अखिल भारतीय साहित्य अकादमी के 2019 के पुरस्कारों की सूची में शुमार पंजाबी कहानीकार किरपाल कज़ाक खुद में एक अनूठी कहानी हैं. इस बार उन्हें उनके कहानी संग्रह ‘अंतहीन’ के लिए अकादमी पुरस्कार देने की घोषणा की गई है.

किरपाल कज़ाक के मामले में विलक्षण यह है कि उन्होंने महज नौवीं तक जैसे-तैसे, बल्कि यूं कहिए कि बेहद अनमने होकर स्कूली शिक्षा हासिल की थी. उसके बाद वे एक भी जमात आगे नहीं पढ़े लेकिन नौकरी से बाकायदा प्रोफेसर के पद से रिटायर हुए. बहुत संभावना है कि ऐसा कोई दूसरा उदाहरण देश में न मिले. इतना ही नहीं, कज़ाक पटियाला के पंजाबी विश्वविद्यालय की शोध-संधान पत्रिका के संपादक भी रहे और उनके समय में इसके एक से एक उल्लेखनीय तथा संग्रहणीय अंक प्रकाशित किए गए.

बेशुमार बेमिसाल कहानियां रचने वाले इस अप्रतिम कहानीकार की जिंदगी खुद में एक ज़िंदा कहानी है. इसे जानना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि अपने किस्म की माफियागिरी में तब्दील होती जा रही, अकादमिक दुनिया को किरपाल कज़ाक की जीवनधारा खुली चुनौती देती है.

पाकिस्तान में शेखुपुरा नाम की एक जगह है. यहां आजादी से जरा ही पहले 1943 में एक निहायत ही गरीब परिवार में किरपाल कज़ाक का जन्म हुआ था. पिता साधु सिंह पेशे से राजमिस्त्री थे. विभाजन के बाद पूरा परिवार पटियाला के गांव फतेहपुर-राजपूतां आ गया. किरपाल थोड़े बड़े हुए तो नौवीं तक आते-आते स्कूली किताबों से मत्था लगा लिया. पढ़ाई के प्रति उनकी इस अरुचि को देखते हुए उनसे राजमिस्त्री का काम करने को कहा गया. चूंकि उनके पिता फारसी और अरबी अदब के अच्छे जानकार थे, इसलिए बचपन से उनकी इकट्ठा की हुई किताबें पढ़ने तथा बातें सुनने वाले कजाक को यह आदेशनुमा मशविरा रास नहीं आया. नतीजतन आवारगी का चोला पहनकर वे घर से फरार हो गए और पूरे दस साल घर वालों के लिए लापता रहे. इस दौरान वे आदिवासी कबीलों, जेबकतरों, खानाबदोशों व रहस्यों की तलाश में खुद रहस्य बन जाने वाले साधुओं के संगी बने. इन तमाम संगतों के अद्भुत-निराले अनुभवों को वे कापियों में जमा करते रहे. घर लौटे तो यह थाती उनके साथ थी, अब तक है.

1970 में पिता की मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी उन पर आई तो उन्होंने पहले मजदूरी की और फिर कारपेंटरी. इस दौरान लिखना जारी रखा और एक बार अपने लिखे हुए को अमृता प्रीतम को दिखाया. अमृता को उनकी जीवनयात्रा के सच्चे किस्सों ने हैरान तो किया ही, उनके लेखन का स्थायी प्रशंसक भी बना दिया. उन्हीं के सुझाव से किरपाल कज़ाक ने अपना लिखा छपवाना शुरू किया.

