उसका साथ नहीं देता.

आइये जानते हैं झारखंड की उन तीन क्षेत्रीय पार्टियों के बारे में जिन्होंने इस तरह के परिणाम लाने में निर्णायक भूमिका निभाई है.

झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम)

झारखंड मुक्ति मोर्चा झारखंड की सबसे पुरानी पार्टी है. इस समय इसका नेतृत्व पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कर रहे हैं. जेएमएम राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और कांग्रेस के साथ मैदान थी. इस चुनाव में जेएमएम 43, कांग्रेस 31 और लालू यादव की पार्टी आरजेडी झारखंड की सात सीटों पर चुनाव लड़ी थी. ताझा रुझान के मुताबिक उसे इस बार 29 सीटें मिलती दिख रही हैं.

झारखंड में आदिवासियों की पार्टी के रूप में पहचानी जाने वाली जेएमएम का गठन चार फरवरी 1973 को हुआ था. तब हेमंत सोरेन के पिता और बिहार के कद्दावर नेता शिबू सोरेन ने शिवाजी समाज के विनोद बिहारी महतो के साथ मिलकर इसकी स्थापना की थी. उस समय विनोद बिहारी महतो झामुमो के अध्यक्ष और शिबू सोरेन महासचिव थे. 1991 में विनोद बिहारी महतो के निधन के बाद शिबू सोरेन को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया.

झारखंड मुक्ति मोर्चा का झारखंड को अलग राज्य का दर्जा दिलाने में काफी अहम योगदान रहा है. 22 जुलाई 1997 को शिबू सोरेन और झारखंड मुक्ति मोर्चा के आंदोलन के दबाव में ही बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने बिहार विधानसभा से झारखंड को अलग करने का प्रस्ताव पारित कराया था.

झारखंड के गठन के बाद से यह पार्टी या तो यह पार्टी यहां की सत्ता में रही है या फिर मुख्य विपक्षी की भूमिका में. मौजूदा समय में भी यह पार्टी राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी ही है. झारखंड के अलावा इसका प्रभुत्व समीपवर्ती राज्यों बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में भी है.

झारखंड विकास मोर्चा (जेवीएम)

झारखंड विकास मोर्चा (जेवीएम) राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी की पार्टी है. साल 2000 में जब झारखंड का गठन हुआ था तो बाबूलाल मंराडी भाजपा के नेता हुआ करते थे. उस दौरान उन्हें राज्य का पहला मुख्यमंत्री बनाया गया था. लेकिन 2006 में वे भाजपा से अलग हो गए और झारखंड विकास मोर्चा (जेवीएम) नाम से खुद की पार्टी का गठन किया. 2014 के विधानसभा चुनाव में उन्हें आठ सीटें मिली थीं लेकिन उनकी पार्टी के छह विधायक बागी होकर भाजपा में चले गए थे.

इस बार के चुनाव से पहले महागठबंधन में जेवीएम को शामिल करने की काफी कोशिशें की गई थीं, लेकिन बात नहीं बन सकी और बाबूलाल मरांडी ने सीटों के बंटवारे से असंतुष्ट होकर अलग से चुनाव लड़ने का निर्णय ले लिया. विधानसभा चुनाव के दौरान झारखंड की राजनीति को जानने वालों का कहना था कि भले ही जेवीएम की राजनीतिक ताकत ज्यादा न हो लेकिन वह कम अंतर से जीत-हार वाली सीटों का परिणाम बदलने में पूरी तरह से सक्षम है. और इससे महागठबंधन को झटका लग सकता है. लेकिन अब कहा जा रहा है कि इसका फायदा महागठबंधन को ही हुआ है. क्योंकि जेवीएम ने भाजपा के मतों को बांटने का काम किया है. इस बार जेवीएस को सिर्फ तीन सीटें ही मिलती दिख रही हैं.

ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू)

इस चुनाव में सुदेश महतो के नेतृत्व वाली ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन यानी आजसू का भाजपा के साथ गठबंधन टूट गया था. लंबे समय से झारखंड की राजनीति में भाजपा और आजसू साथ रहे हैं. आखिरी वक्त तक दोनों पार्टियों की ओर से इस बात के लिए कोशिश हुई कि गठबंधन बना रहे. लेकिन सुदेश महतो अपनी पार्टी के लिए 17 सीटें मांग रहे थे और भाजपा 10 से अधिक देने के लिए तैयार नहीं थी. इनमें से कुछ सीटें ऐसी थीं जिन्हें न तो भाजपा छोड़ना चाह रही थी और न ही आजसू. अंत में बात नहीं बनी और गठबंधन टूट गया. 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 72 और आजसू आठ सीटों पर चुनाव लड़ी थी, जिनमें भाजपा को 37 और आजसू को पांच सीटों पर जीत मिली थी.

आजसू प्रमुख सुदेश महतो बिहार के बड़े छात्र नेता रहे हैं. 2000 में अविभाजित बिहार के समय हुए चुनाव में मात्र 26 वर्ष की उम्र में वे पहली बार विधानसभा पहुंचे थे. अलग झारखंड राज्य बनने के बाद सुदेश महतो ने बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व वाली सरकार का समर्थन किया था. मरांडी की सरकार में उन्हें सड़क निर्माण मंत्री बनाया गया था. बाद में सुदेश महतो 29 दिसंबर 2009 को झारखंड के उप मुख्यमंत्री बने. तब उन्हें एक प्रतिष्ठित पत्रिका ने ‘यूथ आइकॉन ऑफ इंडिया’ घोषित किया था. सुदेश महतो 2000, 2005 और 2009 में सिल्ली विधानसभा सीट से विधायक चुने गए थे.

राजनीतिक पंडितों की मानें तो 2014 के विधानसभा चुनाव के बाद से आजसू के प्रमुख सुदेश महतो झारखंड की राजनीति में तेजी से उभरे हैं. चुनाव पूर्व गठबंधन नहीं होने के बाद आजसू ने 81 विधानसभा सीटों में से 53 पर अपने उम्मीदवार उतारे, जिनमें लगभग आधा दर्जन सीटों पर पार्टी अच्छी हालत में दिख रही है. हालांकि, रुझानों में उसे चार सीटें ही मिलती दिख रही हैं.