पिछले दिनों देश भर में संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) और एनआरसी को लेकर प्रदर्शन हुए. कई राज्यों में ये प्रदर्शन हिंसा में तब्दील हो गए और कई लोगों को इनमें जान गवानी पड़ी. इसके बाद प्रधानमंत्री ने दिल्ली में अपनी रैली में जोर देकर कहा कि उनकी सरकार के पहले कार्यकाल से लेकर अब तक कभी भी मंत्रिमंडल या संसद में एनआरसी पर विचार ही नहीं हुआ है. हालांकि, देश के गृह मंत्री अमित शाह संसद से लेकर चुनावी रैलियों तक में एनआरसी के आने की बात कहते रहे हैं. लेकिन, प्रधानमंत्री के बयान के बाद माना जा रहा था कि सरकार एनआरसी के विवादास्पद मुद्दे को फिलहाल ठंडे बस्ते में डालने जा रही है. लेकिन, जिस रविवार को प्रधानमंत्री ने एनआरसी पर कोई विचार न होने की बात कही उसी के अगले मंगलवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर की कवायद को मंजूरी दे दी.

एनपीआर को मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद यह सवाल फिर उठ खड़ा हुआ है कि क्या सरकार एनआरसी की दिशा में बढ़ रही है? इस तरह की आशंकायें जताई जा रही हैं कि एनपीआर दरअसल एनआरसी की ओर पहला कदम है. हालांकि, गृह मंत्री अमित शाह ने एनपीआर की मंजूरी के बाद अपने साक्षात्कार में कहा कि एनआरसी और एनपीआर दोनों अलग-अलग प्रक्रियायें हैं और दोनों का एक-दूसरे से कोई संबंध नहीं है. लेकिन, मोदी सरकार के संसद में दिए गए जवाब और कई अन्य सरकारी दस्तावेजों के आधार पर विपक्षी कह रहे हैं कि वह इस बारे में झूठ बोल रही है.

एनपीआर, एनआरसी क्या हैं? इन दोनों का कोई संबंध है भी या नहीं. सरकार अगर यह कह रही है कि एनपीआर और एनआरसी का कोई ताल्लुक नहीं है तो फिर लोग इसको लेकर इतने आशंकित क्यों हैं? इन सवालों पर जाने से पहले एनपीआर पर चर्चा कर लेते हैं.

सामान्य परिभाषा के मुताबिक, नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर या एनपीआर देश के किसी भी इलाके में रह रहे लोगों का ब्यौरा दर्ज करने की कवायद है. एनपीआर बनाने के काम में लगाए गए कर्मचारी घर-घर जाते हैं और कुछ सवाल पूछकर वहां रह रहे लोगों का ब्यौरा दर्ज करते हैं. इसमें नागरिकता की कोई शर्त नहीं है. एनपीआर के तहत देश के नागरिकों के साथ उन विदेशी नागरिकों का भी ब्यौरा दर्ज किया जाता है जो एक ही जगह पर पिछले छह महीने से ज्यादा के वक़्त से रह रहे हैं.

केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा एनपीआर के मंजूरी देने के फैसले की जानकारी देते हुए केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावेडकर ने कहा कि 2010 में कांग्रेस की सरकार यह काम कर चुकी है. उन्होंने यह भी कहा कि चूंकि यह एक अच्छा काम है और एनपीआर के आंकड़ों से सरकारी योजनाओं को बनाने और उनके क्रियान्वयन में आसानी होगी इसलिए हम इसे आगे बढ़ा रहे हैं. अब सवाल यह उठता है कि 2010 में यूपीए सरकार के वक़्त एनपीआर पर इस तरह का कोई विवाद क्यों नहीं खड़ा हुआ?

इसकी कई वजहें हैं. पहली वजह तो यह है कि उस समय राष्ट्रीय स्तर पर एनआरसी यानी नागरिकता रजिस्टर बनाने की कोई चर्चा नहीं थी. लेकिन, 2019 में एनपीआर का मुद्दा इतना सीधा नहीं है. मौजूदा भाजपा सरकार ने अपने घोषणा पत्र में वादा किया है कि वह पूरे देश के लिए एनआरसी लायेगी. केंद्रीय मंत्री भले ही यह कह रहे हों कि फिलहाल एनआरसी लाने की सरकार की कोई मंशा नहीं है, लेकिन भाजपा सरकार के कार्यकाल के दौरान राष्ट्रपति अपने अभिभाषण में कह चुके हैं कि सरकार पूरे देश के लिए नागरिकता रजिस्टर बनाएगी. चूंकि, राष्ट्रपति का अभिभाषण केंद्रीय कैबिनेट द्वारा ही पास किया जाता है, इसलिए यह नहीं माना जा सकता है कि सरकार में इस बारे में कभी चर्चा ही नहीं हुई.

