देश के दूसरे अनेक राज्यों की तरह उत्तर प्रदेश में भी दिसंबर का आखिरी पखवाड़ा सड़कों पर हिंसा, तोड़फोड़ और विरोध प्रदर्शनों की भेंट चढ़ गया. साल का यह अंतिम पखवाड़ा आम तौर पर उत्सवों, समारोहों और छुट्टियों की मस्ती का मौका होता है. स्कूलों से लेकर अदालतों तक की छुट्टियां, सरकारी कर्मचारी भी अपनी साल भर की बची छुट्टियों का निपटारा करते दिखते हैं. क्रिसमस से लेकर नववर्ष तक खरीदारी में भी तमाम छूटों का अवसर होता है. आम तौर पर यह पार्कों, चिड़ियाघरों और रिजॉर्ट्स में खूब भीड़-भाड़ का वक्त होता है. लेकिन इस वर्ष 18-19 दिसम्बर से एनआरसी और नागरिकता कानून को लेकर प्रदर्शन और हिंसा का जो दौर शुरू हुआ उसने साल के इस समय की सारी मस्ती, उमंग और उत्साह का गुड़ गोबर कर दिया.

उत्तर प्रदेश के लिए यह पहला ऐसा मौका रहा जब राज्य के हर इलाके में हिंसा, आगजनी और पथराव हुआ. इनमें 19 से अधिक लोग मारे गए और घायलों की संख्या 500 से ज्यादा पहुंच गई. इनमें 282 पुलिसकर्मी भी शामिल है. हालांकि यूपी में कहीं भी कर्फ्यू नहीं लगा लेकिन लखनऊ सहित प्रदेश के 30 से अधिक जिलों में पहली बार इंटरनेट पर पाबन्दी लगने से हालात कर्फ्यू से कुछ कम भी नहीं रहे. राज्य के अलग-अलग जिलों में इंटरनेट बंदी से 5000 करोड़ से अधिक का व्यापार प्रभावित हुआ, लाखों लोगों की रोजी-रोटी पर संकट आ खड़ा हुआ.

राजधानी लखनऊ में पहले जब किसी तरह के दंगे-फसाद होते थे, शहर के उसी हिस्से में कर्फ्यू लागू होता था. लेकिन इस बार के हिंसात्मक प्रदर्शनों के बाद समूचे लखनऊ में इंटरनेट प्रतिबंधित होने के कारण हजरतगंज, कैंट, इन्द्रानगर, अलीगंज, गोमतीनगर आदि इलाकों को भी पहली बार ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़ा. इस दौरान यहां ढाई लाख से अधिक ओला-ऊबर जैसी सेवाओं के उपभोक्ता इन सेवाओं से वंचित रहे. स्विगी-जोमेटो जैसी खानपान से जुड़ी सेवाएं भी बंद रहीं. पहली बार लखनऊवासियों को मेट्रो की बन्दी का भी मजा इन्ही हिंसात्मक प्रदर्शनों ने चखा दिया है.

इन प्रदर्शनों के पीछे असामाजिक तत्वों की सुनियोजित योजनाएं कितनी कारगर रहीं, अफवाहों और अज्ञानता की कितनी भूमिका रही, कांग्रेस व समाजवादी पार्टी जैसे राजनैतिक दलों ने इन प्रदर्शनों और हिंसा को भड़काने में कितना योगदान दिया? इन सारे सवालों पर विचार करने के साथ-साथ यह भी देखा जाना जरूरी है कि इस दौरान प्रशासन की तैयारियों में क्या-क्या खामियां रहीं?

पहली बार यह देखा गया कि प्रदर्शनों की व्यापकता और प्रदर्शनकारियों की तैयारियों को लेकर एलआईयू व अन्य खुफिया संगठनों की सूचनाएं बेहद कमजोर रहीं. 19 दिसम्बर को लखनऊ में एक साथ 41 संगठनों को अलग-अलग स्थानों पर प्रदर्शन की अनुमति देने के बाद प्रशासन इन स्थानों पर पुलिस की पर्याप्त व्यवस्था करने में नाकाम रहा. इस दौरान केन्द्रीय सुरक्षा बल तो तैनात किए ही नहीं गए.

अगले दिन भी प्रशासन की तैयारियों में खामियां साफ दिखती रहीं और अराजक तत्व एवं गुंडे आगजनी व तोड़फोड़ करते रहे. लखनऊ में तो थोड़ी राहत इस बात से रही कि 18 दिसम्बर से कड़ाके की ठंड के कारण स्कूल बंद कर दिए गए थे. अन्यथा 19 दिसम्बर को हिंसक प्रदर्शनों में स्कूली बच्चों के लिए बहुत ज्यादा मुश्किलें पैदा हो जातीं.

योगी सरकार स्थितियों से निबटने में शुरूआती तौर पर नाकाम रही. अफसरों की अनुभवहीनता, आपसी तालमेल की कमी, कई जिलों में अफसरों की लापरवाही और अकारण लम्बी खींच दी गई इंटरनेट पाबन्दी ने सरकार को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है.

