लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधति रॉय के एक हालिया बयान ने देश में नया विवाद छेड़ दिया है. दिल्ली विश्वविद्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने छात्रों से कहा कि ‘राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के लिए जानकारी मांगे जाने पर आप अपने असली नामों की बजाय रंगा-बिल्ला जैसे नाम और घर का पता 7 रेस कोर्स (प्रधानमंत्री आवास) लिखवा दें.’

बीते कुछ सालों से सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के विरोधी उनकी जोड़ी की तुलना रंगा-बिल्ला से करते रहे हैं. इसलिए जानकारों के एक तबके का मानना है कि ये नाम लेकर अरुंधति रॉय ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह पर ही निशाना साधा था. ऐसे में कई लोग रॉय के बयान का सहारा लेकर प्रधानमंत्री और गृह मंत्री पर नये निशाने साध रहे हैं.

लेकिन कई लोगों का यह भी मानना है कि सोशल मीडिया पर तो ऐसी चीजें चलती ही रहती हैं. हो सकता है कि वहां पर मौजूद ज्यादातर लोग रंगा और बिल्ला को जानते भी न हों. लेकिन एक संवेदनशील साहित्यकार होने के नाते रॉय को ऐसा करना शोभा नहीं देता.

सवाल है कि रंगा और बिल्ला कौन हैं जिनका नाम लेकर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री पर निशाना साधा जा सकता है. इसका जवाब जिस घटना से जुड़ा है वह करीब चालीस पुरानी है.

26 अगस्त 1978, दिन था शनिवार और वक्त था शाम के करीब आठ बजे का. दिल्ली के मदन मोहन चोपड़ा और उनकी पत्नी रोमा चोपड़ा ने प्रसिद्ध कार्यक्रम ‘युववाणी’ सुनने के लिए अपना रेडियोसेट शुरु किया. चोपड़ा नेवी में कैप्टन थे और धौलाकुंआ स्थित ऑफिसर्स एनक्लेव में रहते थे. उस शाम युववाणी में शामिल होने के लिए उनकी बेटी गीता चोपड़ा को बुलाया गया था. लेकिन रेडियो पर कोई और लड़की बोल रही थी.

उस दिन घर से सोलह साल की गीता के साथ उसका दो साल छोटा भाई संजय भी ऑल इंडिया रेडियो के दफ़्तर के लिए निकला था. लेकिन दोनों बच्चे रिकॉर्डिंग के लिए पहुंचे ही नहीं. परेशान मदन मोहन चोपड़ा ने बच्चों की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज़ करवा दी. इसके दो दिन बाद यानी 28 अगस्त को एक गड़रिए ने पुलिस को दिल्ली के ही रिज रोड के पास जंगल में दो बच्चों की सड़ी-गली लाश दिखने की मिलने का जानकारी दी. ये दोनों गीता और संजय ही थे. दोनों की हत्या हुई थी. अंदेशा था कि क़त्ल से पहले गीता के साथ बलात्कार भी किया गया था. इस घटना ने न सिर्फ़ दिल्ली बल्कि पूरे देश को झकझोर दिया.

26 अगस्त को सुबह से ही रुक-रुक कर बारिश हो रही थी. तब दिल्ली इतनी असुरक्षित नहीं मानी जाती थी. ऑल इंडिया रेडियो पहुंचने के लिए गीता और संजय ने एक मस्टर्ड रंग की फिएट कार से लिफ्ट मांगी. कार में कुलजीत सिंह उर्फ़ रंगा और जसबीर सिंह उर्फ़ बिल्ला मौजूद थे. ये दोनों बॉम्बे में अपराध की कई घटनाओं को अंजाम देकर दिल्ली भाग आए थे. उस दिन भी ये सुबह से किसी को अपहरण करने या फ़िर कोई बड़ी लूट करने की फ़िराक़ में घूम रहे थे. गीता और संजय को अमीर घर के बच्चे समझकर उन्होंने उन्हें अपनी कार में बिठा लिया.

दोनों बच्चों को जल्द ही अहसास हो गया कि वे ग़लत चंगुल में फंस चुके थे. उन्होंने पुरजोर विरोध कर कार से निकलने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रहे. रास्ते में कई लोगों ने कार की पिछली सीट पर बैठे दो बच्चों को आगे बैठे दो लोगों से हाथापाई करते और मदद के लिए पुकारते देखा. इनमें से कुछ ने कार को रुकवाने की कोशिश भी की. एक व्यक्ति तो कार का दरवाजा खुलवाने के लिए उससे करीब-करीब लटक भी गया था. वहीं, रास्ते में मिले एक इंजीनियर ने अपने स्कूटर से कार का पीछा करने की ख़ूब कोशिश की. लेकिन ड्राइवरी में माहिर रंगा उन्हें गच्चा देने में सफल रहा.

उस दिन रास्ते में मिले लोगों ने बयान दिया कि गीता ने रंगा के बाल पकड़ रखे थे जिसकी वजह से वह एक हाथ से ही कार चला पा रहा था और दूसरे हाथ से गीता से मारपीट कर रहा था. वहीं संजय के कंधे से ख़ून बह रहा था और वह आगे की सीट पर बैठे बिल्ला से जूझ रहा था जिसके पास कोई धारदार हथियार था.

इन राहगीरों में से एक ने तुरंत इस घटना की सूचना फोन के ज़रिए पुलिस को दी. लेकिन ऑपरेटर ने कार के ग़लत नंबर नोट किए. फ़िर, किसी दूसरे राहगीर द्वारा सूचना देने पर पुलिस ने अपने क्षेत्र का मामला न होने की बात कहकर इससे पल्ला झाड़ लिया. इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार दो पुलिस अधिकारियों को बाद में निलबिंत होना पड़ा था.