इसके अलावा गृह मंत्रालय की खुद की रिपोर्ट में भी एनपीआर को एनआरसी की दिशा में पहला कदम बताया गया है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, संसद में दिए गए जवाबों में भी भारतीय जनता पार्टी के मंत्रियों ने जो कहा है उसका मतलब यही है कि एनपीआर एनआरसी की दिशा में पहला कदम है. यानी फिलहाल सरकार के बयानों में जो कहा जा रहा है, वह सरकारी कामकाज के दस्तावेज से अलग दिखता है.

‘लोगों के मन में आशंकाएं उठ रही हैं कि सरकार देर-सवेर एनपीआर के आंकड़ों का इस्तेमाल एनआरसी के लिए कर सकती है. ऐसी स्थिति में उन्हें अपनी नागरिकता सिद्ध करने के लिए दस्तावेज जुटाने पड़ेंगे और ऐसा न कर पाने पर उनकी नागरिकता संदिग्ध हो सकती है’ सीएए के खिलाफ होने वाले प्रदर्शनों में हिस्सा लेने वाले दिल्ली के पुनीत अग्रवाल कहते हैं. पुनीत एक समाजसेवी संगठन में काम करते हैं.

यह तो सरकार के बयानों और उसकी रोज़मर्रा की कार्यवाही में विरोधाभास की बात है. लेकिन, अगर उस कानून की बात करें जिसके तहत एनपीआर की कवायद शुरू की गई है तो एनपीआर के एनआरसी से जुड़े होने की बात और साफ हो जाती है.

2003 में अटल बिहारी बाजपेयी सरकार के वक्त नागरिकता कानून 1955 में संशोधन कर एक धारा जोड़ी गई. इसमें कहा गया है कि सरकार अगर चाहे तो एक नेशनल सिटीजन रजिस्टर (एनआरसी) बना सकती है और नागरिकता कार्ड जारी कर सकती है. यानी नागरिकता कानून में हुए इस संशोधन के बाद किसी भी सरकार के पास एनआरसी लाने की शक्तियां हैं. इसी संशोधन के तहत ‘रजिस्ट्रेशन ऑफ सिटीजन्स एंड इश्यू ऑफ नेशनल आइडेंडिटी कार्ड्स’ के बारे में नियम और उप नियम बनाये गए हैं. इन नियमों के मुताबिक, देश भर में एनपीआर कराने के बाद सरकार उसके आंकड़ों के सत्यापन के बाद नागरिकता रजिस्टर तैयार कर सकती है.

इसके मुताबिक, नागरिकता का एक नेशनल रजिस्टर होगा, इसके बाद स्टेट रजिस्टर, फिर जिला रजिस्टर, फिर तहसील स्तर का रजिस्टर और फिर स्थानीय रजिस्टर. एनआरसी तैयार करने की प्रक्रिया के नियमों में यह भी कहा गया है कि एनपीआर के आंकड़ों के सत्यापन के दौरान कोई स्थानीय रजिस्ट्रार किसी व्यक्ति के आंकड़ों पर संदेह होने की स्थिति में उसे संदिग्ध नागरिक (डाउटफुल सिटीजन) की सूची में डाल सकता है.

चूंकि, इन नियमों में कहीं यह स्पष्ट नहीं है कि संदिग्ध नागरिक घोषित करने का आधार क्या होगा, इसलिए यह पूरी तरह सरकारी कर्मचारी के विवेक पर निर्भर होगा कि एनपीआर के सत्यापन के दौरान वह किसे संदिग्ध नागरिक घोषित करेगा. यानी कि एनपीआर से एनआरसी बनने पर सरकारी तंत्र के हाथ में असीमित ताकत आ जायेगी. चूंकि मौजूदा मोदी सरकार ने इसी कानून के आधार पर एनआरसी को मंजूरी दी है. इसलिए एनपीआर के बाद एनआरसी की चर्चा को और भी बल मिल रहा है.