राजधानी लखनऊ की बात करें तो यहां स्थितियां सामान्य हो जाने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे की वजह से इंटरनेट पर लगी पाबंदी को 25 दिसंबर की शाम तक नहीं हटाया गया. प्रशासन में शामिल लोगों का भी कहना है कि शायद योगी सरकार को इस बात का डर था कि इंटरनेट खुला रहने से प्रधानमंत्री तक कुछ ऐसी बातें पहुंच जातीं जो कड़वी हो सकतीं थीं. या फिर जिनसे राज्य सरकार की शान में कुछ गुस्ताखी हो जाती. इसलिए इंटरनेट और सोशल मीडिया का मुंह जान-बूझकर प्रधानमंत्री का दौरा पूरा होने तक पूरी तरह बंद रखा गया.

राज्य सरकार ने शुरूआती कमियों के बाद स्थितियों पर नियंत्रण के लिए जब कठोर कदम उठाए तो यहां भी राज्य के मुखिया के एक बयान से लोगों की भावनाओं को गहरी ठेस पहुंच गई. मुख्यमंत्री ने उपद्रवियों और हिंसा करने वालों को चेतावनी देते हुए एक बयान जारी किया था. इसमें उन्होने कहा कि ‘दंगों के दोषियों की सम्पत्ति जब्त करके बदला लिया जाएगा.’ हालांकि मुख्यमंत्री ने बाद में अपनी बात को सुधारते हुए कहा कि सीसीटीवी कैमरों व अन्य वीडियो फुटेजों के जरिए हिंसा, पथराव व आगजनी करने वालों को पहचान लिया गया है. और दोषियों की सम्पत्ति जब्त करके इससे हुए नुकसान की भरपाई की जाएगी.

लेकिन मुख्यमंत्री के ‘बदला’ वाले बयान पर बहुत तीखी प्रतिक्रिया देखी गई. अनेक मुस्लिम संगठनों और बुद्धिजीवियों ने इस बयान को अलोकतांत्रिक बताया और मुख्यमंत्री को सवालों के घेरे में लाते हुए यह पूछा कि आखिर एक चुनी हुई सरकार का मुखिया किसी से ‘बदला लेने’ जैसी बात कैसे कर सकता है.

इस बयान पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी आ गईं. समाजवादी पार्टी ने कहा कि जब सरकार का मुखिया ही बदला लेने की बात करता हो तो फिर ‘सबका साथ, सबका विश्वास’ वाले नारे की बात करना बन्द होना चाहिए. कांग्रेस ने भी इस बयान को संविधान और लोकतंत्र की मर्यादा बिगाड़ने वाला बयान कहकर मुख्यमंत्री से माॅफी मांगने को कहा. अखिलेश यादव ने सवाल किया कि जो जनता से बदला लेने की बात करे उस सरकार का क्या होगा?

अब सरकार ने दोषियों की सम्पत्ति की जब्ती की कार्रवाई शुरू कर दी है. फिरोजाबाद, मुजफ्फरनगर, बिजनौर व लखनऊ आदि जिलों में कुछ दुकानें सील कर दी गई हैं. राज्य सरकार ने अब तक हिंसा और तोड़-फोड़ करने के लिए 925 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया है और ऐसे लोगों के खिलाफ 313 मुकदमे दर्ज किये गये हैं. इसके अलावा पिछले दिनों 5558 आरोपितों को निरोधात्मक कार्रवाई के तहत भी हिरासत में लिया गया.

इनसे अलग 120 लोग ऐसे भी हैं जिन्हें सोशल मीडिया के जरिए अफवाह फैलाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया. अगर सोशल मीडिया की ही बात करें तो उत्तर प्रदेश में 16761 सोशल मीडिया पोस्ट के विरूद्ध मामले दर्ज किए गए हैं. ट्विटर के 7573, फेसबुक के 9076 और यूट्यूब के 172 प्रोफाइल भी अब तक डीलिट करवाए जा चुके हैं. आगजनी व हिंसा करने वाले लोगों के चेहरे चिन्हित करके उन्हें प्रसारित-प्रचारित कराया जा रहा है ताकि उनकी धर-पकड़ की जा सके. दंगाइयों की तलाश में तरह-तरह के अभियान भी चलाए जा रहे हैं.

राज्य सरकार के लिए आने वाले कुछ दिन अग्निपरीक्षा के दिन हैं. एक ओर उसे राज्य की कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए काम करना है तो साथ ही साथ हिंसक प्रदर्शन व आगजनी करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई भी करनी है. और यह कार्रवाई कानूनी कार्रवाई ही हो ‘बदले की कार्रवाई’ नहीं इस बात का भी ध्यान योगी सरकार को रखना है.

हालांकि राज्य के डीजीपी ओम प्रकाश सिंह ने निर्देश दिए हैं कि जांच के दौरान बिना साक्ष्य के कोई कार्रवाई न की जाए और किसी भी निर्दोष का उत्पीड़न न हो. लेकिन इस तरह की शिकायतें मिलने लगी हैं कि राज्य की पुलिस मुख्यमंत्री के बदला वाले बयान से काफी प्रेरित हो गयी है. इसके प्रमाण के तौर पर कई शहरों में आरोपितों को वसूली के नोटिस मिलने लगे हैं. लेकिन राज्य के प्रशासन और पुलिस को यह भी ध्यान में रखना होगा कि हिंसा थमने के बाद का यह समय बेहद संवेदनशील है. इस समय अगर सरकार के तौर-तरीके जरा भी गड़बड़ हुए तो आम जन में जो आक्रोश इस समय हिंसा करने वाले उपद्रवियों के खिलाफ दिख रहा है वह सरकार की ‘बदला नीति’ के खिलाफ भी भड़क सकता है.