हाल ही में फिल्म लेखक और गीतकार वरुण ग्रोवर ने नागरिकता संशोधन कानून और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजनशिप (सीएए-एनआरसी) पर अपना विरोध दर्ज करवाते हुए सोशल मीडिया पर कविता पोस्ट की थी. ‘हम काग़ज नहीं दिखाएंगे’ शीर्षक से लिखी गई यह कविता (इस लेख के अंत में देखें) न सिर्फ सोशल मीडिया पर चर्चा में रही बल्कि विरोध प्रदर्शनों का नारा भी बन चुकी है. उनकी इस कविता से ही प्रेरित होकर एक ट्विटर यूजर, सुमित सप्रा ने ‘क्या सिर्फ़ काग़ज़ात पूछोगे?’ शीर्षक से एक कविता रची है. उन्होंने इसे वरुण ग्रोवर को टैग करते हुए सोशल मीडिया पर पोस्ट किया है. सप्रा की यह कविता न सिर्फ एनआरसी का विरोध करती है बल्कि सांप्रदायिक राजनीति पर तीखे कटाक्ष भी करती है. इसमें कई सवाल ऐसे हैं जो सत्ता समर्थकों द्वारा किए जाने वाले सवालों का जवाब देने की कोशिश करते हैं और कई ऐसे वाकयों का जिक्र भी शामिल है जिनकी याद आपको झुरीझुरी महसूस करवा सकती है.

क्या सिर्फ़ काग़ज़ात पूछोगे?

आज धर्म पूछोगे, कल जात पूछोगे
कितने तरीक़ों से मेरी औक़ात पूछोगे

मैं हर बार कह दूंगा, यही वतन तो मेरा है
घुमा-फिरा के तुम भी तो वही बात पूछोगे

सच थोड़े ही बदलेगा पूछने के सलीकों से
थमा के क़ुरान या फिर जमा के लात पूछोगे

मेरी नीयत को तो तुम कपड़ों से समझते हो
लहू का रंग भी क्या अब मेरे हज़रात पूछोगे

मैं यहीं था 84 में, 93 में, 02 में, 13 में
किस-किस ने बचाया मुझे उस रात पूछोगे

तुम्हीं थे वो भीड़ जिसने घर मेरा जलाया था
अब तुम्हीं मुझसे क़िस्सा-ए-वारदात पूछोगे

ज़बान जब भी खुलती है ज़हर ही उगलती है
और बिगड़ जाएंगे ग़र तुम मेरे हालात पूछोगे

पुरखों की क़ब्रें, स्कूल की यादें, इश्क़ के वादे
कुछ देखोगे सुनोगे या सिर्फ़ काग़ज़ात पूछोगे

वरुण ग्रोवर की वायरल हो रही कविता ‘हम काग़ज़ नहीं दिखाएंगे’

तानाशाह आके जाएंगे, हम कागज़ नहीं दिखाएंगे
तुम आंसू गैस उछालोगे, तुम ज़हर की चाय उबालोगे
हम प्यार की शक्कर घोल के उसको, गट गट गट पी जाएंगे
हम कागज़ नहीं दिखाएंगे, हम कागज़ नहीं दिखाएंगे

ये देश ही अपना हासिल है, जहां रामप्रसाद भी बिस्मिल है
मिट्टी को कैसे बांटोगे, सबका ही खून तो शामिल है
तुम पुलिस से लट्ठ पड़ा दोगे, तुम मेट्रो बंद करा दोगे
हम पैदल पैदल आएंगे, हम कागज़ नहीं दिखाएंगे

हम मंजी यहीं बिछायेंगे, हम कागज़ नहीं दिखाएंगे
हम संविधान को बचाएंगे, हम कागज़ नहीं दिखाएंगे
हम जन गण मन भी गाएंगे, हम कागज़ नहीं दिखाएंगे
तुम जात पात में बांटोगे, हम भात मांगते जाएंगे
हम कागज़ नहीं दिखाएंगे, हम कागज़ नहीं दिखाएंगे