मौजूदा समय में चूंकि यह चर्चा असम की एनआरसी से 19 लाख लोगों के बाहर होने के बाद हो रही है, इसलिए इससे जुड़ी आशंकायें और जोर पकड़ रही है. मौजूदा भाजपा नेतृत्व एनआरसी लाने का राजनैतिक वादा करता रहा है, इसलिए लोगों में एनपीआर के बाद एनआरसी का भय और ज्यादा है.

इसकी कुछ वजहें और भी हैं. एक अनुमान के मुताबिक असम की एनआरसी में जो 19 लाख लोग अपनी नागरिकता नहीं साबित कर पाए उनमें 13 लाख हिंदू और करीब छह लाख मुसलमान हैं. भाजपा असम में बड़ी तादाद में बांग्लादेशी घुसपैठियों के होने का दावा करती थी. लेकिन, इसमें हिंदुओ की बड़ी संख्या आने के बाद पार्टी के लिए धर्मसंकट की स्थिति पैदा हो गई. जानकारों के मुताबिक, इसके बाद पार्टी नागरिकता संशोधन विधेयक लाई, जिसमें बांग्लादेश,पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आये हिंदुओं, सिखों, ईसाई, बौद्ध आदि शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान है. मुसलमानों को इससे इस आधार पर बाहर रखा गया कि चूंकि ये देश मुस्लिम बाहुल्य और इस्लामिक देश हैं, इसलिए वहां उनका धार्मिक उत्पीड़न नहीं होगा.

लेकिन, इसका अर्थ यह भी निकाला गया कि असम की एनआरसी से बाहर हिंदुओं को तो सीएए के जरिये नागरिकता दे दी जाएगी, लेकिन मुसलमानों को इससे बाहर रखा जाएगा. मुरादाबाद से आकर नोएडा में काम करने वाले जमील खान कहते हैं कि ‘सीएए के बाद मुस्लिमों के एक बड़े हिस्से में यह भावना घर कर गई है कि इस क़ानून की मदद से देश में एनआरसी से बाहर हिंदुओं को तो नागरिकता मिल जाएगी, लेकिन मुसलमानों को संदिग्ध नागरिक या अवैध अप्रवासी घोषित कर दिया जाएगा.’ इस पूरे प्रकरण को समग्रता में देखा जाए तो देश के मुस्लिम समाज में यह धारणा घर कर गई है कि एनपीआर, एनआरसी और सीएएस जैसी चीजें उनके खिलाफ हैं.

भाजपा बार-बार यह दोहराती रही है कि सीएए नागरिकता लेने का नहीं बल्कि नागरिकता देने का कानून है और एनपीआर का मकसद सार्वजनिक नीतियों के लिए आंकड़े जुटाना भर है. लेकिन, देश भर से एनआरसी, एनपीआर और सीएए को लेकर जो सवाल उठे भाजपा की ओर से उनका कोई ठोस जवाब नहीं दिया गया. जो जवाब आए भी वे आशंकाओं को दूर नहीं कर पाए. इससे उठी आशंकाओं को एनपीआर की मंजूरी ने और बढ़ा दिया है.

अब भाजपा सरकार कह रही है कि एनपीआर और एनआरसी में कोई संबंध नहीं है. यह बात कितनी सही है यह तो सरकार ही जाने. लेकिन अगर यह सच है कि एनपीआर, एनआरसी नहीं है तो यह भी सच है कि सरकार जब चाहे इसे एनआरसी से जोड़ सकती है. दरअसल, यह प्रश्न नियम कानून से ज्यादा सरकार के इरादे या नीयत से जुड़ा है. चू्ंकि, मोदी सरकार के बारे में सामान्य राजनीतिक समझ यह है कि यह हिंदूवादी सरकार है, इसलिए मुसलमानों में एनआरसी को लेकर आशंका और ज्यादा है.