घटना के बाद रंगा और बिल्ला दिल्ली से फ़रार हो गए. लेकिन इसके कुछ दिन बाद ही यानी आठ सितंबर को ये दोनों जब आगरा से वापिस दिल्ली आ रहे थे तो गलती से फ़ौजियों के लिए आरक्षित डिब्बे में घुस गए. यहां मौजूद एक फ़ौजी अधिकारी अख़बार में इन दोनों की तस्वीर देख चुका था. बस इन दोनों को बंधक बना लिया गया.

दिल्ली पुलिस को दिए रंगा-बिल्ला के इक़बालिया बयान से पता चलता है कि रंगा ने नेवी अधिकारी के पास ज्यादा पैसे न होने की बात कहते हुए गीता और संजय को छोड़ देने की सलाह दी थी जो बिल्ला ने नहीं मानी. बाद में इन दोनों ने गीता और संजय के सामने पेशकश रखी कि गीता रास्ते में किसी दूसरी कार को हाथ देगी, रंगा और बिल्ला उसमें बैठकर चले जाएंगे और उन दोनों को छोड़ देंगे. बच्चों ने यह बात मान ली. लेकिन उन दोनों अपराधियों के मन में कुछ और ही चल रहा था.

रंगा संजय को कार से उतारकर थोड़ी दूर ले गया और कृपाण (तलवार) के वार से उसे गंभीर घायल कर पटक आया. जब तक वह लौटा तो बिल्ला कार में ही गीता के साथ दुष्कर्म कर चुका था. बिल्ला को अंदाज था कि एक वार से संजय की जान नहीं गई होगी. इसलिए वह भी कृपाण लेकर अधमरे संजय के पास गया और ताबड़तोड़ कई वार कर उसकी हत्या कर दी. पीछे से रंगा ने भी गीता के साथ दुष्कर्म किया.

गंभीर और दयनीय हालत में भी गीता, संजय को लेकर फ़िक्रमंद थी. रंगा और बिल्ला उसे उसके भाई के पास छोड़ आने की बात कहकर कार से बाहर ले आए और कृपाण से वार कर गीता को भी मौत के घाट उतार दिया. पोस्टमार्टम में गीता के शरीर पर पांच और संजय के शरीर पर 21 घाव मिले थे. इस पूरी वारदात में जिस कार का इस्तेमाल हुआ वह रंगा और बिल्ला द्वारा दिल्ली में कुछ ही दिनों के भीतर चुराई गई तीसरी या चौथी कार थी.

गीता और संजय चोपड़ा

उस दौर में इस वीभत्स घटना पर लोगों ने कुछ वैसा ही आक्रोश जताया जैसा कि 2012 में दिल्ली में हुए निर्भयाकांड के बाद देखने को मिला था. उस समय केंद्र में जनता पार्टी की सरकार थी. यहां तक कि बात तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के इस्तीफ़े तक पहुंच गई थी. गीता और संजय की हत्या के बाद दिल्ली में बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन होने लगे थे. ऐसे ही एक प्रदर्शन को शांत करवाने के लिए जब तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पहुंचे तो नाराज़ प्रदर्शनकारियों ने उन पर पत्थरबाजी शुरु कर दी. एक पत्थर वाजपेयी के सिर पर लगा जिसकी वजह से उनके सर पर पांच टांके लगाने पड़े थे.

लोगों की नाराज़गी को देखते हुए निचली अदालत ने जल्द से जल्द केस की सुनवाई की और रंगा और बिल्ला को फांसी की सजा सुना दी. दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी रंगा-बिल्ला के घृणित और जघन्य अपराध के लिए इस सजा को यथावत रखा. तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने भी रंगा और बिल्ला की दया याचिका को ख़ारिज कर दिया और 31 जनवरी 1982 को दोनों को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया.

महात्मा गांधी की हत्या के बाद यह देश का पहला मामला माना जाता है जिसमें चार साल से भी कम वक़्त में आरोपितों की गिरफ़्तारी से लेकर सुनवाई और सजा हो गई थी.

फांसी के वक़्त मौजूद तिहाड़ जेल के पूर्व जेलर और किताब ‘ब्लैक वारंट’ के लेखक सुनील गुप्ता ने बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में बताया कि ‘बिल्ला ने तो दम तोड़ दिया था, लेकिन रंगा की सांसें फंदे पर लटकने के दो घंटे बाद तक चल रही थीं. नतीजतन जेल स्टाफ ने कुएं में जाकर लटकते हुए रंगा को पैरों से पकड़कर खींचा और तब जाकर उसकी जान निकली. यह तो भला हुआ कि उस समय तक फांसी के बाद पोस्टमॉर्टम नहीं किया जाता था, वर्ना यह ख़बर बाहर आ जाती कि रंगा को बाहरी मदद से मारा गया.’

इस पूरी वारदात के दौरान जिस तरह गीता और संजय आख़िर तक एक-दूसरे को बचाने के लिए दो ख़तरनाक हथियारबंद अपराधियों से जूझते रहे, उसे देखते हुए उन दोनों भाई-बहन को 1981 में मरणोपरांत कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया. वहीं, भारतीय बाल कल्याण परिषद ने संजय चोपड़ा और गीता चोपड़ा के नाम पर दो वीरता पुरस्कारों की घोषणा की जिन्हें हर साल गणतंत्र दिवस के मौके पर 16 वर्ष से कम आयु वाले दो बहादुर बच्चों को दिया जाता है.