सिकलीगरों (एक पिछड़ा घुमंतू समुदाय) के बीच वे बरसों रहे थे. उन्होंने सिकलीगरों के इतिहास से लेकर वर्तमान तक, उसके समाजशास्त्रीय और सांस्कृतिक पहलुओं को सामने रखकर कुछ किताबें लिखीं. कजाक का यह काम इसलिए भी तगड़ी चर्चा में आया क्योंकि उनसे पहले किसी भी देसी-विदेशी लेखक ने इस घुमंतू जाति के लोकाचार पर ऐसा अन्वेषिक काम नहीं किया था. डॉ रामविलास शर्मा, डॉ नामवर सिंह, विजयदान देथा आदि विभूतियों को गुरमुखी नहीं आती थी लेकिन वे कज़ाक के इस मौलिक तथा अतिमहत्वपूर्ण खोज-लेखन से बखूबी वाकिफ थे, कृष्णा सोबती भी. हालांकि इन सभी को यह नहीं पता था कि किरपाल कजाक ने स्कूली शिक्षा भी पूरी हासिल नहीं की और आजीविका के लिए मजदूरी करते हैं.

किरपाल कज़ाक ने घुमंतू समाज पर लिखने के साथ-साथ पंजाबी साहित्य की परंपरागत धारा को नई दिशा देने वाली बेहतरीन और अनूठे शिल्प वाली कहानियां भी खूब लिखीं. इन कहानियों में पंजाबी सभ्याचार और ‘ईथोस’ (मूल्यों और मान्यताओं) का ऐसा यथार्थवादी चित्रण है कि इस मामले में वे यकीनन फणीश्वरनाथ रेणु और विजयदान देथा बिज्जी के करीब जाकर खड़े हो जाते हैं. किरपाल कज़ाक ने ग्रामीण पंजाब के मनोविज्ञान को जिस तरह की अभिव्यक्तियां दीं वे उनके अपने अनुभव की उपज ही थीं. वे कहते हैं कि ‘मैंने जो भी लिखा, जिंदगी और अनुभव की पाठशाला की देन है.’

अब इस शख्स के विश्वविद्यालय की नौकरी तक जाने की कहानी, संक्षेप में. प्रोफेसर हरबंस सिंह पंजाब के प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी और अंग्रेजी अनुवादक रहे हैं. एक बार किरपाल कज़ाक पंजाबी यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर के घर पर मिस्त्री का काम कर रहे थे कि तभी वहां डॉक्टर हरबंस सिंह आ गए. उन्होंने कज़ाक से प्रोफेसर साहब की बाबत पूछा और साथ ही यह भी कि वे कौन हैं? कजाक ने अपना नाम बताया तो हरबंस सिंह ने फिर पूछा कि कहीं आप वही कज़ाक तो नहीं जिनकी कहानियां प्रकाशित होती हैं. किरपाल कज़ाक ने बताया कि वे वही हैं. हरबंस सिंह हक्का-बक्का रह गए कि इतना नायाब और प्रतिभाशाली कहानीकार वहां क्या कर रहा है! उन्होंने कजाक की कहानियों का अंग्रेजी अनुवाद किया और विश्वविद्यालय के प्रकाशन विभाग की पत्रिका ‘खोज’ में उन्हें नौकरी दिला दी. यह 1986 की बात है.

इसके बाद किरपाल कजाक ने ‘खोज’ पत्रिका के एक से एक जबरदस्त अंक निकाले. उनकी विलक्षण प्रतिभा का लोहा मानते हुए पंजाब विश्वविद्यालय ने उन्हें सीधा प्रोफ़ेसर का पद दे दिया जहां से वे कुछ साल पहले सेवामुक्त हो चुके हैं. लेकिन विश्वविद्यालय की कई शोध और शैक्षणिक गतिविधियों से वे आज भी जुड़े रहते हैं. 1947 के बाद ऐसा शायद ही कोई दूसरा उदाहरण कम से कम भारत में नहीं होगा जिसमें सिर्फ एक नौवीं कक्षा तक पढ़े लेखक को ज्ञान और प्रतिभा के बल पर किसी बड़े विश्वविद्यालय में प्रोफेसर जैसा उच्चपद दिया गया हो. ‘तिकड़मबाज और डिग्रीधारी अनपढ़ प्रोफेसरों’ का जब बाकायदा तथ्यात्मक (कु)इतिहास लिखा जाएगा तो प्रोफेसर किरपाल कज़ाक उसमें कहां खड़े होंगे, क्या यह बताने की जरूरत है!