यह आशंका कुछ और बातों से गहराई है. मसलन, इस बार एनपीआर में जो प्रश्नावली तय की गई है उसमें यह सवाल भी है कि आपके माता-पिता का जन्म कहां हुआ था. लेकिन यह तो एक सामान्य सा सवाल है. इसको लेकर किसी बात की आशंका क्यों? इसको लेकर आशंका इसलिए है कि इससे पहले के एनपीआर में इस तरह का सवाल नहीं था. एनपीआर की सामान्य परिभाषा में इस तरह का सवाल फिट भी नहीं बैठता क्योंकि एनपीआर देश की आबादी और उनके निवास स्थान का विवरण होता है. माता-पिता के जन्म स्थान से उसका कोई तुक नहीं मिलता. लेकिन, मौजूदा एनपीआर में इस सवाल के होने ने इस धारणा को गहरा दिया है कि इस एनपीआर को आगे चलकर एनआरसी से जोड़ा जा सकता है.

ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि नागरिकता अधिनियम में 1987 और 2003 के संशोधन के बाद से नागरिकता तय करने में माता-पिता की नागरिकता भी महत्वपूर्ण है. इन संशोधनों के बाद 1987 के बाद पैदा हुए लोगों को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए यह भी साबित करना होगा कि उनके माता-पिता में से एक भारतीय नागरिक है. 2003 के बाद जन्मे लोगों के लिेए यह शर्त थोड़ी और कड़ी है. 2003 के बाद भारत में जन्मे लोगों को साबित करना होगा कि उनके माता-पिता में से एक भारतीय नागरिक है और दूसरा अवैध प्रवासी नहीं है. जाहिर है कि अभी इन नियमों के इस्तेमाल या नागरिकता के सबूत देने जैसी कोई बात नहीं है, लेकिन माता-पिता का जन्म स्थान पूछने से इस आशंका को जरूर बल मिला है कि हो न हो इस एनपीआर की नागरिकता तय करने में बड़ी भूमिका होने वाली है.

सवाल उठते हैं कि अभी एनआरसी की जरूरत क्यों पड़ी? सरकार का जवाब होता है कि फिलहाल हम कोई एनआरसी नहीं कराने जा रहे हैं. तो फिर एनपीआर क्यों? सरकार कहती है कि एनपीआर के उद्देश्य दूसरे हैं और इसके आंकड़ों के जरिये सार्वजनिक नीतियां बनाई जाएंगी. लेकिन, जानकार यह भी सवाल उठाते हैं कि 2010 की यूपीए सरकार के दौरान इस बात पर काफी बहस हुई थी कि सार्वजनिक नीतियों तय करने के लिए आधार का इस्तेमाल किया जाए या एनपीआर का. अंत में निर्णय आधार के पक्ष में हुआ. पूरे देश में आधार कार्ड के लिए लोगों की जनसांख्यिकी और बायोमीट्रिक जानकारी ली गई.

यूपीए सरकार की इस कवायद से भाजपा सरकार असहमत रही हो ऐसा भी नहीं है. क्योंकि आधार को लेकर मोदी सरकार का रूख और आक्रामक रहा और उसने आधार को तमाम चीजों से लिंक कर दिया. मोदी सरकार ने आधार के समर्थन में कई बार कहा कि इससे डायरेक्ट कैश बेनिफट में सटीक नतीजे सामने आते हैं. यानी मोदी सरकार भी यूपीए की तरह मान रही थी कि वह सरकारी नीतियों को लागू करने में आधार की भूमिका से संतुष्ट है.

फिर एकाएक एनपीआर की क्या जरूरत पड़ी. सरकार इसका जवाब दे रही है कि देश के भीतर लोग काफी बड़ी संख्या में इधर से उधर पलायन करते हैं, ऐसे में एनपीआर के आंकड़े मदद करेंगे. लेकिन, यह जवाब बहुत सटीक नहीं कहा जा सकता क्योंकि ऐसा तो आधार के साथ भी किया जा सकता है. और अगर आधार के डेटा में कुछ कमी नजर आ रही हो तो उसे अपडेट भी किया जा सकता था. आधार के साथ एनपीआर की कवायद कुछ संदेह जगाती है और सरकार उसका निराकरण बहुत स्पष्ट तौर पर नहीं कर पा रही है.

इसलिए समाज का एक वर्ग मान रहा है कि सरकार बयानों में कुछ और कह रही है और कागजों में कुछ और कह रही है. जाहिर है कि यह अच्छी स्थिति नहीं है. ऐसे ही भ्रम और आशंकाओं के बीच हाल ही में पूरे देश में हिंसा हुई है. इसलिए सरकार को इस मसले पर घुमाव-फिराव के बजाय ठोस बात करनी चाहिए और इन भ्रमों और आशंकाओं को दूर करना चाहिए.